नब्बे बरस के हो चुके नेताओं के दल-बदल की हसरत की अर्थी..

संपादकीय
19 जनवरी 2017


कल जिस तरह अपने बुढ़ापे में माने हुए बेटे के लिए कांग्रेस के बुजुर्ग नेता नारायण दत्त तिवारी ने कांग्रेस का पल्ला छोड़कर भाजपा का दामन थामा है, वह कई लोगों को चौंका सकता है, लेकिन राजनीति में इस तरह की बातें हर चुनाव के पहले सामने आती हैं, और एक पार्टी की गंदगी को दूसरी पार्टी ले जाकर अपनी तश्तरी में सजाती है। यह अधिकतर पार्टियों के साथ चलता है, शायद वामपंथियों के अलावा। लेकिन कुछ लोग यह भी सोच सकते हैं कि जिस नारायण दत्त तिवारी को कांग्रेस ने कई बार मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, राज्यपाल, सब कुछ बनाया, और हैदराबाद के राजभवन से निकले हुए जिनके अश्लील वीडियो भी पार्टी ने बर्दाश्त की है, जिनकी शादी के बाहर की अवैध कही जाने वाली संतान के साथ उनकी बरसों की मुकदमेबाजी भी पार्टी ने बर्दाश्त की, उस पार्टी को इस बुजुर्ग नेता ने अपने आखिरी दिनों में इस तरह छोड़ दिया जैसे वह पार्टी अब अचानक अवैध संतान बन गई हो।
भारत में कई किस्म के दल-बदल होते हैं। चुनावों के ठीक पहले जिन लोगों को अपनी पार्टी में टिकट नहीं मिलता है, वे लोग दूसरी पार्टियों की तरफ भागते हैं, और वहां पर उनकी अच्छी खातिरदारी भी होती है, और जीत की संभावनाओं को देखते हुए उन्हें चुनाव में टिकट भी दी जाती है। कांग्रेस के एक बड़े नेता रहे हेमवती नंदन बहुगुणा की दो औलादों को कांग्रेस ने सिर पर बिठाया, और इन भाई-बहनों ने उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में अपनी पार्टी की संभावनाओं का भ_ा ही बिठा दिया। इसके बाद दोनों ही भाजपा में चले गए, और अब उनकी अगली पीढ़ी भाजपा की टिकट से चुनाव मैदान में भी है। इस नौबत को लेकर कई तरह के कार्टून भी मीडिया में तैर रहे हैं कि अपने पुराने वफादार कांग्रेसी सांसद को कमल छाप पर वोट लगाकर फिर सांसद बनाएं।
चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को विधि आयोग के साथ मिलकर देश के सामने ऐसी नौबत पर बहस शुरू करवानी चाहिए। ये संवैधानिक संस्थाएं कोई फैसला तो नहीं दे सकतीं, और जो संसद ऐसा कोई कानून बना सकती है, और जिसमें विधानसभाओं की मदद की जरूरत होगी, वहां पर दल-बदल का बड़ा सम्मान है। थोक में भी दल-बदल हो सके, उसी हिसाब से दल-बदल का कानून बनाया गया, और कई छोटे राज्यों में रातों-रात सरकार ने अपनी राजनीतिक जात ही बदल डाली। इसलिए ऐसी संसद से किसी सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती, और जनता में वैसी राजनीतिक समझ है नहीं कि दलबदलुओं को हरा सके। इसलिए समाज के भीतर एक जागरूकता लाने के लिए एक बहस की जरूरत है कि दलबदलुओं के चुनाव लडऩे पर किस तरह की रोक लग सके।
एक काल्पनिक विकल्प हमारी नजर में यह दिखता है कि चुनाव की घोषणा हो जाने के बाद दल-बदल करने वाले लोगों के उस चुनाव लडऩे पर रोक लगनी चाहिए। ऐसा कानून आसान नहीं होगा, और यह बात कहने वाले भी बहुत लोग मिलेंगे कि लोकतंत्र को कानूनों से बांधकर नहीं चलाया जा सकता और इसके लिए गौरवशाली परंपराओं की जरूरत पड़ती है। लेकिन भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में हम देखते हैं कि गौरवशाली परंपराओं की जगह एक गाली की तरह की गौरवसाली परंपराओं ने ले लिया है, और जितने भी चुनाव सुधार पिछले दशकों में हुए हैं, वे सारे के सारे चुनाव आयोग के कानूनी दायरे के बढऩे की वजह से हुए हैं, राजनीतिक दलों ने खुद होकर अकेले या सामूहिक रूप से किसी चुनाव-सुधार के लिए कोई पहल नहीं की है।
ऐसे में चुनाव आयोग को ही नब्बे बरस के हो चुके नेताओं के दल-बदल की हसरत की अर्थी निकालने का काम करना पड़ेगा।

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