दूसरों की त्रासदी, अपनी सेल्फी में बेजा इस्तेमाल

संपादकीय
20 जनवरी 2017


सेल्फी लेने की बीमारी के कुछ लोगों का इलाज दिल्ली के एम्स में चल रहा है। और पूरी दुनिया में चिकित्सा विज्ञान सेल्फी लेने के बावलेपन को एक मानसिक बीमारी मानकर लोगों को उससे आगाह कर रहा है। लोग रेल पटरियों पर कटने का खतरा उठाते हुए अपनी तस्वीरें खींच रहे हैं, और बहुत से लोग रेलगाडिय़ों की छत पर बिजली के तारों के नीचे जान देते हुए भी अपनी तस्वीरें ले रहे हैं। मोबाइल फोन के कैमरों ने लोगों को आत्ममुग्ध होने का एक औजार दे दिया है, जिसे कि लोग हथियार की तरह भी इस्तेमाल कर रहे हैं। अभी जर्मनी से बर्लिन के उस स्मारक की तस्वीरें आई हैं जहां पर हिटलर-राज के दौरान मारे गए लाखों यहूदियों के सम्मान में अफसोस की याद बनाई गई है, और वहां पर दफनाए गए यहूदियों की कब्रों पर कूद-कूदकर लोग अपनी तस्वीरें ले रहे हैं, और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर रहे हैं। जर्मन इतिहास में लाखों बेकसूर यहूदियों को मारकर हिटलर ने दुनिया का एक सबसे बड़ा हत्याकांड किया था, और उसे महज मौज-मेले की जगह मानकर लोग तफरीह कर रहे हैं, और उस जगह की गंभीरता को समझे बिना, इतिहास की हैवानियत से नावाकिफ बने हुए अपनी सेल्फी ले रहे हैं, साथियों की तस्वीरें ले रहे हैं।
दरअसल इंसानी मिजाज होता ही ऐसा है। वह दूसरे लोगों के दुख-तकलीफ से जुड़ नहीं पाता। कुछ देर तक तो इंसान दूसरों से हमदर्दी का नाटक कर लेते हैं, लेकिन श्मशान में भी एक बार अर्थी को जमीन पर उतार दिया गया, तो उसके बाद लतीफे शुरू होने, अश्लील बातचीत का सिलसिला छिडऩे, और मृतक के परिवार के बारे में भी तमाम किस्म की बुरी बातें करने से किसी को परहेज नहीं रह जाता। लोग वहां पर हंसते और ठहाके लगाते भी देखे जा सकते हैं। लोगों को यह भी याद होगा कि छत्तीसगढ़ में जब नसबंदी कांड में बिलासपुर में बड़ी संख्या महिलाएं मारी गई थीं, और मुख्यमंत्री उनको देखने अस्पताल पहुंचे थे, तो वहां के स्वास्थ्य मंत्री और स्थानीय मंत्री अस्पताल के भीतर ही जोरों से हंसते हुए समाचार-कैमरों पर कैद हुए थे, और टीवी की खबरों में उनकी हंसी कई दिन तक दिखती रही थी।
लोग दूसरों की तकलीफ से बहुत ही सतही तरीके से जुड़ते हैं। अंग्रेजी और हिन्दी, या उर्दू के कई ऐसे शब्द हैं जो ऐसे लोगों की सोच बताते हैं। अंग्रेजी में एक शब्द है सिम्पैथी, जिसका मतलब होता है हमदर्दी, और दूसरा शब्द है इम्पैथी, यानि सच की हमदर्दी। ऐसा फर्क बाकी भाषाओं में भी रहता है, लेकिन असल जिंदगी में लोग हमदर्दी जताने को हमदर्द होना मान लेते हैं। हमदर्द होना एक अलग ही खूबी रहती है, और वह हर किसी में नहीं रहती। जो लोग बर्लिन के इस नस्लीय कत्लेआम के स्मारक पर जाते हैं, उन्हें अच्छी तरह मालूम रहता है कि वहां किस तरह इतिहास का सबसे खूनी पन्ना दफन है। फिर भी उन्हें वह तकलीफ छू नहीं जाती। और जब ऐसी संवेदनशून्यता के साथ लोगों में अपनी तस्वीरों को खींचने और फैलाने का मोह जुड़ जाता है, तो वह समाज मानवीयता के पैमानों को खोने लगता है।
आज हर किसी को अपने आपको, अपने बच्चों को, अपने साथियों को एक सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारी समझाने और सिखाने की जरूरत है। इसके बिना लोगों में एक-दूसरे के लिए नफरत उसी रफ्तार से बढऩे लगेगी, जिस रफ्तार से लोगों में अपनी सेल्फी लेने की चाह बढऩे लगी है। लोगों का आत्ममुग्ध होना एक सीमा तक तो मानवीय कमजोरी है, लेकिन इसके बाद वह धीरे-धीरे एक मानसिक बीमारी में तब्दील होने लगता है, और जब तक लोगों को यह समझ आए, तब तक तो बहुत से लोगों की बीमारी लाइलाज भी होने लगेगी। फिलहाल जो लोग दूसरों की त्रासदी को अपनी सेल्फी में इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनकी तस्वीरें जहां दिखें, वहां उन्हें धिक्कारने की जरूरत है।

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