अपने खुद के ताने-बाने जलाते और दूसरों पर बम गिराते आभासी-लोकतंत्र

आजकल
23 जनवरी 2017  
अमरीका में डोनाल्ड ट्रंप के चुने जाने के पहले तक बाकी दुनिया के लोगों को, और खुद अमरीका के भीतर के वोटरों को ऐसा लगता था कि ट्रंप जीत नहीं पाएगा। जिस तरह से वह अमरीकी कानून का फायदा उठाकर कई बार अपने कारोबार को दीवालिया घोषित करके टैक्स का फायदा उठाते रहा, कैसिनो जैसा धंधा करते रहा, संकीर्णतावादी मानी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी का नेता रहते हुए जिसका चाल-चलन बदनाम रहा, जिसकी हरकतें अश्लील, फूहड़, हिंसक, और अमानवीय रहीं, जिसकी सोच 18वीं सदी की, लोकतंत्र से पहले की रहीं, जिसका निजी जीवन संकीर्ण जीवन-मूल्यों से उल्टा रहा, वह चुनाव जीत गया, और आज अमरीका का राष्ट्रपति है। बहुमत ने उसे चुना, और बहुमत के फैसले को लेकर कुछ बुनियादी सवाल खड़े हुए।
लोकतंत्र जिस बहुमत की पसंद की बुनियाद पर टिका हुआ है, क्या वह सचमुच लोकतंत्र है? यह सवाल अमरीका से परे हिन्दुस्तान के अलग-अलग प्रदेशों में और अलग-अलग लोकसभा या विधानसभा सीटों पर बार-बार उठ खड़े होते हैं। जिन लोगों को लगता है कि हिन्दुस्तानी जनता एक काबिल और ईमानदार प्रतिनिधि चुनना चाहती है, उनकी यह सोच उनकी एक हसरत जरूर हो सकती है, हकीकत नहीं है। हकीकत तो यह है कि अधिकतर सीटों पर जीत को या तो ताजा भुगतान से नगद खरीदा जाता है, या फिर बिना नगदी के धर्म और जाति के आधार पर हासिल किया जाता है। कुछ अधिक पेशेवर सांसद और विधायक, और अब तो पार्षद और पंच-सरपंच भी, ऐसे होते हैं जो कि पांच बरस तक किस्तों पर ऐसी जीत को खरीदते हैं, और कुछ बकाया भुगतान आने वाले पांच बरस में भी धीरे-धीरे करते हैं।
ट्रंप को ही कोसना, और अमरीकी वोटरों को जाहिल कहना इसलिए ठीक नहीं है कि खुद हिन्दुस्तान में ऐसी अनगिनत वजहें हैं जो कि सारी की सारी बुरी हैं, लेकिन वे चुनाव जीतने के लिए काम बहुत आती हैं। और फिर हम जीत के आंकड़ों को देखें, तो किसी एक सीट से जीत से लेकर किसी प्रदेश या देश में किसी एक पार्टी या गठबंधन की जीत तक, नंबर एक और नंबर दो का फासला इतना कम रहता है, और जीतने वाले को भी मिले हुए वोट घर बैठे वोटरों की गिनती से इतने अधिक होते हैं, कि मतदाता की पसंद कही जाने वाली चीज के पास ऐसा कोई सुबूत नहीं होता कि वह सचमुच मतदाता की पसंद है। हिन्दुस्तानी चुनाव पसंद न बताने वाले घर बैठे वोटर तय करते हैं, मैदान में उतरे हुए दूसरे, तीसरे, और चौथे नंबर के उम्मीदवार वोटों को बांटकर, वोटकटवा होकर तय करते हैं, मैदान में उतारे गए फर्जी नीयत वाले उम्मीदवार टक्कर के उम्मीदवार के थोड़े-बहुत धर्म-जाति-आधारित वोटों को नोंचकर तय करते हैं। इसलिए भारत की चुनावी जीत का देश के मतदाताओं के बहुमत से कोई लेना-देना नहीं रहता। जीत का यह झांसा कुछ उसी तरह का रहता है जिस तरह कि कोई भारत-सुंदरी बन जाती है, जो कि देश की सबसे खूबसूरत युवती कहलाती है, हालांकि वह महज उन लोगों के बीच अधिक सुंदर रहती है, जो कि मुकाबले में उतरी होती हैं, न कि देश की बाकी युवतियों से अधिक सुंदर।
हम फिर से चुनावों की तरफ लौटें तो यह बात साफ दिखती है कि भारत की अधिकतर सीटों पर नतीजे इस बात से तय होते हैं कि उम्मीदवार का धर्म क्या है, उसकी जाति क्या है, वह लोगों पर कितना खर्च करने की ताकत रखता है, और वह बाहुबल से या सरकार पर अपने दबदबे से कितने गलत फैसले करवा सकता है, कितने गुनहगार छुड़वा सकता है, कितने बेकसूर अंदर करवा सकता है। चुनाव के वक्त वह कितना खर्च कर सकता है, और चुनाव के बाद उसके पास जाने पर वह जरूरतमंद को कहां से कितना पैसा दिला सकता है, या दे सकता है। ये सारी बातें वोटरों के बीच भारी मायने रखती हैं। इसलिए अब हिन्दुस्तानी चुनाव न सिर्फ वोट के वक्त दी गई रिश्वत से तय होते हैं, बल्कि पिछले बरसों में नेता के किए हुए पूंजी निवेश से भी तय होते हैं, और आने वाले बरसों के लिए लोगों को मिलने वाले दिलासे से भी तय होते हैं।
