बजट आ तो गया, पर बेअसर सा लगता है...

संपादकीय
1 फरवरी 2017


मोदी सरकार का बजट नोटबंदी की छाया में दबा रहा। फिर भी अब नोटबंदी तो हकीकत हो ही चुकी है, वह कितनी कड़वी रही, कितनी नुकसानदेह रही, कितने फायदे की रही, यह आने वाले बरस बताएंगे, ऐसा खुद सरकार ने कहा है। लेकिन कुछ बातें जो पूरा बजट पढ़े बिना पहली नजर में भली लगती हैं, वह चर्चा के लायक हैं। यह उम्मीद भी की जा रही थी कि नोटबंदी से मिले जख्मों पर सरकार कुछ मरहम रख सकती है, इसे लेकर जो चर्चाएं थीं, उनमें से कुछ तो पूरी नहीं हो पाईं, और कुछ बातें हुई हैं।
वित्तमंत्री अरूण जेटली के पेश किए हुए 2017 के बजट में ग्रामीण मजदूरी की यूपीए सरकार की सबसे बड़ी योजना, मनरेगा, पर 48 हजार करोड़ रूपए रखे गए हैं, जो कि आज तक की अधिकतम रकम है। पिछले साल इस मद में कुल 37 हजार करोड़ रूपए रखे गए थे। इसके साथ-साथ ग्रामीणों के लिए खेतिहर कर्ज से लेकर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अगले दो बरस में एक करोड़ घर बनाने का इरादा भी गरीबों को फायदा पहुंचाएगा, और यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने में मदद भी करेगा। सरकार ने इसके साथ-साथ इंकम टैक्स देने वाले नौकरीपेशा तबके को भी सबसे कम टैक्स-सीमा में छूट दी गई है, इससे बहुत बड़ी संख्या में लोगों को छोटी ही सही, राहत मिलेगी। लेकिन हर बजट ऐसे थोड़े-बहुत फेरबदल लेकर आता ही है, और हम इसका बहुत अधिक मतलब निकालना नहीं चाहते।
आज के इस बजट और कल आए आर्थिक सर्वेक्षण से देश की जनता को यह उम्मीद थी कि नोटबंदी का तर्क स्थापित किया जाएगा, और उससे तात्कालिक और दीर्घकालीन फायदे गिनाए जाएंगे, लेकिन यह साबित हुआ है कि सरकार के पास ऐसे किसी फायदे का कोई अंदाज नहीं है, बल्कि नोटबंदी की वजह से सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीडीपी) गिरने का अंदाज सरकार को सामने रखना पड़ा है। इसके साथ-साथ नोटबंदी के पीछे जो तर्क है, उसे भी देखने की जरूरत है कि देश की अर्थव्यवस्था से कालाधन खत्म होना, या कि देश के बाहर गया हुआ कालाधन वापिस लाना, उसका कोई रास्ता न आर्थिक सर्वेक्षण में दिखता, और न ही बजट में दिखता। दरअसल उसका कोई रास्ता सरकार के पास है भी नहीं, बल्कि सरकार ने अपने टैक्स विभागों को कालाधन निकालने के लिए जिस तरह से कारोबार की दुनिया के पीछे लगाया है, उससे मंदी में फंसे हुए कारोबार की तकलीफें और बढ़ गई हैं। जो लोग यह नाटकीय उम्मीद कर रहे थे कि सरकार शायद आयकर खत्म करने जैसा कोई काम करे, जैसी कि सलाह सरकार को नोटबंदी सुझाने वाले जनसंगठन से लेकर सरकार के अपने सांसद सुब्रमण्यम स्वामी तक दे रहे थे, उस तरह का कोई क्रांतिकारी फैसला  इस बजट में सामने नहीं आया। यह एक अलग बात है कि हम आयकर खत्म करने जैसे किसी फैसले की न तो वकालत कर रहे हैं, और न ही ऐसे किसी फैसले के नफे-नुकसान का हमें पूरा अंदाज है। लेकिन नोटबंदी जैसे नाटकीय कदम के बाद उसका एक तर्कसंगत अंत इस बजट में दिखाई नहीं पड़ता, और यह सरकार की एक बड़ी नाकामयाबी दिखती है।
मोदी सरकार आज दुनिया में कच्चे तेल के सस्ते होने का बड़ा फायदा उठा रही है, और देश की अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा फायदा इसी बात से हुआ है कि ताजा भारतीय इतिहास की सबसे सस्ती खरीदी हो रही है, और जनता पर सबसे अधिक टैक्स लगाकर पेट्रोल-डीजल दिया जा रहा है। इस फासले से सरकार के पास बहुत बड़ी रकम इकट्ठा हो रही है, और सरकार को अर्थव्यवस्था चलाने में इससे मदद मिल रही है। सरकार का यह भी कहना है कि नोटबंदी की वजह से उसका रिकॉर्ड टैक्स-कलेक्शन हुआ है, और बैंकों के पास इतनी रकम आ गई है कि हर तरह के कर्ज आसानी से मिलेंगे। ऐसी नौबत में इस बजट से परे भी वित्त मंत्री को यह ध्यान रखना पड़ेगा कि बैंक ऐसे कारोबार के लिए कर्ज देकर अपने आपको न डुबाएं जिनसे अब तक का तजुर्बा बहुत खराब रहा है। खरबपतियों से कर्ज नहीं लौटता, और बहुत छोटे-छोटे लोगों की कर्ज की अदायगी बहुत अच्छी है। अभी इस बजट के असर का हमको पूरा अंदाज नहीं है, और आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था के जानकार इस बारे में अधिक तर्क सामने रख सकेंगे। आज तो इस बजट का असर इतना ही दिखेगा कि यह आया या नहीं आया, यह भी अधिकतर लोगों को समझ नहीं आएगा। इस हिसाब से यह बजट एक बेअसर बजट दिखता है, और हो सकता है कि आज देश की अर्थव्यवस्था किसी अधिक दुस्साहस के लायक बची नहीं है।

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