भूखे बच्चों के देश-प्रदेश में सरकार से ईश्वर को चढ़ावा

संपादकीय
23 फरवरी 2017


तेलंगाना के मुख्यमंत्री टी.चंद्रशेखर राव अपने पूरे कुनबे के साथ दो सरकारी विमानों पर लदकर तिरूपति गए, और सरकारी खर्च पर भगवान बालाजी को साढ़े पांच करोड़ रूपए के गहने चढ़ाकर आए। यह पूरा सिलसिला जनता के पैसों के सरकारी खजाने के बेजा धार्मिक इस्तेमाल का है, और इसके खिलाफ कोई जनहित याचिका दायर करके इसकी वसूली मुख्यमंत्री से की जानी चाहिए। जवाहर लाल नेहरू के देश में आज सरकार का धर्म में ऐसा डूब जाना एक बड़ी शर्मिंदगी की बात है। इसी मुख्यमंत्री के बारे में यह भी खबरें हैं कि इन्होंने अपने निजी वास्तुशास्त्री को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे रखा है, और उसकी सलाह पर पचास करोड़ रूपए का अपना ऐसा महलनुमा मकान बनवाया है जो कि वास्तुशास्त्र के हिसाब से उनके लिए शुभ होगा। यह सब उस तेलंगाना में हो रहा है जो कि अभी-अभी नया राज्य बना है, और जिसमें गरीबी और शोषण के चलते हुए नक्सलियों को मौजूदगी के लिए जमीन मिली हुई है।
सरकार को धर्म में किस हद तक शामिल होना चाहिए, इसे लेकर अधिक अक्ल लगाने की जरूरत नहीं पडऩी चाहिए। धर्म के जो सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू हैं, उन पर तो जनता की जरूरत के हिसाब से हमेशा से ही सरकारें खर्च करती आई हैं, और उनको लेकर कोई विवाद भी नहीं होते। नेहरू के वक्त भी कुंभ का इंतजाम सरकार के पैसों से होता था, मुलायम के समय भी होता था, मायावती के समय भी होता था, और आज भी होता है। इसी तरह वैष्णो देवी से लेकर दूसरे तीर्थों तक सरकार बहुत सा इंतजाम अपने खर्च पर करती हैं। जो अल्पसंख्यक या गरीब तबके हैं, उनको एक खास रियायत की तरह हज यात्रा जैसी रियायत भी मिलती है, और इस हज सब्सिडी को बंद करने के लिए मुस्लिम समाज का भी एक बड़ा हिस्सा मांग करते आया है। हम छत्तीसगढ़ में देखते हैं कि यहां राज्य बनने के बाद शुरू हुए राजिम कुंभ में सरकार हर बरस करोड़ों रूपए इंतजाम में खर्च करती है, और सरकारी जिम्मेदारी से कुछ बाहर जाकर भी साधुओं पर निजी खर्च करके जनता के पैसों का कुछ बेजा इस्तेमाल भी कर लेती है, लेकिन वह धर्म के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू के साथ मिले-जुले खर्च के रूप में खप जाता है।
सरकारों को अपने आपको धर्म पर खर्च से अलग रखना चाहिए। तेलंगाना के मुख्यमंत्री का यह खर्च कोई सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू नहीं रखता। यह पूरी तरह से निजी आस्था की बात है, और गरीब जनता के पैसों से ऐसे खर्च से किसी का भला नहीं होने वाला। ईश्वर अगर ऐसे उपहार या रिश्वत पाकर किसी पर मेहरबानी करने लगें, तो फिर दुनिया के लोगों को काम करना ही क्यों चाहिए, महज प्रार्थना करके और चढ़ावा चढ़ाकर आशीर्वाद खरीद लेना चाहिए। यह सिलसिला बहुत भयानक है, लेकिन तेलंगाना राज्य बनने के आंदोलन से लेकर अभी तक इस राज्य में लोकतंत्र कुछ महत्वहीन सा पड़ा हुआ है, और नए राज्य बनने के एवज में नेता जनता से इस तरह की कई रियायतें कई जगहों पर पा जाते हैं। हमारा ख्याल है यह अदालत के दखल देने का एक पुख्ता मामला है, अगर कोई जनहित याचिका नहीं भी पहुंचती है, तो भी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट खुद होकर इस समाचार पर राज्य सरकार से जवाब मांग सकती हैं, उन्हें मांगना चाहिए कि सरकार ने किस मद से ऐसा खर्च किया है, और ऐसा खर्च बाकी धर्मों के लिए भी किया जाएगा या नहीं? और सरकार का निजी आस्था पर ऐसा खर्च करना कौन से प्रावधान में आता है, और मुख्यमंत्री से इसकी वसूली क्यों न की जाए? भारत में अगर सरकारों को ऐसी छूट मिलती रही, तो यहां तो कई धर्म, आस्था के कई केन्द्र, और कई किस्म के ईश्वर हैं, इन सबको चढ़ावा चढ़ाते-चढ़ाते भूखे बच्चों को मर ही जाना होगा।

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