मुलायम जीवाश्म बन रहे, वैचारिक-वानप्रस्थ बेहतर

संपादकीय
30 जनवरी 2017


उत्तरप्रदेश में कल समाजवादी पार्टी के नए नौजवान मुखिया अखिलेश यादव और कांग्रेस के मुखिया राहुल गांधी के बीच जिस खुले दिल से एका सामने आया, वह भारतीय राजनीति में एक नई शुरुआत है। इसे देखकर यह भी लगता है कि ऐसी किसी नई पहल के लिए एक नई पीढ़ी की जरूरत भी जरूरी होती है जो कि पूर्वाग्रहों से मुक्त हो और खुले दिमाग से सोच सके, आज की भी, और आने वाले कल की भी। दूसरी तरफ कल ही समाजवादी पार्टी से हटाए गए और हार गए अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने इस ताजा गठबंधन पर कहा है कि वे इसके खिलाफ हैं और इसके लिए चुनाव-प्रचार नहीं करेंगे। इन दो अलग-अलग रुखों पर एक साथ नजर डालने की जरूरत है।
बहुत से विचारक यह मानते हैं कि आगे की सोचने के लिए पहले का सीखा हुआ भूलना भी जरूरी होता है। स्लेट को क्लीन किए बिना स्कूली बच्चे भी अगले दिन कुछ नहीं सीख पाते। मुलायम सिंह की स्लेट एक लंबे राजनीतिक जीवन की लिखावट से भरी हुई है। उनके दशकों के अनगिनत तजुर्बे हैं और अनगिनत अधूरी हसरतें हैं। आज भारत के लोकतंत्र में जिस तरह नए राजनीतिक गठबंधनों की बेबसी जरूरी हो गई है, मुलायम सिंह उसे अनदेखा करके अतीत के दंभ में जी रहे हैं। उनके पास बीता हुआ कल है और आने वाले कल को लेकर शायद प्रधानमंत्री बनने की निजी हसरत है। दूसरी तरफ राहुल और अखिलेश के पास आज है, और आने वाले कल के लिए संभावनाएं हैं। ऐसे में मुलायम एक बेहतरीन मिसाल हैं कि उम्र के इस पड़ाव पर आकर तकरीबन सभी हिंदुस्तानी नेताओं को सक्रिय चुनावी राजनीति से संन्यास लेकर वैचारिक-वानप्रस्थ के लिए क्यों चले जाना चाहिए। मोदी ने भाजपा के भीतर उम्र की यह सीमा लागू कर दी है जो कि बहुत बुरी भी नहीं है।
हमारा मानना है कि आज जमाना जिस रफ्तार से बढ़ और बदल रहा है, उसके साथ-साथ या उसके आगे चलने के लिए महज तजुर्बे का बोझ काफी नहीं हो सकता। ताजा वक्त की जरूरतों और भविष्य की संभावनाओं के लिए एक खुला दिमाग भी जरूरी है। राजनीति में आधी सदी गुजार चुके अधिकतर लोग पूर्वाग्रहों के जीवाश्म होकर रह जाते हैं। ऐसे जीवाश्म पार्टी संग्रहालय के लिए तो ठीक रहते हैं, भविष्य बनाने में अधिक लंबा साथ नहीं दे पाते। कोयले की तरह ऐसे जीवाश्मों को एक आखिरी बार जलकर अपनी पार्टी को ऊर्जा देनी चाहिए लेकिन इतिहासजीवी दंभी नेताओं से सोच बन नहीं पाता।
अखिलेश और राहुल ने एक नई संभावना सामने रखी है और एक सायकिल के दो पहियों जैसी उदार बात कही है। ये दोनों पार्टियां वैचारिक रूप से अप्राकृतिक गठबंधन नहीं बना रहीं, और ये मिलकर अगलेआम चुनाव में एक किसी बड़े गठबंधन की बुनियाद भी बन सकती हैं। देश की भाजपा विरोधी ताकतों को इस गठबंधन के महत्व को समझना चाहिए और इससे तजुर्बा भी लेना चाहिए।

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