निजी जिंदगी से लेकर राजनीति और सरकार तक अकेलेपन के घेरे में मोदी

आजकल
16 जनवरी 2017  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के पहले से ही खबरों में इस कदर हैं कि सारा मीडिया उनको छापने और दिखाने पर मजबूर और बेबस रहता है। वे शायद पहले ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने अपने विदेशी दौरों में मीडिया को साथ ले जाना बंद कर दिया है। अब उनके साथ महज सरकारी टीवी और सरकारी रेडियो के लोग जाते हैं, और मोदी से खबरें इतनी निकलती हैं कि तमाम बड़े अखबार या छोटे-बड़े सभी किस्म के समाचार चैनल अपने खर्च पर अपनी टीम उनके पहुंचने के पहले उन विदेशी शहरों में पहुंचाकर वहां से रिपोर्टिंग शुरू कर चुके रहते हैं। इस मायने में मोदी से अधिक कामयाब समाचार-महत्व का नेता और कौन होगा जो न खिलाता है, न पिलाता है, न घुमाता है, और न ही विदेश से पत्रकारों को बिना कस्टम पटाए सामान लाने देता है, फिर भी सबसे अधिक कवरेज पाता है!
लेकिन हमारी हैरानी की ये बातें यहां पर थमती हैं, और यहां से आगे जब हम एक उलझी हुई हकीकत की बात करते हैं, तो यह लगता है कि मोदी अपनी निजी जिंदगी से लेकर अपनी राजनीति तक, और अपनी सरकार से लेकर अपनी नीतियों तक एक बहुत ही अकेले इंसान हैं, जिनके पास न बांटने को कोई है, न किसी से पाने के लिए उनके इर्द-गिर्द कोई है। हम मोदी की निजी जिंदगी को महज उनके व्यक्तित्व के इस जटिल पहलू को समझने जितना ही छू रहे हैं, और हमें दिख रहा है कि किस तरह वे शादी के तुरंत बाद से पत्नी से अलग रहे, अपनी मां और अपने भाईयों के परिवार से अलग रहे, एक संघ प्रचारक के रूप में शायद वे बिना परिवार रहने के आदी हो गए। इसके अलावा जब हम गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनको देखते हैं, तो वे गुजरात दंगों के लिए अपने रूख को लेकर शायद अकेले थे, और उनकी सरकार में भी उनके इर्द-गिर्द सामूहिक जिम्मेदारी वाली कोई बात न 2002 के दंगों के वक्त थी, और न शायद तब से लेकर अब तक उनके सत्ता के लगातार सफर में कभी रही। 
लोगों को यह अच्छी तरह याद है कि मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के समानांतर अपना एक ढांचा खड़ा कर लिया था, और वे उसी पर निर्भर बताए जाते थे, बल्कि उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद जैसे कई हिन्दू संगठनों को भी किनारे कर रखा था, और गुजरात के जानकार बताते हैं कि मोदी के कार्यकाल में तोगडिय़ा जैसे लोग हाशिए से भी और बाहर धकेल दिए गए थे। इस तरह मोदी परिवार से अलग, दोस्तों के बिना, पार्टी और सरकार में सामूहिक जवाबदेही वाली किसी टीम के बिना, और एकदम अकेले काम करने के आदी इंसान दिखते हैं। उनके बारे में जितनी जानकारी आम है, उनको जितना अधिक बारीकी से देखें, उतना ही अधिक यह बात सही लगती है कि वे अकेलेपन के इस कदर शिकार हैं कि भारतीय जनता पार्टी और केन्द्र सरकार दोनों अपनी दो जेबों में रहने के बावजूद उन्हें पार्टी चलाने के लिए अपने एक सबसे भरोसेमंद अमित शाह को पार्टी का मुखिया बनाना पड़ा, और अमित शाह से उनका घरोबा एक अकेलेपन सा घरोबा है, किसी टीम जैसा नहीं है। 
