डकैतों को लूटने वाले की नौकरी जाने में लग गए पूरे सत्रह बरस

संपादकीय
13 जनवरी 2017


छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के लिए बदनाम अफसरों की लिस्ट में से एक आईपीएस को केन्द्र सरकार ने बर्खास्त कर दिया है। बर्खास्तगी के लिए सरकारी भाषा में अनिवार्य सेवानिवृत्ति शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन बोलचाल की जुबान में उसका मतलब बर्खास्तगी के अलावा और कुछ नहीं होता। आईजी स्तर के इस अफसर राजकुमार देवांगन के खिलाफ सत्रह बरस से कार्रवाई होना बाकी थी, और मामलों में से एक मामला यह था कि जब यह अफसर एसपी था, तब वहां बड़ी एक डकैती में पकड़ाई रकम में पुलिस ने हाथ मार दिया था। अब डाके की रकम में लूट करने वाली पुलिस पर कार्रवाई करने में सरकार को सत्रह बरस लग गए। यह सोचें कि इन सत्रह बरसों में यह अफसर एसपी या एसपी से ऊपर की कुर्सियों पर ही रहा होगा, और जो डकैती में लूट की तोहमत वाला हो, उसने ऊपर की इन कुर्सियों पर आईजी तक बनते हुए, और एडीजी बनने की तैयारी तक क्या-क्या नहीं किया होगा?
सरकार के काम की रफ्तार उस समय धीमी हो जाती है जब बड़े-बड़े भ्रष्ट बड़े-बड़े अफसरों पर कार्रवाई की नौबत आती है। आज भी राज्य में बहुत से ऐसे अफसर हैं जो कि भ्रष्टाचार के मामलों में दस-पन्द्रह बरस पहले घिर चुके हैं, लेकिन आज तक वे एक से बढ़कर एक कमाऊ कुर्सियों पर बैठते आए हैं, और उनकी पुरानी जांच रिपोर्ट से उनके कमाने की मौजूदा संभावनाओं पर जरा भी आंच नहीं आई है। यह सिलसिला थमना चाहिए। जब भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बनाई गई एजेंसियां किसी पर छापा मारती हैं, उसके बाद किसी के खिलाफ अदालत में मामला चलाना चाहती हैं, तो कदम-कदम पर सरकार की इजाजत लगती है। जो सबसे बड़े अफसर रहते हैं, उनके लिए यह इजाजत केन्द्र सरकार से आती है, और उसके बाद फिर राज्य की एजेंसियां महीनों लगा देती हैं, लेकिन वे जेल जाते दिखते नहीं हैं। इसी तरह कुछ बिल्कुल ही नौजवान अफसर ऐसे पकड़ाए हैं जिन्होंने अपनी शुरुआती पोस्टिंग में ही कमाने के लिए जमकर चौके-छक्के लगाए, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई हुई नहीं हैं। ऐसे में जनता इस बात पर हैरान होती है कि यह सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ कैसी जीरो टॉलरेंस की नीति है?
हमारा ख्याल है कि अफसरों की कमी रहने पर भी भ्रष्टाचार के मामलों से घिरे हुए अफसरों को किसी भी कमाऊ कुर्सी से दूर रखना चाहिए, क्योंकि एक नया अफसर लाना सस्ता पड़ेगा, बजाय एक भ्रष्ट को और कमाने का मौका देने के। दिक्कत यह है कि अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से, कांग्रेस सरकारों के समय से भ्रष्ट अफसरों को लेकर जो सरकारी नरमी चली आ रही है, वह मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक, और देश के अधिकांश दूसरे राज्यों तक जारी है। और भ्रष्टाचार के मामले में भी छोटे कर्मचारियों और बड़े अफसरों के बीच एक बड़ा भेदभाव होता है। छत्तीसगढ़ में ही पटवारी और क्लर्क जैसे लोग तो तुरंत जेल चले जाते हैं, लेकिन नान घोटाले में फंसे हुए आईएएस अफसर भी शान से जेल के बाहर हैं, और उनकी गिरफ्तारी के आसार भी नहीं दिख रहे हैं। केन्द्र सरकार की मंजूरी आने के बाद भी, उनके खिलाफ पुख्ता सुबूत रहते हुए भी राज्य की जांच एजेंसी इनके आईएएस होने से इनके साथ खास नरमी बरत रही है। ऐसे रूख की वजह से सरकारी अफसरों का पूरे का पूरा तबका नाहक ही बदनाम होता है, जिसमें कि बड़ी संख्या में ईमानदार लोग भी रहते हैं, और इस दर्जे के भ्रष्ट अफसर कम रहते हैं।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को अपने भ्रष्टाचार में फंसे हुए अफसरों को सरकारी कामकाज से अलग करके एक बड़े हॉल में एक साथ बिठाकर मुफ्त की तनख्वाह देना अधिक सस्ता पड़ेगा। यह राज्य गरीबों का राज्य है, जहां बहुत रियायती चावल मिलने से ही गरीब दो वक्त खा पा रहे हैं। ऐसे राज्य को खा लेने की इजाजत उन अफसरों को नहीं मिलनी चाहिए जिन्हें लाख-लाख रूपए महीने की तो तनख्वाह ही मिलती है, और इसके अलावा ढेरों सहूलियतें अलग से मिलती हैं। इसके बाद भी अगर किसी की कमाने की हवस पूरी नहीं होती, तो ऐसे लोगों के खिलाफ राज्य सरकार को कड़ा रूख अपनाना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें