धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा और सामाजिक मूल्यों में टकराव

संपादकीय
11 जनवरी 2017


स्विटजरलैंड की खबर है कि वहां बचपन में ही हालैंड से आकर बसी हुई, और अब अधेड़ हो चुकी एक महिला को नागरिकता नहीं दी जा रही क्योंकि उसने वहां की स्थानीय परंपराओं के साथ तालमेल बिठाना नहीं सीखा। वह इस बात को लेकर आंदोलन करती रहती थी कि गायों के गले में एक राष्ट्रीय प्रतीक की तरह टंगी हुई बड़ी-बड़ी और भारी-भरकम घंटियों पर रोक लगाई जाए क्योंकि इससे उन गायों के गले पर बहुत बोझ पड़ता है, और घंटियों की सामूहिक आवाज उनको तकलीफ पहुंचाती है। आज की ही एक दूसरी खबर है कि स्विस सरकार ने वहां के स्कूलों पर यह नियम लागू किया है कि मुस्लिम लड़कियां भी बाकी लड़कियों की तरह लड़कों के साथ ही तैराकी सीखेंगी, और इसे यूरोपीय मानवाधिकार अदालत में भी आज जीत हासिल हुई है। लोगों को याद होगा कि पिछले कुछ बरसों में लगातार फ्रांस, जर्मनी सहित योरप के बहुत से देशों में इस बात को लेकर मुस्लिम समुदाय और सरकार के बीच टकराव चल रहा है कि सार्वजनिक जगहों पर बुर्का पहना जाए या नहीं, और समुद्र तट पर मुस्लिम महिलाएं अपने बदन को पूरी तरह ढांके हुए कपड़े पहनकर नहाएं या नहीं। सरकारें लगातार मुस्लिम प्रतीक चिन्हों और रीति-रिवाजों के खिलाफ आदेश कर रही हैं, और यूरोपीय देशों की संसदें भी एक के बाद एक सरकार की लगाई ऐसी रोक को सही ठहरा रही हैं। ऐसे में आज यूरोपीय मानवाधिकार अदालत का फैसला स्विटजरलैंड के बाहर के दूसरे देशों के लिए भी एक मिसाल बनकर सामने आ गया है।
अब यह संस्कृतियों के टकराव का एक मामला है जिसका कोई आसान जवाब नहीं है। लोगों को याद होगा कि ब्रिटेन से लेकर अमरीका तक, और ऑस्ट्रिेलिया से लेकर कनाडा तक जगह-जगह सिखों को कई बार नस्लवादी हमलों का शिकार होना पड़ता है, और ऐसे अधिकतर मामलों में यह पाया जाता है कि उनको दाढ़ी-पगड़ी वाला मुस्लिम समझकर लोगों ने हमले किए। दूसरी तरफ महिला अधिकारों और समानता की बारीकियों पर काम करने वाले यूरोपीय देशों ने यह महसूस किया है कि वहां बसी हुई मुस्लिम महिलाओं को अगर यूरोपीय महिलाओं की तरह की बराबरी का माहौल नहीं मिलेगा, तो उनका उस तरह से सांस्कृतिक मेल नहीं हो पाएगा। इसलिए उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता के ऊपर देश की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता की जरूरत को रखा, और कपड़ों की आजादी को एक किस्म से उन्होंने दकियानूसी धार्मिक रीति-रिवाजों से बाहर लाने की कोशिश भी की। यह सिलसिला एक टकराव इसलिए भी खड़ा कर रहा है कि अमरीका की अगुवाई में योरप के कई देशों की फौज ने जिस तरह इराक और अफगानिस्तान पर हमले किए, और लाखों मुस्लिमों को मारा, उससे संस्कृतियों का एक टकराव खड़ा हो गया है।
ऐसे में एक बात और जुड़ गई कि सीरिया जैसे देश से निकलकर जो लाखों मुस्लिम शरणार्थी योरप में दाखिल हुए, और वहां पर जगह-जगह उन्हें बसाया गया, तो उनकी मुस्लिम संस्कृति का मेल स्थानीय संस्कृतियों के साथ नहीं बैठ पा रहा है, और इस वजह से जगह-जगह सामाजिक तनाव भी हो रहे हैं। हम इस सवाल को आसान नहीं मानते कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक एकरूपता में से ऐसे मामलों में किसे अधिक महत्वपूर्ण मानना चाहिए, और साथ-साथ यह बात भी है कि दूसरे देशों से आए हुए शरणार्थियों को शरण देने वाले देशों को क्या यह आजादी होनी चाहिए कि वे अपने सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों को लागू करने की शर्त पर ही ऐसी शरण दें? कुछ लोगों को यह लग सकता है कि ये देश अपनी ताकत की वजह से दूसरों की धार्मिक स्वतंत्रता खत्म करने वाले नियम लागू कर रहे हैं, और कुछ दूसरे लोगों को यह भी लग सकता है कि उदार सामाजिक मूल्यों वाले देश वहां पर रहने वाली मुस्लिम महिलाओं के लिए ऐसे नियम लागू करके मुस्लिम समाज के भीतर ही उन्हें एक बेहतर माहौल दे रहे हैं।
यह एक बेहद उलझा हुआ मुद्दा है, और इस पर काफी बहस भी चल रही है। हम निजी आजादी के हिमायती हैं, लेकिन साथ-साथ हमारा यह भी मानना है कि जिन समाजों में आदमी और औरत के बीच बराबरी नहीं आ पा रही है, वहां पर इस बराबरी को लाने की जिम्मेदारी भी विकसित देशों और समाजों की है, और उसे निभाना चाहिए।

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