इंटरनेट पर बच्चों का पोर्नो ढूंढते और बांटते हिन्दुस्तानी

संपादकीय
22 जनवरी 2017


इंटरनेट पर चीजों को ढूंढने पर आई एक रिपोर्ट में भारत के कई शहरों के नाम आए हैं कि वहां के लोग किस तरह बच्चों की नंगी तस्वीरों को आगे बढ़ाते हैं, बांटते हैं, ढूंढते हैं, और सहेज कर रखते हैं। ऐसे अलग-अलग लोगों की जानकारी जुटाकर अमरीका, और योरप के देशों में सरकारी जासूस लोगों तक पहुंचते हैं, और उन्हें गिरफ्तार भी करते हैं। जो आंकड़े अभी सामने आए हैं उनके मुताबिक देश में ऐसी सामग्री ढूंढने और दूसरों के साथ साझा करने वाले लोगों में अमृतसर सबसे आगे है, और उसके बाद दिल्ली, लखनऊ ऐसे शहर हैं।
इस बात से हिन्दुस्तान के लोगों को चौकन्ना होने की जरूरत इसलिए है कि आज भी इस देश में अगर बच्चे अपने यौन शोषण की शिकायत मां-बाप से करते हैं, तो उनमें से अधिकतर को झिड़की मिलती है, और डांटकर चुप करा दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि ऐसे बच्चे दुबारा ऐसा होने पर उसकी शिकायत करने का हौसला भी नहीं जुटा पाते। लेकिन अनगिनत ऐसे मामले हो रहे हैं जिनमें कहीं स्कूलों में शिक्षक ही बच्चों से बलात्कार कर रहे हैं, और अभी चार दिन पहले की खबर है कि किस तरह एक स्कूल में प्रिंसिपल और शिक्षकों ने मिलकर बलात्कार किया। इसलिए अच्छा लगे या न लगे, हिन्दुस्तानियों को यह मानना होगा कि बच्चों का यौन शोषण हिन्दुस्तान में अपनी खुद की एक हकीकत है, और यह विदेश से आयातित कोई बीमारी नहीं है, यह न तो शहरी है, और न ही आधुनिक जीवन से इसका कोई लेना-देना है। जहां-जहां बच्चे हैं, और जहां-जहां उनके साथ सेक्स सोचने वाले दिमागी रूप से बीमार लोग हैं, वहां-वहां बच्चे खतरे में हैं।
आज हिन्दुस्तान में लगातार सेक्स-शिक्षा के खिलाफ झंडा-डंडा लेकर खड़े हो जाने वाले लोग दिखते हैं। वे ऐसी शिक्षा को या सावधानी को पश्चिमी सभ्यता का असर मानते हैं, और किशोरावस्था में पहुंच चुके बच्चों को भी उनके बदन के बारे में, बदन की जरूरत के बारे में जागरूक करने के खिलाफ हैं। ऐसी अवैज्ञानिक सोच के चलते हुए यह देश अपनी नौजवान पीढ़ी को, और उससे भी कमउम्र के बच्चों के पीढ़ी को खतरे में डाल रहा है। यह खतरा सिर चढ़कर नहीं दिखता, यह खतरा दबा-छुपा रहता है, और बच्चों की दिमागी हालत को बहुत बुरी तरह जख्मी करता है। इंटरनेट पर सर्च के जो आंकड़े कम्प्यूटर ही ढूंढकर निकाल देता है, वह अपने आपमें एक सुबूत है कि किस तरह हिन्दुस्तान के लोग इस तरह की मानसिक विकृति का शिकार हैं, और वे बाकी दुनिया से अलग किसी और दुनिया के इंसान नहीं हैं। ऐसी मानवीय कमजोरी और मानसिक बीमारी से निपटने के लिए सरकारी जासूस कहीं भी काफी नहीं हो सकते, इससे निपटने के लिए बच्चों को और किशोर-किशोरियों को जागरूक करना ही अकेला रास्ता है। यह जब तक नहीं होगा, तब तक भारत ऐसे खतरे झेलते ही रहेगा।

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