मॉल्स में खरीददारी से नहीं मिलती महानता

संपादकीय
18 जनवरी 2017


पिछले दो-चार दिनों में उन एक दर्जन उपन्यासों की फेहरिस्त आई है जो अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी पसंद से छांटे हैं। अपनी पढ़ी हुई इन किताबों के अलावा उन्होंने उन किताबों को भी एक इंटरव्यू में गिनाया है जो उन्होंने अपनी बेटियों को पढऩे के लिए दी हैं। और इनमें से हर एक पसंद के लिए उन्होंने वजह भी गिनाई है। आज हिन्दुस्तान में ऐसे कितने लोग हैं जो कि अपने बच्चों के लिए किताबें छांटते हैं, और फिर उन्हें तोहफे में देते हैं कि वे पढ़ सकें? और बच्चों से परे भी ऐसे कितने लोग हैं जो कि खुद भी किताबें पढ़ते हैं? अभी कुछ समय पहले एक किसी प्रमुख व्यक्ति की जिंदगी की कहानी आई थी कि जब वे अपनी बेटी के लिए रिश्ता देखने गए थे तो वहां लड़के वालों के महल जैसे घर को देखकर भी बिना रिश्ता किए लौट आए थे, क्योंकि उन्हें वहां किताबें नहीं दिखी थीं। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ हफ्ते पहले दुनिया की एक सबसे बड़ी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के मुखिया बिल गेट्स की बताई हुई एक लिस्ट छापी थी कि पिछले दिनों उन्होंने कौन-कौन सी किताबें पढ़ी थीं, और उनमें से वे कौन सी किताबों को पढऩे की सिफारिश करते हैं।
दिल्ली में अभी हुए विश्व पुस्तक मेले की खबरें बताती हैं कि प्रकाशक और किताबें दोनों घटते चले जा रहे हैं। शहरों में हम देखते हैं कि लोगों की खरीददारी और उनके वक्त गुजारने की जगह किताबों से परे की ही रहती हैं। जो संपन्न लोग हैं, उन्हें अपने बच्चों और मेहमानों को घुमाने-फिराने, दिखाने, और खरीददारी कराने के लिए मॉल्स ही मिलते हैं। बहुत ही कम लोग ऐसे हैं जो कि तोहफे में किताबें देने पर भरोसा रखते हैं। यह एक खतरनाक नौबत इसलिए है कि आज दुनिया में अधिकतर लोग अपनी पसंद से परे, और अपनी जरूरत से परे के मनोरंजन पर वक्त गुजारते हैं। कोई किताब तो अपनी पसंद की हो सकती है, लेकिन जब घर के साथ बैठकर लोग टीवी देखते हैं, तो उसमें न तो उनकी पसंद रहती, और न ही उनकी जरूरत रहती, और नतीजा यह होता है कि उनसे उनको हासिल भी कुछ नहीं होता।
किसी सभ्यता के विकसित होने में हजारों बरस से किताबों का एक बेमिसाल योगदान रहते आया है, और आज उस योगदान की जरूरत को बिल्कुल ही भुला दिया गया है। ऐसा भी नहीं है कि लोगों के पास पढऩे को वक्त नहीं है, लेकिन आज लोग अपने फोन पर, अपने कम्प्यूटर पर, सोशल मीडिया पर इस कदर उलझे रहते हैं, कि अपनी जरूरत और अपनी पसंद तक वे पहुंच भी नहीं पाते। एक सुनामी के बेकाबू सैलाब की तरह अनचाही चीजें लोगों तक पहुंचती रहती हैं, और उन्हें पलटकर, देखकर, डिलीट करने में ही उनका वक्त निकल जाता है। किताबों के साथ जितनी गंभीरता से लोगों का रिश्ता बनता था, और पढऩे वालों के साथ आज भी बनता है, वह फोन और इंटरनेट पर नहीं बनता, जहां पर कि लोग फिजूल की बातों में उलझते ही रहते हैं।
आज किसी को यह सलाह देना पता नहीं काम की बात है या नहीं, लेकिन लोगों को अपने खर्च का एक हिस्सा, चाहे बहुत थोड़ा ही हिस्सा, किताबों पर खर्च करना चाहिए, और यह याद रखना चाहिए कि दुनिया के अधिकतर महान और कामयाब लोग किताबों की सीढिय़ों से चढ़कर ही ऊपर तक पहुंचते हैं, मॉल्स में खरीददारी करके नहीं।

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