अब एक बात यह समझ आती है कि भाजपा के भीतर मोदी के अलावा बाकी किसी की कोई आवाज न रह जाने, और सरकार में मोदी से परे किसी की कोई ताकत न रह जाने का एक नतीजा यह भी है कि मोदी के तमाम फैसले उनके निजी फैसले दिखाई देते हैं, और उनमें से किसी के पीछे सामूहिक विचार-विमर्श, सामूहिक जिम्मेदारी की बुनियाद दिखाई नहीं देती है। उनके अब तक के कार्यकाल का रूख यही रहा है कि उनके लिए विदेश मंत्री का कोई अस्तित्व नहीं है, और तमाम विदेश नीति वे अकेले तय करते हैं, किसी देश से भारत लौटते हुए अचानक पाकिस्तान रूककर नवाज शरीफ का जन्मदिन मनाकर, उनके घर शादी की दावत पर जाकर, उनके परिवार से मिलकर, सारी विदेश नीति वे पल भर में खुद तय करते हैं। जाहिर है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आज केन्द्र सरकार में एक बड़े ओहदे पर रहने के बावजूद अपनी उस ताकत का एक हिस्सा भी नहीं रखतीं जो कि वे लोकसभा में विपक्ष की नेता रहते हुए रखती थीं। 
कुछ ऐसा ही हाल वित्तमंत्री अरूण जेटली का है जो कि ओहदे के हिसाब से देश के सबसे ताकतवर आधा दर्जन मंत्रियों में से एक रहने चाहिए थे, लेकिन ऐसा लगता है कि नोटबंदी की घोषणा से उनको महज इतना ही समय मिल पाया होगा कि अपने लाख-दो लाख रूपए वे बैंकों से बदलवा सकें। भारत की इतिहास का यह अकेला ऐसा फैसला था जिसने जिंदगी को इस कदर उथल-पुथल कर दिया, और अब धीरे-धीरे यह खुलासा होते जा रहा है कि किसी जरा भी काबिल वित्तमंत्री को अगर ऐसे फैसले की समय रहते हवा लगती, तो देश में इतनी बदहाली, और इतनी बदइंतजामी नहीं हुई रहती, और लोगों की जिंदगी इस कदर जहन्नुम न बनी होती। 
लेकिन हम इन पुराने मुद्दों पर जाना नहीं चाहते हैं, हम मोदी का विश्लेषण कर रहे हैं जो कि एक बहुत ही अकेला इंसान पेश करता है। और इस अकेलेपन के साथ-साथ मोदी की कई और दिक्कतें भी हैं। पहली तो यह कि संसद और केन्द्र सरकार में आने के पहले उन्हें इन दोनों में काम का एक दिन का अनुभव नहीं था। नतीजा यह था कि जिस दिन वे पहली बार संसद में घुसे, उस दिन वे पहली बार संसद को भीतर से देख रहे थे, इसके पहले वे दर्शकदीर्घा से भी संसद की कार्रवाई देखे हुए नहीं थे। और केन्द्र सरकार में काम का तजुर्बा लोगों को अपने राज्य से बाहर बाकी हिन्दुस्तान को देखने-समझने का मौका देता है, और ऐसा मौका मोदी को कभी नसीब नहीं हुआ था, इसलिए भी वे इस सरकार में आने के बाद अपनी हिचक के कैदी रहे, और खबरें बताती हैं कि वे गुजरात में अपने साथ काम कर चुके अफसरों पर दिल्ली आकर भी बहुत आश्रित रहे, और उन्हें दिल्ली लेते आए। 
पार्टी के भीतर जिन राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री थे, उनमें से कम से कम दो बड़े राज्यों के मुख्यमंत्री मोदी के प्रधानमंत्री बनने तक उनके खिलाफ तेवर रखने वाले रहे। राजस्थान की वसुंधरा राजे, और मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह, इन्होंने तो मोदी के चुनाव प्रचार के वक्त भी मोदी की हस्ती को बहुत बाद में जाकर माना था, और पोस्टरों पर इजाजत दी थी। इन दो के मुकाबले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह मोदी के लिए अधिक सहूलियत के रहे जो कि पार्टी के भीतर किसी गुटबाजी से परे राष्ट्रीय नेतृत्व को बिना विवाद मानते आए हैं, और उन्होंने मोदी की लहर को न अनदेखा किया, न अनसुना किया, और न उसका अनादर किया। लेकिन कुल मिलाकर मोदी अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियों के बीच भी अकेले और अलग से रहे। 
