ताकतवरों की कैद और सुनवाई दूसरे राज्यों में होना जरूरी हो...

संपादकीय
18 फरवरी 2017


बिहार के बाहुबली कहे जाने वाले, और अनगिनत जुर्म के मामलों से घिरे हुए एक नेता शहाबुद्दीन को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बिहार की जेल से दिल्ली के तिहाड़ जेल लाया जा रहा है क्योंकि बिहार में जेल के भीतर भी इस आदमी का राज चलता है, और उसके खिलाफ चल रहे मामलों में गवाह और सुबूत दोनों ही खत्म होते चलते हैं। ऐसे में उसकी करवाई बताई जाती एक हत्या के मुकदमे में वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से यह अपील की थी कि इसे बिहार से बाहर की जेल में रखा जाए।
देश में ऐसे बहुत से ताकतवर लोग हैं जो जेल के भीतर भी राज करने जितना दमखम रखते हैं, या उतना खर्च कर सकते हैं। कुछ दूसरे तरह की ताकत आसाराम जैसे लोग रखते हैं जिनके बलात्कार के मामले के बावजूद लोग उनके भक्त बने हुए हैं, और जेल से लेकर अदालत तक हर बार सड़कों पर भीड़ लगाकर हंगामा भी करते हैं। ऐसे सारे लोगों को उनके राज्य के बाहर की जेलों में रखना चाहिए, और साथ ही इनके मामले तुरंत ही इनके प्रभामंडल के इलाकों से बाहर की अदालतों में, दूसरे प्रदेशों की अदालतों में भेज देने चाहिए, तभी जाकर किसी तरह की सही सुनवाई हो सकती है। न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया के अधिकतर देशों में जेलों के भीतर मुजरिमों का ही राज चलता है, और जब ऐसे मुजरिम सत्ता या पैसों की ताकत से लैस होते हैं, तो वे वहां से फोन पर बाहर की दुनिया में अपना कामकाज भी चलाते रहते हैं, और गवाहों और सुबूतों को खत्म भी करते रहते हैं। इसी शहाबुद्दीन का हाल यह है कि जब अभी जेल से वह पैरोल पर बाहर निकला था, तो उसे लेने के लिए बिहार के कई मंत्री-विधायक पहुंचे थे। अब आज अगर शशिकला को कर्नाटक के बजाय तमिलनाडू की जेल में रखा गया होता, तो उनके चरण धोने के लिए रोज पहुंचने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री को देखते हुए जेल के कर्मचारी उन पर कौन से नियम लागू कर सकते थे?
भारत की न्याय व्यवस्था में मामले की शुरुआत पुलिस या इस तरह की दूसरी जांच एजेंसी से शुरू होती है, और उसके बाद गवाह और सुबूत जुटने पर मामले अदालत में पहुंचते हैं, इसके बाद जांच रिपोर्ट, गवाह, सुबूत, अदालती कर्मचारी, सरकारी वकील, और जज, इनमें से जो-जो बिकाऊ हों, उन सबको खरीदने का सिलसिला शुरू होता है। इस खरीदी के बाद अगर मामले में कोई दम बचता है, तो ही वह आगे घिसटता है, और मुजरिमों की ताकत मामले के पैरों में बेडिय़ां बांध देती है ताकि वह पैदल चाल से भी न चल सके। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को एक ऐसा नियम बनाना चाहिए कि मंत्री, सांसद, विधायक, और बड़े अफसर, एक सीमा से अधिक संपन्नता वाले लोग, ऐसे तमाम लोगों को प्रदेश के बाहर की जेल में ही रखा जाए, और गवाह या सुबूत खत्म होने की शिकायत आने पर उनके मुकदमे ही दूसरे प्रदेश में भेज दिए जाएं। गुजरात में मुठभेड़-हत्याओं के मामलों में दिग्गज आईपीएस अफसर बंजारा का ऐसा ही किया गया था।
लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि मध्यप्रदेश के जिस व्यापम घोटाले की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने अभी पिछले कुछ दिनों में ही सैकड़ों मेडिकल छात्रों का दाखिला खारिज किया है, उस मामले में किस तरह इसी भाजपा सरकार के मंत्री से लेकर अफसर तक, और कई ताकतवर नेता तक शामिल थे, और जेल में बंद रहने के बाद जब ऐसे मंत्री बाहर निकले तो उनकी भव्य शोभायात्रा निकाली गई थी, बड़ा स्वागत किया गया था। और इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान इससे जुड़े हुए गवाह, छोटे-मोटे अभियुक्त, और जांच अफसर मिलाकर शायद चार दर्जन के करीब लोग रहस्यमय तरीके से मारे गए। यह ऐसा ही एक मामला था जिसमें सत्ता की सीधी भागीदारी एक बड़े जुर्म में साबित हो रही थी, फिर भी उसे मध्यप्रदेश में ही चलाया गया, मध्यप्रदेश में ही उसकी जांच की गई, और लोगों को अपनी ही सरकार की जेल में रखा गया।
हमने ऐसे ही खतरों के बारे में एक बार पहले यह भी लिखा था कि जब किसी राज्य में सत्ता पर बैठे लोगों पर ही किसी जुर्म में शामिल होने के आरोप लगते हैं, तो उसकी जांच अपने आप केन्द्र सरकार की किसी जांच एजेंसी को देने की एक व्यवस्था करनी चाहिए। आज केन्द्र की जांच एजेंसी सीबीआई तभी तस्वीर में आती है जब राज्य सरकार ऐसी जांच की सिफारिश करती है, और राज्य सरकारें आमतौर पर यह चाहती हैं कि जांच उनके कब्जे की पुलिस से परे न जाए। भारत में न्याय की किसी भी संभावना के खत्म होने की यह एक बड़ी वजह रहती है, और इसके खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट को कोई आदेश देना चाहिए।

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