सपा के शहंशाह अकबर के पांव आखिर जमीन पर टिके

संपादकीय
17 जनवरी 2017


उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी में चल रहे एक गैरफिल्मी दंगल का फिलहाल खात्मा सा दिखता है, और वह चुनाव आयोग का एक सही फैसला भी लगता है। मुलायम सिंह यादव शहंशाह अकबर के अंदाज में पार्टी नाम की अनारकली को दीवार में चुनवा रहे थे, लेकिन मामला चुनाव आयोग में जाने पर साबित हुआ कि उनके पास न ईंट थी, न रेत थी, न सीमेंट थी, और न ही राजमिस्त्री था। नतीजा यह हुआ कि समाजवादी पार्टी के जो विरोधी इसके चुनाव चिन्ह, साइकिल, के जब्त हो जाने की उम्मीद कर रहे थे, वे अब हताश होकर बैठ गए हैं। अब लोगों को यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि बाप-बेटे के बीच दंगल करवाने का ठेका अगर किसी राष्ट्रीय दलाल ने लिया था, तो उसे अब दलाली कहीं से मिलेगी, या नहीं मिलेगी? और आयोग के फैसले से मुलायम सिंह का वह नशा भी टूटा होगा जिसके चलते वे अपनी पार्टी को अब तक अपनी सनक की जागीर मानकर चल रहे थे, और अपने मुख्यमंत्री बेटे को घर में नंगे खेलने वाला टीपू मानकर चल रहे थे। चुनाव आयोग के सामने जमा किए गए सांसदों और विधायकों के सैकड़ों हलफनामों ने यह साबित कर दिया कि टीपू ही सुल्तान है, और मुलायम की जगह अब वृद्धाश्रम रह गई है।
समाजवादी पार्टी की कुनबापरस्ती के बारे में हम सौ बार लिख चुके हैं, लेकिन उत्तरप्रदेश में मुलायम-अखिलेश का कुनबा एक राजनीतिक हकीकत है, और इन दोनों के बीच जब किसी को चुनने की बात आती है, तो जाहिर तौर पर समझदार लोग अखिलेश को चुनेंगे, क्योंकि मुलायम एक राष्ट्रीय दलाल के हाथों खेलते भी दिख रहे हैं, और वे उत्तरप्रदेश से एक बेहतर सरकार को खत्म करने की तरफ भी बढ़ रहे थे। यह समाजवादी पार्टी के भीतर एक अच्छी नौबत रही कि पार्टी नेताओं का बहुमत अपनी जीत की संभावनाओं को देखते हुए अखिलेश के साथ रहा, जिन्होंने खुलकर यह घोषणा पहले ही कर दी थी कि वे कांग्रेस के साथ गठबंधन के हिमायती हैं। दूसरी तरफ मुलायम अपने सलाहकारों के साथ बार-बार यह घोषणा कर चुके थे कि वे किसी भी पार्टी से कोई गठबंधन नहीं करेंगे।
फिलहाल उत्तरप्रदेश की चुनावी राजनीति पर इससे होने वाला फर्क अगर देखें, तो यह साबित होता है कि एक नई पीढ़ी के, बेहतर सोच वाले अखिलेश यादव की पीढ़ी ने उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की राजनीति को सम्हाल लिया है, और इस नौजवान में यह समझ भी है कि कांग्रेस पार्टी एक समविचारक पार्टी हो सकती है, और उसके साथ तालमेल करके चुनाव लडऩा बेहतर होगा। उत्तरप्रदेश की राजनीति में कांग्रेस अपने दम पर सपा के पासंग भी नहीं बैठती, लेकिन इन दोनों के नौजवान नेताओं के साथ मिलकर चुनाव लडऩे से साम्प्रदायिकता-विरोधी वोटों के छिन्न-भिन्न होने की गारंटी नहीं रह जाएगी, और वहां सपा-कांग्रेस दोनों को खासा फायदा होगा। अब उत्तरप्रदेश की राजनीति का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वहां भाजपा के विरोधी दो खेमे आपस में एक-दूसरे से सांप-नेवले जैसे संबंध रखते हैं, और जिनके बीच किसी तरह का तालमेल मुमकिन नहीं है, इसलिए भाजपा-विरोधी वोट वहां पर सपा गठबंधन और बसपा के बीच बंटेंगे, और भाजपा इसी को लेकर बड़ी उम्मीद लगा सकती है। उत्तरप्रदेश अब एक त्रिकोणीय मुकाबला जरूर देखने जा रहा है, और चुनाव के बाद हो सकता है कि अंकगणित के आधार पर एक त्रिशंकु विधानसभा भी बन जाए, और उस वक्त इन तीनों पार्टियों में से किसी का एक-दूसरे के साथ जाना एक अजीब के साथ हमबिस्तर होने सरीखा रहेगा, लेकिन वैसी नौबत भी देखना दिलचस्प होगा।
फिलहाल चुनाव आयोग ने उत्तरप्रदेश के चुनाव को साइकिल की रफ्तार से आगे बढ़ा दिया है, और आगे जनता सोचेगी कि उसे किसमें अपनी बेहतरी दिखती है।

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