भारत जैसे विविधता से भरे हुए, विभिन्न विचारधाराओं और धर्म-जातियों वाले समुदायों वाले इस देश पर एकमुश्त राज करने के लिए मोदी का तजुर्बा अकेले ही काफी नहीं हो सकता था, और इसीलिए उनकी सरकार आने के बाद से उग्र राष्ट्रवाद, उग्र साम्प्रदायिकता, उग्र ब्राम्हणवादी गौरक्षक हिंसा, उग्र असहिष्णुता का सैलाब सा आ गया, उनकी पार्टी के नेता और मंत्री गांधी को एक बार फिर मारने और गोडसे को एक बार फिर स्थापित करने में लग गए, और इसका भारत के विशाल नक्शे पर नुकसान मोदी सोच नहीं पाए, आज भी उन्हें इसका एहसास नहीं है। निजी जीवन से शुरू और राजनीतिक जीवन से लेकर सरकारी जिम्मेदारियों तक जो अकेलापन मोदी को घेरे हुए है, वह घेरा मोदी तक देश और दुनिया की समझ को भी ठीक से पहुंचने नहीं दे रहा है, और यह घेरा उनका अपना उसी किस्म का खोल है जिसके भीतर एक कछुआ अपने को महफूज पाता है। लेकिन भारत के लोकतंत्र के लिए ऐसा अकेला प्रधानमंत्री ठीक नहीं है जिसके इर्द-गिर्द बोलने की ताकत रखने वाले तजुर्बेदार नेताओं की पहुंच नहीं है। 
यहां यह समझना कुछ मुश्किल है कि इस अकेलेपन ने मोदी को आत्मकेन्द्रित और आत्ममुग्ध बना दिया है, या कि उनके आत्मकेन्द्रित और आत्ममुग्ध होने से वे मेले में अकेले रहते आए हैं। लोग उनकी जीवनशैली, उनकी कार्यशैली, और उनके व्यक्तित्व की कमजोरियों को लेकर उन्हें महत्वोन्मादी भी कहते हैं कि वे हर जगह, हर पल महत्व ढूंढते हैं, और विदेशी प्रमुख नेताओं के साथ उनकी गर्मजोशी को वे इसी का एक सुबूत मानते हैं। बॉडी लैंग्वेज के अधिक जानकार मोदी के तौर-तरीकों को बेहतर समझ और समझा सकते हैं, फिलहाल अपने ऐसे तमाम फैसलों के लिए, तौर-तरीकों के लिए मोदी अकेले ही जिम्मेदार दिखते हैं, क्योंकि उनके आसपास कोई सलाहकार तो मौजूद है नहीं।

ये तमाम बातें मोदी को कुछ दूरी से देखकर ही लिखी जा रही हैं, लेकिन ये बहुत ही आम जानकारी की बुनियाद पर किया गया एक विश्लेषण है, ऐसी आम जानकारी जो कि आसपास के सभी लोगों ने दूर-दूर से मोदी को देख-देखकर पिछले दशकों में लिखी हैं। मोदी को जो अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा सुहाते हैं, उनकी सरकार को भी वहां पर प्रशासन कहा जाता है जिसमें अनगिनत सलाहकार रहते हैं, विश्लेषक रहते हैं, और थिंक टैंक रहते हैं। मोदी के मुनादियों वाले फैसलों से लेकर देश के जलते मुद्दों पर उनकी ऐतिहासिक चुप्पी तक यह जाहिर करते हैं कि वे अकेले चलने की एक अनोखी मिसाल हैं, और भारत में तो आज राष्ट्रपति शासन प्रणाली भी नहीं है। ऐसा अकेलापन दुनिया के राज में, दुनिया के कारोबार में लोगों से अनगिनत आत्मघाती गलतियां भी कराता है, और मोदी भी इस नुकसान से बचे हुए नहीं हैं। दिक्कत यह है कि सत्ता पर बैठे लोग जब गलतियां करते हैं, तो उनके दाम जनता चुकाती है।

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