उमा भारती का यह बयान उन्हें कटघरे तक ले जाने को काफी

संपादकीय
10 फरवरी 2017


मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं, और फिर साम्प्रदायिक दंगे के एक अदालती मुकदमे की वजह से इस्तीफा देने पर मजबूर हुईं उमा भारती ने अपने कार्यकाल को लेकर उत्तरप्रदेश की एक चुनावी सभा में एक मंच से कहा कि जब वे मुख्यमंत्री थीं तो बलात्कारियों को पीडि़ता के सामने तब तक टॉर्चर किया जाता था जब तक वे रहम के मामले में भीख न मांगने लगें। उन्होंने बताया कि जब एक पुलिस अफसर ने उनके ऐसा करवाने पर आपत्ति की थी तो उन्होंने उस अफसर से कहा था कि ऐसे दानवों का कोई मानवाधिकार नहीं होता, और रावण की तरह उनके भी सिर काट दिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि बलात्कारियों को उल्टा लटकाकर तब तक पीटना चाहिए जब तक कि उनकी चमड़ी न उतर जाए, और उसके बाद उनके घावों पर नमक-मिर्च छिड़कना चाहिए। उमा भारती आज केन्द्रीय मंत्री हैं, जिन्होंने संविधान के प्रति निष्ठा से काम करने की शपथ के साथ पद सम्हाला है। वे उत्तरप्रदेश में बलात्कार की घटनाओं पर वहां की सपा सरकार को काम करने का तरीका समझा रही थीं।
उमा भारती शुरू से एक साध्वी के रूप में जानी जाती हैं। वे हिन्दू धर्म से गहराई से जुड़ी हुई हैं, और अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने का आव्हान करने वाले भाजपा के बड़े नेताओं में वे भी शामिल थीं, और जब मस्जिद गिराई जा रही थी, तब मंच और माईक पर उमा भारती भी थीं, और 1992 से चल रहे इस अदालती केस में उमा भारती भी एक आरोपी हैं, और मस्जिद के गिरते वक्त उनके खुशी से उछलते-कूदते और मुरली मनोहर जोशी के कंधे पर लटकते वक्त की तस्वीरें इंटरनेट की मशहूर तस्वीरों में से एक हैं। उमा भारती जब मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री थीं, तब भी वे संविधान की शपथ लेने के बाद काम कर रही थीं, हालांकि यह एक अलग बात है कि उस वक्त उन्होंने मुख्यमंत्री की टेबिल को एक मंदिर बनाकर रख छोड़ा था।
अब सवाल यह उठता है कि बलात्कार के आरोप में पकड़े गए किसी व्यक्ति को अगर उमा भारती ऐसी सजा दिलवाती थीं, तो उनके मध्यप्रदेश में किसी अदालत की जरूरत ही क्या थी? जब किसी को आरोप लगते ही इस तरह से हिंसक सजा सड़क पर ही देनी है, तो फिर मुख्यमंत्री ही प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश भी हो सकते हैं। उमा भारती का यह कहना उनके खिलाफ एक बड़े सुबूत की तरह इस्तेमाल करके उन्हें कटघरे में खड़ा करने के काम में लाया जा सकता है। अब इंसाफ के इसी पैमाने को अगर देखें, तो बाबरी मस्जिद गिराने के जुर्म में आज तक उमा भारती पर जो मुकदमा चल रहा है, क्या 6 दिसंबर 1992 के उस दिन जो लोग जाहिर तौर पर उस जुर्म में शामिल थे, उन पर किसी मुकदमे की जरूरत नहीं है, और उन तमाम नेताओं को क्या उमा भारती की सोच के मुताबिक सड़कों पर ही तुरंत सजा नहीं दे दी जानी चाहिए थी?
लोकतंत्र में एक दिक्कत यह है कि धर्म से जुड़े हुए ऐसे लोग जब सत्ता पर काबिज होते हैं जो कि संविधान से ऊपर अपने धर्म को मानते हैं, तो उनकी यह अलोकतांत्रिक सोच उनके बाकी बर्ताव को भी तय करने लगती है। उमा भारती के तौर-तरीके कभी भी लोकतांत्रिक नहीं रहे, कभी भी वे इंसानियत से भरे हुए भी नहीं रहे, कभी वे किसी पुलिस अफसर को थप्पड़ मारती हैं, तो कभी किसी और को धमकाती हैं। साम्प्रदायिक बातें तो वो करती ही हैं, और संविधान की शपथ पर उनकी कोई आस्था कभी दिखती नहीं है। लोकतंत्र में धर्मान्धता, धार्मिक कट्टरता, और साम्प्रदायिकता से भरे हुए लोग ऐसा ही अलोकतांत्रिक बर्ताव करते हैं, और देश में आज ऐसे लोगों को खारिज करने की जरूरत है। दिक्कत यह है कि ऐसे लोग उस बहुमत के सहारे जीतकर सत्ता में आते हैं, जिन्हें लोकतंत्र की समझ नहीं है, और जिन्हें कट्टरता के झांसे में आसानी से लाया जा सकता है। ये सारे लोग लोकतंत्र के सारे फायदे उठाते हुए उसे खत्म करने में लगे रहते हैं, और देश में आज नेहरू की तरह के हौसलामंद नेता भी नहीं है, जो कि ऐसे धर्मान्ध लोगों को उजागर कर सकें।

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