राजनीति में कटुता के चलते कहावत-मुहावरे भी मुश्किल

संपादकीय
9 फरवरी 2017


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में कल पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर एक हमला करते हुए कहा कि वे चालीस बरस तक देश के आर्थिक नीति निर्धारण के केन्द्र में रहे, और इतने बड़े-बड़े घोटाले होते गए। उन्होंने मनमोहन सिंह के बारे में कहा कि वे बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाना अच्छी तरह जानते हैं। इसे लेकर कांग्रेस ने कल संसद छोड़ दी, और आज वह इसे लेकर राज्यसभा में नारेबाजी कर रही है। कांग्रेस इसे लेकर प्रधानमंत्री से मांग कर रही है कि वे अपने शब्द वापिस लें, और माफी मांगें।
आज देश की राजनीतिक हवा में जहर देश की असल हवा से कहीं अधिक घुला हुआ है। दिल्ली या प्रदूषण के शिकार इलाहाबाद जैसे दूसरे शहरों की हवा कितनी भी जहरीली हो, संसद और विधानसभाओं में एयरकंडीशनिंग के बावजूद, राजनीतिक दलों के भाषणों और पत्रवार्ताओं में जहर कारखानों के जहर से अधिक घुला हुआ है। नतीजा यह है कि किसी का मुंह खुलता नहीं है कि उसका राजनीतिक जवाब सोचना और देना शुरू हो जाता है। तमाम राजनीतिक दल इसी काम में लगे हैं और मुद्दे की बात धरी रह जाती है। कल प्रधानमंत्री ने जो कहा वह बात एक कहावत या मुहावरे जैसी अधिक थी, और एक हकीकत भी थी। मनमोहन सिंह दस बरस प्रधानमंत्री रहे, और अपने कम से कम दूसरे कार्यकाल में तो वे लगातार भ्रष्टाचार के मूक गवाह बने रहे, और उन्होंने देश को डूब जाने दिया। किसी मंत्रिमंडल का मुखिया मीडिया में अपनी सरकार के भ्रष्टाचार की अंतहीन खबरों को देखते हुए भी अनजान और निर्लिप्त नहीं बने रह सकता। कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से अछूते रहने का हक कमल को तो मिल सकता है, किसी प्रधानमंत्री को नहीं। इसलिए मोदी की इस बात में सच्चाई तो थी कि मनमोहन सिंह अपनी इस लंबी आर्थिक भूमिका के दौरान होते भ्रष्टाचार से अनजान बने रहे। प्रधानमंत्री बनने के पहले वे वित्तमंत्री रहे, सरकार में सचिव रहे, आरबीआई के गवर्नर रहे, और अनगिनत आर्थिक नीतियों के पीछे उनका हाथ रहा। ऐसे में वे अपने दशकों के कार्यकाल के भ्रष्टाचार से अनजान बने रहने का दावा तो बिल्कुल ही नहीं कर सकते। हमने यूपीए के कार्यकाल के दौरान यह बार-बार लिखा था कि मनमोहन सिंह की जगह अदालती कटघरे से होते हुए जेल की दिखती है, यह अलग बात है कि अब तक उसकी नौबत नहीं आई है। जब कोई इंसान देश और सरकार की सेवा करने की संवैधानिक शपथ लेते हैं, तब उनकी निजी ईमानदार बने रहना कोई मायने नहीं रखता, अगर उनके मातहत एक गिरोह की तरह काम करते हैं।
देश की राजनीति में गंदी, ओछी, और भड़काऊ बातें बहुत सी हो रही हैं, कम से कम संसद की यह एक बात सदन छोडऩे जैसी नहीं थी, और कांग्रेस ने मानो एक बहाना ढूंढकर सदन छोड़ दिया। नरेन्द्र मोदी इससे बुरी बहुत सी और बातें कहते आए हैं, उन्होंने शशि थरूर के मामले में सौ करोड़ की गर्लफ्रेंड जैसी बात भी कही थी, और कई दूसरे लोगों पर ओछे हमले किए थे, लेकिन वैसी बातों का वैसा ही जवाब दूसरे लोगों ने भी उनको दे दिया था। हम ऐसी किसी भी बात को सही नहीं मानते, लेकिन मनमोहन सिंह चूंकि निजी जीवन में ईमानदार माने जाते हैं, इसलिए उनके कार्यकाल के, उनके मातहत, उनके काबू के कामकाज में हुए घोटालों को लेकर भी उनके बारे में कुछ न कहा जाए, यह फिजूल की बात है। इतिहास भी मनमोहन सिंह से हमेशा इस बात का जवाब मांगता रहेगा, भले मनमोहन सिंह अपने खुद के बारे में, अपने को रियायत देते हुए यह कहते रहें कि इतिहास उनके प्रति अधिक नर्मी बरतेगा। इस देश का कोई प्रधानमंत्री, कोई मंत्री या मुख्यमंत्री अपने मातहत होते भ्रष्टाचार का मुखिया बने रहकर किसी नर्मी की उम्मीद न करे, और जेल जाने को तैयार रहे।
आज राजनीति में कटुता इतनी बढ़ गई है कि मुद्दे की बात धरी रह जाती है, और कुछ शब्दों को लेकर लाठियां चलने लगती हैं। हमारा यह मानना है कि बात ठोस बात पर होना चाहिए, संसद का पिछला सत्र इस मुद्दे पर खत्म हो गया कि प्रधानमंत्री उसमें आ नहीं रहे हैं, आ रहे हैं तो बोल नहीं रहे हैं, और अब बोल रहे हैं तो बोलते हैं कि बोलता है।

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