संपादकीय
18 अप्रैल 13
एनडीए के भीतर मोदी की राह में एक नया रोड़ा खड़ा हो गया है, शिवसेना का। ठीक मोदी की तरह हिन्दू और हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली शिवसेना महाराष्ट्र में और एनडीए में भाजपा की सबसे पुरानी और बड़ी सहयोगी पार्टियों में से एक है। नीतीश कुमार मोदी के नाम पर भाजपा से अलग राह चलते दिख ही रहे थे, कि अब उद्धव ठाकरे भी बहुत साफ-साफ शब्दों में सामने आ गए हैं। शिवसेना के अखबार सामना में पार्टी की नीति की घोषणा करते हुए कहा गया है कि मोदी के नाम पर अगर कुछ सीटें जुटेंगी, और कुछ पुराने बड़े साथी अलग हो जाएंगे, तो वह नुकसान बड़ा होगा। इससे अलग भी कुछ बातों में शिवसेना ने पिछले हफ्तों में अडवानी से लेकर सुषमा तक के विकल्प प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के लिए सुझाए थे, और उस वक्त मोदी के नाम का विरोध तो नहीं किया था, लेकिन मोदी के नाम के दूसरे विकल्पों को बड़ी लकीर की तरह पेश किया था।
नीतीश कुमार मोदी को गुजरात के साम्प्रदायिक दंगों के लिए जवाबदेह मानते हुए पिछले कुछ बरसों से उनके नाम से कतराते दिख रहे हैं, हालांकि जैसा कि हमने कुछ ही दिन पहले इसी जगह लिखा है, गुजरात दंगों के वक्त केन्द्र सरकार का हिस्सा रहते हुए नीतीश कुमार ने कभी मोदी के खिलाफ किसी कार्रवाई की बात नहीं उठाई थी जबकि वह उनकी केन्द्रीय मंत्री के रूप में एक नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी थी। उस बात को इतिहास में दर्ज करके आज के बहस के लिए आया-गया मान भी लें, तो भी अब सवाल यह उठता है कि अपने आपको धर्म निरपेक्ष साबित करने की कोशिश करते हुए जो काम नीतीश कुमार कर रहे हैं, मोदी विरोध का वही काम अपनी पूरी साम्प्रदायिकता के साथ जीने वाली शिवसेना भी कर रही है। एनडीए के भीतर इन दो बिल्कुल अलग-अलग सिरों की सोच एक सी क्यों है यह सोचने की जरूरत है।
एक तरफ नीतीश कुमार को मोदी के मुखिया बनने पर एनडीए का हिस्सा रहते हुए बिहार में मुस्लिम या गैरसाम्प्रदायिक, गैरधर्मान्ध वोटों के नुकसान का खतरा है, दूसरी तरफ एनडीए के भीतर ही किसी सरकार बनने की नौबत में मोदी जैसे ताकतवर नेता के सामने गठबंधन के बाकी साथियों की हस्ती मामूली रह जाएगी। यह खतरा एनडीए के बाकी साथियों पर भी है, लेकिन वे मोदी की पीठ पर सवार होकर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता देखते हैं। एनडीए के एक बड़े भागीदार की शक्ल में जब नीतीश कुमार अपने जदयू को अलग कर लेने की बात करते हैं, तो एक खतरा यह भी होता है कि क्या वे कांग्रेस की लीडरशिप वाले यूपीए का बाहर या भीतर से साथ देंगे? ऐसा होने पर एनडीए का सपना दोगुना दूर हो जाएगा, और भाजपा के भीतर के मोदी विरोधी इस बात को पार्टी के सामने बार-बार रख रहे हैं।
लेकिन ठीक दूसरी तरफ मुंबई में उद्धव ठाकरे के सामने दो किस्म की मजबूरियां हैं। एक तो यह कि बाल ठाकरे के गुजर जाने के बाद अब उन्हें अपने बागी भाई राज ठाकरे के मुकाबले अपने आपको शिवसेना का ताकतवर नेता साबित करना है, और दूसरी तरफ अपने साथी दल भाजपा के मुकाबले महाराष्ट्र में अपने को जिंदा भी रखना है। भाजपा शिवसेना पर अपना दबाव पिछले चुनावों में धीरे-धीरे बढ़ाते आई है, और एक राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक भाजपा में महाराष्ट्र के भीतर अपनी सीटें बढ़ाने का सिलसिला जारी रखा है। दूसरी बात यह कि हिन्दू वोटों को लेकर हिन्दुस्तान के भीतर एक साम्प्रदायिकता खड़ी करने, धार्मिक कट्टरता बढ़ाने, और हिन्दू-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने की जो राजनीति शिवसेना शुरू से महाराष्ट्र में करती आई है, इस सारे काम में उद्धव ठाकरे हिन्दू राजनीति की शतरंज की बिसात पर वजीर नरेन्द्र मोदी के मुकाबले प्यादे बनकर रह जाएंगे। इसलिए शिवसेना का मोदी विरोध हिन्दू राजनीति को लेकर अपने अस्तित्व को बचाने का काम भी है, और उसकी इस सोच को गलत भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि साथी के भले के लिए अपनी कुर्बानी देने का नाम राजनीति नहीं है। शिवसेना को हिन्दू मुद्दों पर अपना अस्तित्व बनाए रखना है, और जब मोदित्व ब्रांड का हिन्दुत्व महाराष्ट्र के बाजार में पड़ोस के गुजरात से एक बेहतर और आकर्षक पैकिंग में आकर वोटरों तक पहुंचेगा तो शिवसेना के लिए वह भयानक बर्बादी का होगा। उद्धव ठाकरे के विरोध के पीछे एक दूसरी वजह भी हो सकती है, लेकिन वह इस पहली वजह के साथ-साथ ही हो सकती है, अकेली वजह नहीं। पिछले बरसों में नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह शिवसेना से अलग होकर अपनी पार्टी बनाने वाले राज ठाकरे को महत्व दिया है, उससे शिवसेना के सीने पर सांप लोटना स्वाभाविक है। और कल को अगर मोदी की अगुवाई में एनडीए देश पर राज करने के लिए आता है, तो वह राज महाराष्ट्र के राज ठाकरे के लिए अधिक अहमियत की संभावनाओं को लेकर भी आ सकता है। इसलिए उद्धव ठाकरे का मोदी विरोध जायज है। एक जंगल में दो शेरों के सिर नहीं छुप पाते, और साम्प्रदायिकता के इस जंगल में मोदी और ठाकरे में से किसी एक की ही गुंजाइश रहेगी।
एनडीए का विश्लेषण करने वाले लोगों के लिए यह बड़ी दिलचस्पी का सामान है, हमारे लिए भी।

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