ईश्वर दिखाने वाले, देखने वाले और सरकार की जिम्मेदारी


संपादकीय
22 अप्रैल 2013
पश्चिम बंगाल में एक चिटफंड कंपनी गरीबों के सैकड़ों करोड़ लेकर भाग गई दिख रही है, और इसके एजेंट का काम करने वाले दसियों हजार लोग सड़क पर आ गए हैं, लाखों लोग अपनी जमा रकम शायद खो ही चुके हैं। एक खबर यह है कि एजेंट का काम करने वाली पचास बरस की एक महिला ने आत्महत्या कर ली है। और इस कंपनी का धोखेबाज दिख रहा कर्ताधर्ता ममता बैनर्जी की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी का करीबी बताया जा रहा है। कल ही इस अखबार ने पहले पन्ने पर इस कंपनी की एक तस्वीर छापी थी कि यह किस तरह बंगाल में सबसे अधिक पूजे जाने वाले लोगों में से एक, मां शारदा के नाम पर बनाई गई थी, और उनकी तस्वीर के साथ चलाई जा रही थी। इसमें बहुत बड़ी हैरानी की बात इसलिए नहीं थी, और है, कि धोखेबाज और दगाबाज मुजरिमों के लिए आध्यात्म और धर्म एक बड़ी सहूलियत पनाहगार रहते हैं। 
आज भारत में रिजर्व बैंक से लेकर, शेयर बाजार को नियंत्रित करने वाली सेबी तक है, आर्थिक घोटाले करने वालों पर नजर रखने के लिए सरकार की एजेंसियां हैं, राज्य सरकारों की जगह-जगह अपनी एजेंसियां हैं, मीडिया में आती खबरें हैं, अखबारों में छपते इश्तहार हैं, और उन सब पर सोती हुई सरकारें हैं। जब लोग सैकड़ों या हजारों करोड़ खो चुके रहते हैं तब जाकर ऐसी कंपनियों के खिलाफ जांच-पड़ताल शुरू होती है। जब साजिश करने वाले लूटमार करके भाग चुके रहते हैं, तब सरकारी एजेंसियां उनके पांवों के निशान परखना शुरू करती है। 
यह एक बहुत शर्मनाक हालत है कि केन्द्र और राज्य सरकारों को ऐसी धोखाधड़ी और जालसाजी तब समझ आती है जब मीडिया इन खबरों को छापने के कई महीने पूरे कर चुका होता है। यह सिर्फ बंगाल की ही बात नहीं है, देश में जगह-जगह कहीं चिटफंड कंपनियां, तो कहीं दूसरे तरह से लोगों की रकम जमा करने वाली कंपनियां गुब्बारे की तरह फूलकर, फैलकर अपना समां बांध चुकी होती हैं, सुनहरे सपने दिखाकर गरीबों को लूट चुकी होती हैं, और सरकार तब तक उनकी जांच भी शुरू नहीं कर पाती। हम छत्तीसगढ़ में ही हर कुछ महीनों में ऐसी किसी एक कंपनी के हाथों लुटे हुए लोगों को देखते हैं, और इसके तुरंत बाद कोई दूसरा जालसाज आकर कुछ दूसरे किस्म के हसीन सपने दिखाने लगता है। 
लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले तक सड़कों पर जालसाजी का एक बड़ा ही अनोखा तरीका चलता था। किसी राहगीर को धोखेबाज रोकते थे, उसे सड़क पर ईश्वर दिखाने का झांसा देते थे, और बेवकूफ लोग अपना सामान इन धोखेबाजों को देकर उनके कहे मुताबिक दस या बीस कदम चलते थे, और ईश्वर का इंतजार करते थे। ईश्वर तो नहीं आता था, पीछे मुड़कर देखने पर धोखेबाज जरूर गायब हो गया मिलता था। आज बहुत सुहाने सपने दिखाने वाली कंपनियां इसी किस्म की हैं।  पेड़ लगाने से होने वाली कमाई के नाम पर अभी एक-दो दशक पहले देश के कुछ नामी-गिरामी घरानों ने हजारों करोड़ इक_े किए, और उनके इश्तहार ईश्वर दिखाने के दर्जे के ही थे, वे दावा करते थे कि रूपए पेड़ों पर उगते हैं। आज रूपए तो रूपए, वो पेड़ भी कहीं नहीं उगे हैं, और लुटे हुए लाखों लोग सदमे से नहीं उबर पाए हैं। 
इसलिए एक तरफ जहां हम सरकार से वक्त रहते जांच करने और धोखाधड़ी को रोकने की उम्मीद करते हैं, वहीं हम दूसरी तरफ उन लोगों को भी अक्ल के इस्तेमाल की नसीहत देना चाहते हैं जो हर चमकदार चीज को सोना मानकर उसके पीछे लग जाते हैं। अगर दुनिया में इतना ही सोना होता, तो लोग फिर भला पीतल के बर्तनों में खाना क्यों खाते, पानी क्यों भरते? इसलिए कानून और जिम्मेदारी चाहे सरकार की हो, पैसा तो अपना खुद का है। और जिनका पैसा गाढ़े पसीने की कमाई का होता है, उन्हें करिश्मों की तरह कमाई के सपने नहीं देखने चाहिए। बड़ी-बड़ी कंपनियां आज सत्ता की मेहरबानी से बड़े-बड़े हसीन सपने दिखाकर लोगों को तब तक लूटती हैं, जब तक उनका बुलबुला फूट नहीं जाता। फूटने के ठीक पहले तक ऐसे बुलबुलों पर बहुत से रंग चमकते दिखते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी रंग हकीकत नहीं होता, वह पल भर की जिंदगी की सतह पर दूसरे रंगों का प्रतिबिंब ही होता है। इनकी हकीकत को न समझकर ईश्वर देखने जो लोग आगे बढ़ते हैं, उनका अपने हाथ का सबकुछ खो बैठना तय रहता है।

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