ऐसे में भारत जैसा लोकतंत्र वोटर लिस्ट से लेकर वोट मशीन तक के मामले में तो एक माहिर मशीन बन चुका है, लेकिन बाकी बातों को अगर ध्यान से देखा जाए तो किसी एक सीट से लेकर पूरे प्रदेश या पूरे देश तक का फैसला निहायत ही अलोकतांत्रिक बातों से तय होता है। दिक्कत यह है कि भारत में चुनाव को निष्पक्ष और स्वतंत्र महज इसलिए मान लिया जाता है कि इसकी मशीन के कलपुर्जे अब ऐसे कस चुके हैं कि वे बड़ी चिकनाई से अपना काम करते हैं, और मशीन को लोकतंत्र मानने का झांसा लोग अपने आपको देते रहते हैं।
हम मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ को लें, जहां पर कि पिछले विधानसभा चुनाव में जीतने वाली पार्टी भाजपा, और हारने वाली पार्टी कांग्रेस के बीच वोटों का फासला महज पौन फीसदी था। अब लोग अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र को अगर देखें कि वहां पर कौन सी नाजायज बातों से पौन फीसदी का ऐसा फासला बना होगा, तो हर सीट पर ऐसे दो-दो, चार-चार मुद्दे दिख जाएंगे जिनकी वजह से ऐसा फासला हुआ होगा। इसलिए चुनावी जीत को लेकर अगर अविभाजित मध्यप्रदेश के एक मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा था कि चुनाव मैनेजमेंट से जीता जाता है, तो वह बात एक हद तक सही है। वह बात दिग्विजय सिंह को बड़ी आलोचना इसलिए दिला गई थी कि वह लोगों के लोकतंत्र पर घमंड को चोट पहुंचाती थी, लेकिन हकीकत यह है कि वही बात हकीकत है, और घमंड में कोई सच्चाई नहीं है, लोकतंत्र कहीं भी देश को सचमुच की पसंद नहीं देता, बेहतर पसंद नहीं देता, और सबसे अच्छी पसंद तो बिल्कुल भी नहीं देता। इसीलिए बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है, जैसी सरकार के वे हकदार होते हैं।
आज भारत के लोकतंत्र में चुनाव लडऩा, जीतकर आना, और फिर अगले चुनाव की जीत की संभावना बनाए रखना, यह सब कुछ इतना मुश्किल काम हो गया है, और ऐसे कड़े मुकाबले का काम हो गया है कि उससे ईमानदारी बाहर हो गई है। इसे समझना हो तो कारोबार की जुबान में समझ सकते हैं कि जिस औद्योगिक-बाजार में अधिकतर कारखाने चोरी की बिजली पर चलते हों, चोरी और टैक्स चोरी के कच्चे माल पर चलते हों, जहां वे एक्साईज-चोरी पर चलते हों, जहां वे मजदूर कानूनों, पर्यावरण कानूनों को तोड़कर चलते हों, वहां पर कोई अगर यह सोचे कि वह ईमानदारी से और सारे नियम-कायदों के तहत कारखाना चला ले, तो उनका धंधा बंद होने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। भारत के लोकतांत्रिक चुनावों में ठीक ऐसी ही नौबत रहती है जहां सारे कायदों को तोड़कर, सारी ईमानदारी को छोड़कर लोग चुनाव लड़ते हैं, और उन्हीं तमाम बातों की मदद से जीतते हैं, जिन बातों को लोकतंत्र नाजायज मानता है।
ट्रंप से लेकर हिन्दुस्तान तक, लोकतंत्र एक झांसा बन गया है, एक ऐसा झांसा जो कि अपने भीतर अपने लोगों के बीच नफरत की लपट से ताने-बानों को जलाने पर उतारू है, जलाते चल रहा है, और दूसरी तरफ अपने इस आभासी (वर्चुअल) लोकतंत्र का दंभ भरते हुए जो दूसरे देशों पर बम गिराकर लाखों बेकसूर भी मार रहा है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की 120वीं जयंती और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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