बांग्लादेश की हत्यारी पुलिस को थोक में फांसी की सजा, भारत में भी सरकारों को सोचने की जरूरत

संपादकीय
16 जनवरी 2017


बांग्लादेश की एक अदालत में आज एक हत्याकांड में 26 लोगों को मौत की सजा सुनाई है जिसमें एक भूतपूर्व अवामी लीग नेता भी शामिल है, और वहां की पुलिस के एक खास दस्ते के 17 अधिकारी-कर्मचारी भी शामिल है। इन लोगों पर 7 लोगों के अपहरण और हत्या का आरोप था, मरने वालों की लाशें 2014 में एक नदी में तैरती मिली थीं। नारायण गंज हत्याकांड के नाम से कुख्यात इस जुर्म में बांग्लादेश रैपिड एक्शन बटालियन के 25 लोगों पर आरोप थे। लोगों को याद होगा कि पंजाब या कुछ और जगहों पर इसी तरह अपहरण और हत्या, या मुठभेड़-हत्याओं के मुकदमे चले हैं, और कई जगहों पर ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारियों को मौत की सजा थोक में हुई है। फिर इस तरह की हत्याओं से परे मुम्बई जैसे शहर में संगठित अपराधियों को मारने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों पर भी लगातार बेकसूरों को मारने के मामले चले हैं, और कुछ ऐसे कुख्यात अफसरों पर फिल्में भी बनी हैं। मुम्बई से यह बात सामने आई थी कि जुर्म के आरोपियों या फरार मुजरिमों को मारकर हीरो बनने वाले ऐसे पुलिस अफसर खुद किस तरह धीरे-धीरे जमीन-जायदाद के धंधे में भूमाफिया बनकर करोड़ों कमाने लगे। पंजाब की पुलिस के बारे में यह बात कई बार सामने आई कि आतंक के मोर्चे पर काम करने वाली पुलिस खुद किस तरह नशे की तस्करी का धंधा करने लगी, और किस तरह उसने मानवाधिकारों को कुचलते हुए बेकसूरों को मारा।
बांग्लादेश से लेकर पंजाब, मुम्बई, और दूसरी जगहों से होते हुए अगर बस्तर तक आएं, तो यहां की पुलिस भी इसी तरह के आरोपों से घिरी हुई है। पिछले बरसों में बस्तर के नक्सल मोर्चे पर काम करने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों को जिस तरह की छूट दी गई है, उससे मानवाधिकार कुचलने से लेकर बस्तियों को जलाने तक, बेकसूर नाबालिगों को नक्सली बताकर मारने तक, आदिवासी लड़कियों से बलात्कार करने और बेकसूरों को नक्सली बताकर उनका समर्पण करवाने तक कई तरह के काम तरह-तरह की जांच में सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक ने इस बात को सही पाया है कि बस्तर में सुरक्षा बल और खासकर छत्तीसगढ़ की पुलिस इस तरह के सारे संगठित जुर्म में शामिल रही है। बांग्लादेश का यह ताजा फैसला न सिर्फ छत्तीसगढ़ पुलिस, बल्कि छत्तीसगढ़ सरकार के लिए भी फिक्र पैदा करने वाला होना चाहिए कि सरकारी सुरक्षा कर्मचारी जरूरत से अधिक आजादी और संविधानेतर अधिकार पाने पर, जवाबदेही न रहने पर किस तरह के जुर्म की लत में फंस जाते हैं, और बाद में इंसाफ का वक्त लौटने पर किस तरह वे सजा भी पाते हैं। हिन्दुस्तान की न्यायपालिका में दशकों बाद भी ऐसे फैसले हुए हैं जिनमें बड़े-बड़े दिग्गज और नामी-गिरामी पुलिस अफसरों को उनके वफादार मातहत कर्मचारियों के साथ फांसी और उम्रकैद जैसी सजा भी हुई है, जबकि उनका वक्त चलते समय उनके इलाकों में उनका कहा हुआ ही कानून रहता था। आज ऐसी बातों को लेकर छत्तीसगढ़ में खुले दिमाग से यह सोचने की जरूरत है कि क्या भविष्य में यह राज्य ऐसे ही किसी खतरे को झेलने नहीं जा रहा है?
फिर हमारा यह भी मानना है कि बलात्कारी या कातिल पुलिस को जितनी सजा जब मिलनी है, तब मिलती रहे, लेकिन उससे परे भी क्या सत्ता पर बैठे हुए बाकी नेताओं और अफसरों की यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि छत्तीसगढ़ के सबसे मासूम और सबसे सीधे-सरल इलाके बस्तर के आदिवासियों पर इस तरह की हिंसा और जुर्म की जो खबरें आती हैं, उन तमाम खबरों को नक्सल-हिमायतियों का शोर करार न देकर आरोपों की ईमानदारी और गंभीरता से जांच करवाई जाए। आज प्रदेश के भीतर या प्रदेश के बाहर, मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ता, या मानवाधिकार आंदोलनकारी, यहां तक कि गरीब और बेबस आदिवासियों के मुकदमे मुफ्त में लडऩे वाले सामाजिक प्रतिबद्धता से समर्पित वकीलों को भी पुलिस नक्सल करार दे रही है, और उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल रही है। भारत के कानून के साथ दिक्कत यह है कि ऐसे मामलों में फंसाए गए बेकसूर को भी जेल से निकलने में बरसों लग जाते हैं, और यह पूरा सिलसिला बस्तर में एक निलंबित-लोकतंत्र का सुबूत बनकर दर्ज होते जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार और भारत के बाकी राज्यों की सरकारों को भी बांग्लादेश के इस ताजा फैसले को देखते हुए अपनी पुलिस और अपने सुरक्षा बल को दी गई अंधाधुंध छूट के बारे में फिर सोचना चाहिए कि भविष्य का इतिहास इसे किस तरह दर्ज करेगा। 

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