न ज्ञान, न समझ, बच्चे महज इम्तिहानों की अंधी दौड़ में..

संपादकीय
13 फरवरी 2017


राजस्थान की एक खबर है कि वहां सरकारी स्कूल में बोर्ड परीक्षा में सौ फीसदी नतीजे लाने के लिए, और मेरिट में जगह पाने के लिए बच्चों को रात-दिन पढ़ाया जा रहा है, और उनके लिए स्कूल में ही रजाई-बिस्तर का इंतजाम कर दिया गया है। शिक्षक भी रात भर उनको पढ़ाने के लिए स्कूल में ही रूक रहे हैं। कुछ हफ्ते पहले एक दूसरी खबर आई थी कि कहीं और एक स्कूल में रिकॉर्ड बनाने के लिए सुबह 4 बजे से शिक्षक निकलते हैं, और बच्चों को जगाकर लेकर आते हैं। इस स्कूल में साल के हर दिन क्लास लगने की भी बात उस खबर में थी।
पढ़ाई के लिए हिन्दुस्तान में बावलापन मोटे तौर पर इम्तिहान में बेहतर नतीजे पाने के लिए बावलेपन में बदल गया है। मां-बाप से लेकर स्कूल तक बच्चों को मानो कोल्हू में बैल की तरह जोत देते हैं कि उनका कितना अधिक तेल निकाला जा सकता है। और यह हाल तो तब है जब राजस्थान के कोटा जैसे प्रवेश-परीक्षा तैयारी के कारखाने की बात नहीं की जा रही है। कोटा में तो आईआईटी जैसी परीक्षाओं में कामयाब करने के लिए स्कूल के आखिरी कई बरस बच्चे झोंक दिए जाते हैं, और हर बरस इनमें से कई बच्चे खुदकुशी कर लेते हैं।
स्कूल की पढ़ाई को हिन्दुस्तान में सब कुछ मान लिया जाता है। और यह पढ़ाई भी ज्ञान और समझ पाने के लिए नहीं होती, यह इम्तिहान में पास होने और अधिक नंबर पाने के लिए ही रहती है, और नतीजा यह होता है कि अंकसूची को ज्ञान मान लिया जाता है। बच्चों की जिंदगी के स्कूली बरस सबसे अधिक असर डालने वाले होते हैं, और इन बरसों में उन पर मां-बाप की उम्मीदों से लेकर स्कूल के दबाव तक का हाल ऐसा रहता है कि हर बरस उन्हें गिनाया जाता है कि जिंदगी में इस बरस के इम्तिहान में नंबर पाना ही सब कुछ है, और उसके अलावा जिंदगी में कुछ भी नहीं है। जबकि दुनिया का इतिहास बताता है कि जो सबसे कामयाब महान लोग हुए हैं, वे स्कूलों में पढ़ाई में बहुत मामूली रहे हैं, और बहुत से तो मुश्किल से पास हुए। अभी-अभी दुनिया की एक सबसे कामयाब चीनी कम्पनी अली बाबा के संस्थापक जैक मा ने किसी भाषण या इंटरव्यू में कहा है कि वे अपने बच्चों को बहुत अधिक नंबर पाने के किसी दबाव में नहीं रखते, उनका मानना है कि ठीक-ठाक नंबर मिल जाएं वही बहुत है। वे खुद एक बहुत गरीब स्कूल में पढ़े और यहां तक पहुंचे।
हिन्दुस्तानी मां-बाप और स्कूलों को यह समझना चाहिए कि बच्चों की जिंदगी के ये बरस दुबारा नहीं आने वाले रहते। और इन बरसों में न सिर्फ किताबी पढ़ाई जरूरी है, बल्कि खेलकूद भी जरूरी है, जैसा कि जापानी स्कूलों में होता है, बच्चों का अपने आसपास की सफाई का काम करना भी जरूरी है, उनमें रचनात्मकता, कल्पनाशीलता, और लीडरशिप की संभावनाओं को देखना भी जरूरी है। और इन सबके लिए इन बच्चों के दिल-दिमाग से पढ़ाई के बोझ को घटाना भी जरूरी है। हर दिन बच्चों के पास कुछ घंटे उनकी हॉबी के लिए, सामान्य ज्ञान के लिए, उन्हें बेहतर इंसान बनाने के लिए, उन्हें सामाजिक सरोकार सिखाने के लिए, और उन्हें किताबों से परे की समझ देने के लिए भी लगाने चाहिए। भारत में इम्तिहानों में एक-एक नंबर को लेकर, और क्लास में या स्कूल में अव्वल आने को लेकर जिस तरह का दबाव बच्चों पर डाला जाता है वह उनके शारीरिक-मानसिक विकास, और उनके व्यक्तित्व-विकास सभी को बुरी तरह प्रभावित करता है। ऐसे में स्कूली इम्तिहान में नंबरों के बजाय ग्रेड देने पर भी विचार करना चाहिए, ताकि बच्चे एक-एक नंबर के मुकाबले में न लगे रहें, और बचपन से किशोरावस्था तक की उम्र में वे दुनिया की दूसरी बहुत सी अच्छी बातों को समझ और सीख भी सकें। भारत पहले पढ़ाई के इम्तिहान में उलझा रहता है, और उसके तुरंत बाद किसी जगह दाखिले के मुकाबले के इम्तिहान में। यह देश अपने बच्चों को न तो ज्ञान दे पा रहा है, न समझ दे पा रहा है, इन्हें महज एक मुकाबले में लगातार जोतकर रख रहा है, यह नौबत किसी का भला नहीं करती।

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