संपादकीय
16 अप्रैल 2013
अमरीका के बॉस्टन में अभी से कुछ घंटे पहले हुए धमाकों से जितना वह शहर हिला है, उससे कहीं अधिक अमरीका हिल गया है। दस से अधिक बरस पहले न्यूयॉर्क पर हुए आतंकी हमले के बाद अमरीकी जमीन पर क्या यह एक आतंकी हमला है, यह बात अभी खुद अमरीका को साफ नहीं है। और किसी देश पर हुए आतंकी हमले में दो मौतों को लेकर यहां पर हमारे लिखने का भी कुछ नहीं है, लेकिन हम ऐसी घटना के बाद सरकार के बर्ताव को लेकर चर्चा करना चाहते हैं। अमरीकी राष्ट्रपति ने उनके लिए इस भयानक घटना को लेकर अपने बयान में बहुत साफ-साफ कहा- हम लोग अभी तक नहीं जानते हैं कि ये धमाके किसने और क्यों किए हैं। लोगों को कोई नतीजा नहीं निकालना चाहिए जब तक कि हमारे पास सारे तथ्य न आ जाएं। लेकिन किसी को भी कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। हम लोग इसकी जड़ तक जाएंगे और खोज निकालेंगे कि ये किसने और क्यों किए हैं।
भारत में अगर इतनी बड़ी नहीं, कोई छोटी घटना भी हुई होती, तो नेताओं के बयान एक-दूसरे की तरफ उंगली उठाने वाले रहते। अगर पश्चिम बंगाल में ऐसा हुआ होता, तो ममता बैनर्जी इसे वामपंथियों की हरकत बताती, अपनी जान लेने की साजिश बताती, और अपनी सरकार को बदनाम करने की हरकत बताती। इसी तरह दिग्विजय सिंह इसे हिन्दू आतंकी हरकत बताते, नरेन्द्र मोदी इसे केन्द्र सरकार की नरमी का नतीजा बताते, और यह सिलसिला इसी तरह चलते रहता। लोगों को यह भी याद है कि जब मुंबई पर कसाब और उसके आतंकी गिरोह का हमला हुआ, तो दिल्ली में उस वक्त के गृहमंत्री शिवराज पाटिल मॉडलिंग करते हुए मीडिया के कैमरों पर ही दिन में तीन बार कपड़े बदले हुए दिख गए, जो विमान दिल्ली से कमांडो दस्ते को मुंबई ले जा रहा था, उसे शिवराज पाटिल के साथ जाने के लिए घंटे भर रोका गया था, महाराष्ट्र के उस वक्त के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख जब हमला काबू आ जाने के बाद ताज होटल पहुंचे थे तो उनके साथ उनका फिल्म अभिनेता बेटा था, और उस बेटे का एक फिल्म निर्माता-निर्देशक था, जिसकी मुंबई हमले पर बनी फिल्म अभी जारी हुई है।
लेकिन शिवराज पाटिल और विलासराव देशमुख जैसे लोग अकेले नहीं थे। आज सुबह से भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जो बयान जारी किया गया है, वह अमरीकी राष्ट्रपति को भेजी गई एक चि_ी है, जिसमें उन्होंने बम विस्फोटों की निंदा करते हुए इसे मूर्खतापूर्ण तथा कायरतापूर्ण करार दिया और आतंकवाद से लडऩे में भारत की ओर से हर तरह की मदद की पेशकश की। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को लिखे पत्र में मनमोहन सिंह ने कहा, आतंकवाद से लडऩे में भारत और अमेरिका के बीच महत्वपूर्ण सहयोग को देखते हुए हम आपको पूर्ण सहयोग की पेशकश करते हैं। उन्होंने कहा कि भारत आतंकवाद से लडऩे में अमेरिकी नागरिकों के साथ है। उन्होंने कहा, भारत के लोग हमले की कड़े शब्दों में निंदा करने में मेरे साथ हैं। अब भारतीय प्रधानमंत्री की यह चि_ी उस वक्त अमरीका पहुंच गई है जब खुद अमरीका इसे आतंकी घटना नहीं मान रहा है, और जांच को प्रभावित किए बिना वह सभी किस्म के नतीजों के लिए अपने दिमाग को खुला रखकर चल रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति अपने देश के भीतर नागरिकों को भड़कने से बचाने के लिए एक बहुत ही जिम्मेदारी की, संतुलित और न्यायसंगत बात कह रहे हैं- हम लोग अभी तक नहीं जानते हैं कि ये धमाके किसने और क्यों किए हैं। लोगों को कोई नतीजा नहीं निकालना चाहिए। और ऐसे में भारत इसे आतंकी घटना बताकर अमरीका की मदद करने भी जा रहा है!
और एक वक्त नेहरू का जो भारत पूरी दुनिया के मामलों में दखल और वजन रखता था, आज उसके पुराने दोस्त देशों में, पड़ोस में, इराक से लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक आए दिन अमरीकी द्रोन हमलों में दर्जनों बेकसूर मारे जा रहे हैं , लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री का कभी मुंह नहीं खुला। अभी चार दिन पहले ऐसे ही एक हमले में आधा दर्जन से अधिक बच्चे मारे गए, पश्चिमी मीडिया पर अमरीकी कब्जे के बावजूद उन लाशों की तस्वीरें दुनिया का दिल दहलाने के लिए बाहर आ गई, लेकिन मनमोहन सिंह का दिल नहीं दहला, उनका कोई बयान नहीं आया कि अमरीका देख समझकर हमले करे, और आतंकियों को मारने के नाम पर बेकसूर बच्चों पर द्रोन से बम बरसाना बंद करें। भारतीय प्रधानमंत्री को न तो उस फौजी कार्रवाई में कोई खामी दिखी, न अमरीका के फर्जी बहानों में कोई खामी दिखी, और न उन्हें बेकसूर बच्चों की लाशों के बिछ जाने में कोई अंतरराष्ट्रीय आतंक दिखा। लेकिन अमरीका में हुए एक धमाके से भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय में मेज हटाकर दरी बिछा दी गई, और गमी मनाना शुरू कर दिया गया।
भारत को, यहां के नेताओं को, यहां की सरकारों को अपनी प्रतिक्रिया काबू में रखना सीखना चाहिए। एक-दूसरे को कोसने के लिए, अपनी साख को बचाने के लिए, कहीं किसी की चापलूसी करने के लिए, एक-एक हादसे का जैसा हिन्दुस्तानी इस्तेमाल होता है, उससे बचने के तरीके भारत के अमरीकापरस्त नेता, कम से कम अमरीकी राष्ट्रपति से तो सीख लें।

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