सोशल मीडिया के खतरों से आगाह रहना और करना जरूरी

संपादकीय
3 फरवरी 2017


मध्यप्रदेश के भोपाल से एक भयानक खबर आई है कि फेसबुक पर हुई दोस्ती, लिव इन रिलेशनशिप में बदल गई, और फिर झूठी जानकारी के आधार पर शादी भी हो गई, और पति ने पत्नी को मारकर घर के भीतर ही चबूतरे जैसी समाधि बनाकर लाश को दफना दिया, उस पर सोते रहा, और उस नौजवान पत्नी के एकाउंट से सोशल मीडिया पर सबसे चैट भी करते रहा। लड़की के पिता को महीनों बाद कुछ शक हुआ, तो वे पुलिस के पास पहुंचे, और पुलिस अब लाश तक पहुंच पाई है। पिछले महीनों में छत्तीसगढ़ में भी जगह-जगह सोशल मीडिया के माध्यम से हुई मोहब्बत के बाद शादीशुदा महिलाएं अपने पति और बच्चों तक को छोड़कर पे्रमी के साथ चली गईं, और तरह-तरह के धोखे हुए।
दरअसल, इंसान की सामाजिक जिंदगी में सोशल मीडिया एक आंधी की रफ्तार से आया हुआ मामला है, और उसके साथ जीना सीखने के पहले ही लोगों ने उसका अंधाधुंध इस्तेमाल शुरू कर दिया। जिस तरह किसी छोटे बच्चे के हाथ तेज चलने वाली कार थमा दी जाए, और वह उसे चलाना शुरू कर दे, कुछ उसी तरह आज अधिकतर लोग खतरों से अंजान रहते हुए सोशल मीडिया का बड़ा इस्तेमाल कर रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि लोग जुर्म में फंसने पर, या जुर्म का शिकार होने पर तो खबरों में आ रहे हैं लेकिन जुर्म से पहले तक जब परिवार टूट रहे हैं, तनाव पैदा हो रहा है, तब तक तो वह बात खबरों में भी नहीं आती। लेकिन ऐसा मानकर चलना चाहिए कि हर जुर्म के मुकाबले सोशल मीडिया पर हजारों तनाव खड़े होते रहते हैं, और लोगों के रिश्ते खराब होते रहते हैं।
ऐसे मामले में सरकार की जिम्मेदारी तो किसी जुर्म के सामने आने पर शुरू होती है, लेकिन दूसरी तरफ परिवार और समाज की जिम्मेदारी शुरू से शुरू होती है और अपने आसपास के लोगों को सोशल मीडिया की संभावनाओं और खतरों से आगाह कराना सबकी जिम्मेदारी है। जिस तरह लोग शराब या तंबाकू के खतरों से सावधान कराते हैं, ठीक उसी तरह सोशल मीडिया के खतरों से भी सावधान कराने की जरूरत है। सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि क्या स्कूल की आखिरी की एक-दो बड़ी कक्षाओं में सोशल मीडिया को लेकर कोई पाठ स्कूली किताबों में जोडऩा चाहिए, क्योंकि इस उम्र के बच्चे अब फोन, संदेश, और सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वे भारत के बहुत ही कड़े आईटी कानून के शिकंजे से भी नावाकिफ रहते हैं, और सामाजिक खतरों से भी। इसलिए आज अपने बच्चों को मोबाइल फोन देने के पहले, कम्प्यूटर और इंटरनेट देने के पहले इसके खतरों को बताना और समझाना उसी तरह जरूरी है, जिस तरह दुपहिया देने के पहले ड्राइविंग लायसेंस और हेलमेट देना जरूरी रहता है। और बच्चों को सावधान करने के पहले यह भी जरूरी है कि बड़े खुद भी सावधान हो जाएं, क्योंकि आज इंटरनेट और फोन-कम्प्यूटर पर कुछ भी निजी नहीं रह जाता है, और बहुत कुछ कानून के हिसाब से जुर्म के दायरे में आता है। 

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