जो मार डाले, वह राष्ट्रीय पशु और जो सेवा करे, वह गाली!

संपादकीय
24 फरवरी 2017


कृश्नचंदर ने जब एक गधे की आत्मकथा लिखी तो उन्हें यह अंदाज नहीं रहा होगा कि एक दिन भारतीय राजनीति में गधे का महत्व इतना बढ़ जाएगा। भारत की लोकोक्तियों में कहावतों और मुहावरों में तो गधे का महत्व हमेशा से रहा है, किसी को मूर्खता के लिए गाली देने के लिए गधे से अधिक उपयुक्त कोई और नाम बोलियों को सूझा नहीं था। फिर हिन्दुस्तानी स्कूलों में भी कमसमझ बच्चों को कोसने के लिए गधे का ही इस्तेमाल होता है, और इंसान अपने बीच के लोगों की मूर्खता की सबसे बड़ी मिसाल गधे में ढूंढते हैं, क्योंकि गधा इंसानों को काटता और मारता नहीं है, वह पूरी ईमानदारी से मेहनत करता है, चाहे वह धोबी के यहां रहे, चाहे वह कुम्हार के यहां रहे, और चाहे वह सिलबट्टा लादकर चले। और इंसान तो होते ही ऐसे एहसानफरामोश हैं कि जो जानवर उन्हें मारकर खा जाए, उस शेर को, सिंह को, बाघ को वे राष्ट्रीय पशु से लेकर राजकीय चिन्ह तक बना देते हैं, और जो गधा मरते दम तक इंसान की सेवा करे, उसे गाली की मिसाल के लायक ही माना जाता है। गधा इस किस्म का एहसानफरामोश भी नहीं होता है।
फिर हाल हिन्दुस्तानी चुनावी राजनीति में गधे पर निकली बात कुछ अधिक दूर तक निकल जा रही है। इसकी शुरुआत शायद उत्तरप्रदेश के नौजवान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने की, और चुनावी सभा में  गुजरात के गधों पर तंज कसते हुए अमिताभ बच्चन से कहा कि वे गधों का इश्तहार न करें। अब यह तो हमें नहीं मालूम कि उनका इशारा नरेन्द्र मोदी या अमित शाह की तरफ था या नहीं, जो कि गुजरात से आकर देश और अब उत्तरप्रदेश पर भी राज करने की कोशिश में हैं, लेकिन यह बात आगे बढ़ गई, और प्रधानमंत्री ने अपने आपको गधे की तरह मेहनत करने वाला खुद ही कह दिया, क्योंकि मेहनत के सम्मान करने की एक बड़प्पन की बात है, और गधे को गाली की तरह इस्तेमाल करने से बहुत बेहतर बात भी है। अब आज गुजरात के नौजवान आरक्षण-आंदोलनकारी हार्दिक पटेल का बयान आया है जिसमें उन्होंने गुजरात के अपने समाज के सभी 44 पाटीदार विधायकों को गधा कहा है। हार्दिक पटेल ने पाटीदार समाज के आरक्षण के लिए एक लंबा और ऐतिहासिक आंदोलन चलाया है, और जेल के बाद प्रदेशबदर होकर वे अब गुजरात लौटे हैं, और आंदोलन की कामयाबी की वजह से उनको बाकी लोगों पर कुछ कहने का एक नैतिक अधिकार भी मिला है। अभी हार्दिक ने कहा- मुझसे लोग पूछते हैं कि इतने बड़े आंदोलन से आपको क्या मिला, तो मैं जवाब देता हूं कि हमें 44 पाटीदार गधे विधायक मिले जो 14 पाटीदार युवाओं की मौत के बाद भी कुछ नहीं बोल रहे हैं।
बात जब निकलती है तो फिर वह दूरतलक जाती है, और गधे पर चर्चा इतनी हो गई है कि कम से कम मेहनत पर चर्चा होने लगी है, मेहनतकश पर चर्चा होने लगी है, और इस बहाने गुजरात में उन जंगली गधों पर भी खूब चर्चा हो रही है जो कि दुनिया में दुर्लभ हैं, और गुजरात आने वाले वन्यजीवन प्रेमियों के लिए पर्यटन का एक बड़ा मुद्दा हैं। किसी जानवर को, पशु-पक्षी या मछली को गाली की तरह इस्तेमाल करने के खिलाफ एक जागरूकता की जरूरत है, और मोदी ने यह एक काम ठीक किया है कि उन्होंने गधे को गाली मानने से ही इंकार कर दिया, और उससे मेहनत की प्रेरणा पाने की बात कही है। लोकभाषाओं में हमेशा से ही कई तरह के सामाजिक अन्याय की मजबूत बुनियाद रही है, और यह परंपरा ताजा भाषाओं में भी चली आ रही है। लोगों को यह सिलसिला खत्म करना चाहिए।

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