संघ नेता के आरक्षण विरोधी बयान का दाम भाजपा देगी

संपादकीय
21 जनवरी 2017


बिहार चुनाव के पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख ने आरक्षण के खिलाफ एक बयान दिया था, और बाद में संघ और भाजपा उसे सुधारने की कोशिश करते-करते थक गए, लेकिन बात बनी नहीं। जो नुकसान होना था, वह विधानसभा चुनाव में भाजपा को झेलना पड़ा। अब उत्तरप्रदेश चुनाव के ठीक पहले जयपुर के एक साहितय महोत्सव में आरएसएस के मनमोहन वैद्य ने आरक्षण खत्म करने की चर्चा छेड़ते हुए कई बातें कहीं, और उन्हें लेकर एक नया बवाल खड़ा हो गया है। यह याद रखने की जरूरत है कि देश के किसी भी और राज्य के मुकाबले उत्तरप्रदेश में आरक्षण एक बहुत बड़ा मुद्दा है, और आरक्षित तबकों की राजनीति करने वाली बसपा की मायावती इसी प्रदेश से राज करने के लिए आती हैं। पहले भी वे यहां पर मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, और उनकी पार्टी का सबसे बड़ा जनाधार इसी प्रदेश में है।
आज दिक्कत यह हो गई है कि विशुद्ध रूप से एक साहित्य के कार्यक्रम में भी संघ के एक वरिष्ठ व्यक्ति ने एक निहायत सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे को छेड़कर न सिर्फ साहित्य महोत्सव पर चर्चा को मोड़ दिया, बल्कि उत्तरप्रदेश के चुनाव में भाजपा को इसका जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। इसकी एक और वजह भी है कि पिछले दो बरस में भाजपा और संघ परिवार के संगठनों ने लगातार गोरक्षा के मुद्दे पर, खानपान और पहरावे के मुद्दे पर जिस तरह की एक शुद्धतावादी और सवर्ण सोच को आक्रामकता के साथ आगे बढ़ाया है, उससे भारत के अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, पिछड़े तबके के लोग, और महिलाओं के बीच एक बड़ी दहशत फैली है, और तनाव फैला है। ऐसा लगने लगा कि देश को 21वीं सदी से वापिस घसीटकर 18वीं सदी की ओर ले जाने की कोशिश हो रही है, और कुछ दिनों में हो सकता है कि सतीप्रथा के हिमायती भी बयान देने लगें।
यह पूरा माहौल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उन दावों के ठीक खिलाफ जाता है जिनमें वे भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी में दुनिया के तीन सबसे बड़े देशों में पहुंचता हुआ बताते हैं। भारत के समाज को टुकड़ों में बांटकर, और बड़ी-बड़ी आबादी वाले तबकों को बुरी तरह से कुचलकर कोई अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती। देश में सामाजिक तनाव बढ़ाया जा रहा है, और अर्थव्यवस्था इसकी वजह से चौपट हो रही है, लोगों का मनोबल टूट रहा है, और देश के भीतर वैज्ञानिक सोच खत्म हो रही है। ऐसे कई किस्म के नुकसान अनदेखा करके अब आरक्षण के खिलाफ जो बयान आया है, वह बहुत ही खराब है, सामाजिक समानता के खिलाफ है, और इसका नुकसान महज भाजपा को ही उठाना पड़ेगा, क्योंकि संघ खुद तो चुनाव लड़ता नहीं है।

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