सुरक्षाबलों से जुड़े मुद्दे न तो देशपे्रम हैं, और न ही गद्दारी

संपादकीय
10 जनवरी 2017


बीएसएफ के एक जवान ने अपने अफसरों से शिकायत का एक वीडियो बनाया, और सरहद पर काम करने की बदहाली का नजारा दिखाते हुए प्रधानमंत्री से मांग की कि वे इसकी जांच कराएं कि ग्यारह-ग्यारह घंटे लगातार बर्फ पर तैनाती के पहले और बाद उन्हें किस तरह का बुरा खाना मिलता है। मीडिया में यह वीडियो आते ही केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बीएसएफ से इस पर रिपोर्ट मांगी है, और बीएसएफ ने अपनी पहली सफाई में इस जवान के खिलाफ ही दुनिया भर का कहा है कि इसके खिलाफ बहुत शिकायतें पहले से चली आ रही थीं।
अब सोशल मीडिया दो तरह से उबल रहा है। बहुत से लोग इस वीडियो का पहली नजर में हकीकत मानकर यह कहते हुए टूट पड़े हैं कि देश की सरहद पर शहादत के लिए भी तैयार लोगों को अफसरी भ्रष्टाचार इस तरह झेलना पड़ रहा है। मीडिया ने भी पहली नजर में इस शिकायत को हकीकत मानते हुए बीएसएफ अफसरों को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार मान ही लिया है। इस देश में जब कभी फौज, सरहद, देश की रक्षा, और शहादत जैसे शब्द किसी चर्चा में आते हैं, तो वहां पर फौज या वर्दीधारियों की की हुई ज्यादतियों की कोई चर्चा करना भी देश के साथ गद्दारी मान लिया जाता है। कश्मीर और मणिपुर बरसों से संघर्ष कर रहे हैं कि सशस्त्र बलों को उनके किसी जुर्म से भी बचाने वाले कानून को खत्म किया जाए, लेकिन ऐसे इलाकों में काम करने वाली फौज और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों का यह मानना है कि उन्हें झूठी शिकायतों का शिकार बनाया जा सकता है, और जब तक उन्हें खास कानूनी हिफाजत नहीं मिलेगी, उनका काम करना मुश्किल होगा।
आज जब हम यह बात लिख रहे हैं, छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह राज्य के तमाम पुलिस अफसरों की बैठक ले रहे हैं, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के ताजा नोटिस को देखते हुए वे यह हिदायत दे रहे हैं कि नक्सल इलाकों में भी कार्रवाई करते हुए मानवाधिकारों का सम्मान किया जाए। हालांकि छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में तैनात पुलिस अफसरों के चेहरों पर इससे कोई शिकन नहीं पडऩी है, क्योंकि वे एक किस्म से लोकतंत्र के प्रति जवाबदेही से पूरी तरह आजाद हैं, और कितनी ही हत्याओं और कितने ही बलात्कारों की तोहमत उन पर लगे, वे पूरी तरह महफूज हैं। दूसरी तरफ यह बात भी है कि बस्तर के नक्सल मोर्चे पर तैनात पुलिस और बाकी सुरक्षा बल बदहाली में ड्यूटी करते हैं, मच्छरों के हाथों भी मारे जाते हैं, और नक्सली उन्हें दर्जनों की संख्या में थोक में मारते हैं। जहां अपनी जान पर इतना भयानक खतरा हो, वहां पर जाहिर है कि सुरक्षाकर्मी मानवाधिकार की फिक्र को किताबों में छोड़कर काम करते होंगे।
सुरक्षाबलों को जब मुश्किल हालात में काम करना पड़ता है, तो उनका रवैया बहुत बार अलोकतांत्रिक हो जाता है, काम के तनाव में करीब-करीब हर हफ्ते ही ऐसे मोर्चों पर कोई न कोई आत्महत्या होती है। नक्सल मोर्चों पर देश में हर बरस सैकड़ों जवान मारे जाते हैं। ऐसे में सुरक्षाबलों की अपनी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ, उनकी जवाबदेही भी तय करने की जरूरत रहती है। और देश की आबादी को इस खुशफहमी में जीना बंद कर देना चाहिए कि सुरक्षाबलों के भीतर भ्रष्टाचार या फौज की ज्यादती के मुद्दों को न उठाना देशप्रेम है। जहां कहीं सरकारी वर्दीधारी लोगों की ज्यादतियों को अनदेखा किया जाता है, वहां-वहां जनता के बीच भी बगावत और सत्ता के लिए नफरत पैदा होने लगती हैं। कुल मिलाकर सुरक्षाबलों का मुद्दा इन दोनों ही वजहों से अनदेखा नहीं करना चाहिए, न उन पर खतरे और दिक्कतों को अनदेखा करना चाहिए, और न ही उनकी ज्यादतियों को।

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