राज्य सरकार के भ्रष्टाचार पर निगरानी की खुफिया एजेंसी हो

संपादकीय
17 फरवरी 2017


छत्तीसगढ़ में कल फिर एंटी करप्शन ब्यूरो ने पौन दर्जन अफसरों पर छापे मारे, और उनसे एक अरब से अधिक की जमीन-जायदाद, गहनों और रूपयों की बरामदगी बताई है। हर कुछ महीनों में ब्यूरो की ऐसी कार्रवाई होती है, और फिर महीनों तक उससे जुड़ी खबरें आती हैं, और फिर लोगों को यह भी पता नहीं लगता कि ये मामले अदालत तक पहुंचे या नहीं, या वहां से क्या फैसला हुआ। प्रदेश में एसीबी की आज तक की सबसे बड़ी कार्रवाई, नागरिक आपूर्ति निगम से सैकड़ों करोड़ के भ्रष्टाचार का दावा किया गया था, लेकिन उससे जुड़े हुए दो सबसे बड़े आईएएस अफसर अब तक किसी भी कार्रवाई से परे आजाद हैं, सरकार विधानसभा में बार-बार कह चुकी है कि कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है।
प्रदेश की जनता ऐसे रहस्य सुलझा नहीं पाती है कि भ्रष्टाचार का घड़ा भरते हुए जब हर किसी को दिखता है, तो भी खुद सरकार को क्यों नहीं दिखता है, और फिर जब भ्रष्टाचार पकड़ में आ भी जाता है, तो भी दस-बीस बरस तक भ्रष्ट लोग कुर्सियों पर जमे रहते हैं, और आगे भ्रष्टाचार जारी रखने के अधिकारों से लैस भी रहते हैं। शायद ही किसी भ्रष्ट को यह खतरा दिखता हो कि उस पर कोई कार्रवाई होगी, और ऐसी कार्रवाई होगी कि उसकी नौकरी जाएगी, और वे खुद जेल जाएंगे। ऐसे खतरे के बिना लोग बेफिक्र होकर कमाते हैं, और कभी उन पर कार्रवाई होती भी है, तो उनकी कमाई का एक बड़ा ही छोटा हिस्सा छापे में पकड़ाता है, और इस हिस्से को भी वे अपनी जायज कमाई साबित करने में अदालत तक पहुंचते हुए कामयाब हो जाते हैं। भारत में न्यायपालिका में मुजरिमों को संदेह के आधार पर रियायत देने की जो सोच है,  उसके चलते सौ गुनहगारों में से दो-चार ही सजा पाते होंगे।
हम बार-बार छत्तीसगढ़ के सिलसिले में यह लिखते आए हैं कि सरकार को भ्रष्टाचार पकडऩे वाली एजेंसी से परे एक ऐसी खुफिया एजेंसी भी विकसित करनी चाहिए जो कि भ्रष्टाचार शुरू होते ही उस पर जल्द ही नजर रख सके, और इसकी जानकारी समय रहते भ्रष्टाचार पकडऩे वाली एजेंसी को दे सके। जिस तरह केन्द्र सरकार से लेकर राज्यों तक दूसरे कई मामलों के लिए खुफिया विभाग रहते हैं जो कि खुद कोई कार्रवाई नहीं करते हैं, लेकिन नजर रखकर जानकारी जुटाते हैं, और उनकी जानकारी के आधार पर कहीं आतंकी हमले थमते हैं, तो कहीं किसी और तरह के जुर्म। ऐसी ही एजेंसी राज्य सरकार को अपने भीतर के भ्रष्टाचार पर काबू करने के लिए बनानी चाहिए, और जब एसीबी जैसी एजेंसी कोई कार्रवाई करती है, तो पकड़ाए हुए अफसरों के खिलाफ मुकदमे की इजाजत का लंबा और थका देने वाला सिलसिला खत्म करना चाहिए। इसके साथ-साथ राज्य सरकार को यह भी चाहिए कि भ्रष्टाचार या अनुपातहीन सम्पत्ति के मामलों में पकड़ाए गए अधिकारी-कर्मचारी किसी भी काम में न लगाए जाएं, और उन्हें निलंबन के दौर में आधी तनख्वाह देना या बिना काम बिठाए रखना राज्य के अधिक हित में होगा।
आज देश और प्रदेश में अदालतें भ्रष्टाचार पर सरकार के ढीले-ढाले रवैये के खिलाफ तरह-तरह की दखल दे रही हैं। खुद छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट ने सरकार से उसकी ढिलाई पर बहुत तरह के जवाब-तलब किए हैं। ऐसे में सरकार को भ्रष्ट लोगों को बचाना छोड़कर इस प्रदेश को बचाना चाहिए, क्योंकि ऐसे लुटेरों के पकड़ाने के बाद भी उन्हें आगे लूटने के लिए कुर्सियों पर बनाए रखना खुद सरकार की साख को चौपट करता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें