निजी-पारिवारिक हिंसा रोकने परामर्शदाता तैयार किए जाएं

संपादकीय
15 फरवरी 2017


अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक आदमी ने अपनी पत्नी के चाल-चलन पर शक करते हुए उसे और दो बेटियों को मार डाला, और दो बच्चे बाहर रहने की वजह से बच गए। कुछ दिन पहले प्रदेश के एक दूसरे हिस्से में इसी तरह की हिंसा हुई, और आज दिल्ली की खबर है कि वहां अपने छोटे बच्चों के सामने ही एक आदमी ने पत्नी की डंडे से पीट-पीटकर हत्या की, और उसकी लाश के साथ सोते रहा। हर कुछ दिनों में ऐसी पारिवारिक हिंसा सामने आती है, और वह महज एक पुलिस का आंकड़ा बनकर अदालत तक पहुंचती है, खबर बनती है, फैसले के बाद कैद होती है, और परिवार इस दौर में तबाह हो जाता है।
अब सवाल यह उठता है कि निजी जिंदगी की ऐसी हिंसा को दुनिया की कोई भी पुलिस जाकर वक्त रहते नहीं रोक सकती, क्योंकि किसी के दिल में परिवार के लोगों के खिलाफ ही अगर कोई हिंसक भावना है, तो उसकी शिनाख्त का तो कोई जरिया हो भी नहीं सकता। अब ऐसे में ऐसी हिंसा से बचाव कैसे किया जाए? और ऐसी पारिवारिक हिंसा न महज परिवार पर भारी पड़ती है, बल्कि पूरे समाज पर भारी पड़ती है, और जांच से लेकर अदालत और जेल तक, सरकार की जेब पर भी बोझ बनती है। इसलिए समाज को ऐसी हिंसा से बचाव के रास्ते देखने चाहिए, कोशिशें करने पर ऐसी हिंसा चाहे पूरी तरह बंद न हो, कम जरूर हो सकती है, और उसी के लिए कोशिश करनी चाहिए।
परिवार के भीतर की ऐसी अधिकतर हिंसा एक तनाव के बढ़ते चले जाने और उसके हद से गुजर जाने के बाद होती है। इसके पहले परिवार के लोगों के बीच टकराव को रोकने के लिए, तनाव को रोकने के लिए, परिवार के दूसरे लोग भी मददगार हो सकते हैं, रिश्तेदार और पड़ोसी भी काम आ सकते हैं, दोस्त और सहकर्मी भी इस्तेमाल के हो सकते हैं। हमारा ऐसा मानना है कि किसी भी निजी हिंसा के पीछे आसपास के करीबी लोगों में से कम से कम कुछ लोगों की अनदेखी और लापरवाही भी जिम्मेदार रहती है, जो कि समय पर दखल देने से बचने वाले लोगों की रहती हैं। लेकिन यहां तक तो बात समाज की है, सरकार की भी एक जिम्मेदारी बनती है जिस पर चर्चा जरूर होनी चाहिए।
आज देश-प्रदेश में लोगों के भीतर बढ़ते हुए तनाव को लेकर, उनकी कुंठाओं और उनकी हताशा को लेकर, नाकामयाबी से उपजे उनके मानसिक अवसाद को लेकर समाज के एक बड़े हिस्से को परामर्श की जरूरत है। और यह बात हम आज पहली बार नहीं लिख रहे हैं, पहले भी बहुत बार लिख चुके हैं कि कभी इम्तिहान देते बच्चे तनाव में आत्महत्या कर लेते हैं, तो कभी मनपसंद मोबाइल फोन न मिलने पर किसी गरीब घर की लड़की टंग जाती है। ऐसे सारे मामलों में स्कूल-कॉलेज, और पड़ोस के किसी संगठन से समय रहते अगर सलाह मिल जाए, तो आत्महिंसा या हिंसा की ऐसी नौबत टल सकती है। यह काम सररकार को ही शुरू करना होगा। अभी जैसे स्कूली इम्तिहान शुरू होने के ठीक पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी पत्नी के साथ एक सरकारी स्कूल गए, और बच्चियों का हौसला बढ़ाकर आए। यह तो एक स्कूल की बात हुई, लेकिन प्रदेश भर में ऐसे हजारों परामर्शदाताओं की जरूरत है जो कि बारी-बारी से अलग-अलग स्कूल-कॉलेज में जाकर, अलग-अलग बस्तियों और मुहल्लों में जाकर लोगों के बीच सकारात्मक भावनाओं को बढ़ा सकें।
इसके लिए सररकार को प्रदेश के विश्वविद्यालयों में सामाजिक-मानसिक परामर्श के पाठ्यक्रम शुरू करने होंगे जो कि मनोविज्ञान की पढ़ाई के बाद के होंगे। ऐसे लोग सीधे-सीधे सरकारी नौकरी चाहे न पा सकें, लेकिन इन्हें भत्ता देकर भी काम में लगाया जा सकता है, जिस तरह कि आज शिक्षाकर्मी काम करते हैं, मितानिनें काम करती हैं। समाज के भीतर टीवी और अखबार मिलकर इतनी हिंसा बढ़ा रहे हैं, और लोगों की जिंदगी के तनाव इतने अधिक हो चुके हैं, कि उन्हें घटाने के लिए ऐसी मेहनत जरूरी है। पूरे देश में ही कॉलेज की पढ़ाई के बाद शायद दो-चार फीसदी लोगों को ही उनकी पढ़ाई की वजह से रोजगार या कारोबार मिल पाता है। अगर ऐसी पढ़ाई के बाद परामर्शदाता निकलेंगे, तो हो सकता है कि समाज का एक हिस्सा उन्हें कुछ फीस देकर भी अपने बच्चों की या अपने मन की उलझनों को सुलझाने की कोशिश करे। लेकिन जब तक ऐसे परामर्श की सुविधा हासिल नहीं होगी, लोग खुद होकर अपने तनाव पूरी तरह से नहीं घटा सकते, और ऐसी सुविधा के लिए सरकार को ही विश्वविद्यालयों में ऐसे पाठ्यक्रम शुरू करवाने की पहल करनी होगी। जिस तरह स्कूलों में खेल शिक्षक होते हैं, उसी तरह कम से कम हर शहर या कस्बे में एक-एक स्कूली-परामर्शदाता भी होने चाहिए, और ऐसा होने पर बच्चों का देह शोषण रोकने में भी मदद मिल सकती है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें