16 जून 2011
सोमाली समुद्री डकैतों के चंगुल से दस महीनों बाद छूटकर भारत और पाकिस्तान के जहाज कर्मचारी बचने की तरफ बढ़े हैं। उनके लिए जहाज के मालिक ने भुगतान किया और इस भुगतान में भारत सरकार ने कोई भी हिस्सा नहीं बंटाया। हम भी इस मुद्दे पर नहीं जा रहे हैं कि एक कारोबार में काम कर रहे भारतीय नाविकों को छुड़ाने के लिए भारत सरकार को डकैतों को भुगतान करना था या नहीं, हमारा आज का मुद्दा कुछ अलग है। सोमालिया के समुद्री डकैत पिछले कुछ बरसों में उसी अंदाज में दूसरे देशों के जहाजों पर कब्जा करके वसूली कर रहे हैं जिस अंदाज में आधी सदी पहले समुद्री डकैती पर अंगे्रजी फिल्में बना करती थीं। आज यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि दुनिया के जिन देशों के पास बड़ी-बड़ी नौसेनाएं हैं, उनके जहाज या उनके कर्मचारियों के चलाए हुए जहाज पर समुद्री लुटेरे या डकैत कब्जा कर लें और कोई देश उनका कुछ न बिगाड़ सके। लेकिन इसके पीछे की वजह जानने के लिए संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट और कई दूसरी रिपोर्ट को भी देखने की जरूरत है, जिनमें यह बताया गया है कि सोमालिया समुद्र तट से पिछले पांच-सात बरसों में ऐसी समुद्री डकैती बढऩे के क्या कारण हैं?
2005 के बाद से यह समुद्री डकैती बढ़ी है और इसकी एक बड़ी वजह यह पाई गई कि सोमालिया के समुद्र में बाहरी बड़ी कंपनियों द्वारा जिस बड़े पैमाने पर गैरकानूनी तरीके से मछलियां मारी जाती हैं और सोमालिया के पानी में विदेशी जहाज आकर जिस तरह से जहरीला कचरा फेंक जाते हैं, उनकी वजह से सोमाली मछुआरों की रोजी-रोटी छिन गई है। इनमें से बहुत से लोग लूटपाट जैसे अपराधों को जिंदा रहने का एक जरिया पा रहे हैं। कुछ रिपोर्ट यह भी बताती हैं कि समुद्र तट पर बसे हुए सोमाली समुदायों के बीच इन डकैतों को पूरा समर्थन मिला हुआ है क्योंकि इनकी ताकत को सोमालिया के समुद्री अधिकार बचाने का अकेला जरिया पाया गया है।
इंटरनेट पर इस तरह की जानकारी वाली सैकड़ों रिपोर्ट मौजूद हैं और उनमें से हर किसी को परखे बिना भी हम इतना तो मान ही सकते हैं कि जब लोगों के जायज कामकाज छिन जाते हैं तो उनके पास नाजायज काम करके जिंदा रहने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता। यह बात सिर्फ सोमालिया पर लागू नहीं होती, भारत में भी जहां-जहां लोगों को उनकी जमीन से बेदखल किया जाता है, जहां-जहां उनके काम छिन जाते हैं, उन तमाम जगहों पर बेइंसाफी के शिकार लोगों के पास इंसाफ पर भरोसे की वजह भी नहीं बचती और जिंदा रहने की बेबसी में गलत काम की तरफ धकेल भी देती है। सोमालिया के लोगों को अगर दुनिया के दूसरे देशों से अपने समुद्र तट को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून अपने हाथ में लेना ही अकेला रास्ता दिख रहा है तो उसके साथ हमले जैसा बर्ताव करने वाले देशों को अपने बारे में भी सोचना चाहिए। यह सुनकर और देखकर हमें एक बार फिर पिछले साल हॉलीवुड से आई चर्चित फिल्म 'अवतारÓ याद पड़ती है जिसमें इस धरती के लालची इंसान एक दूसरे ग्रह पर जाकर वहां एक महंगे खनिज को निकालने के लिए वहां के जंगल, जमीन, जानवर और इंसान, सब पर हमला कर देते हैं और फिर अपनी हस्ती को बचाने के लिए वहां के लोग धरती से गए हमलावरों पर हमला करते हैं।
भारत में भी जिन इलाकों की जनता कानून अपने हाथ में लेने का हौसला जुटा पाती है वहां-वहां बाजारू हमलों को ऐसा जवाब देखना पड़ता है। और यह बात तो है ही कि हर बार ये जवाब सिर्फ हमलावरों को नहीं झेलने पड़ते, जो सामने पड़ता है उसे झेलने पड़ते हैं, जैसा कि सोमालिया के डकैत कर रहे हैं। यह बात तो अपनी जगह ठीक है कि दुनिया के कई देशों की फौजें मिलकर इन डकैतों को निपटा सकती हैं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि ऐसी हिंसा और अपराध की जमीन को ही कैसे खत्म किया जाए। इसके लिए दुनिया के आज के विकसित और ताकतवर, संपन्न और असरदार देशों को, उनके तहत आने वाले कारोबारों को अपनी नीयत काबू में रखनी होगी। इसके बिना बेइंसाफी के खिलाफ ये लड़ाई कई शक्लों में कई किस्म के नुकसान लेकर आएगी और आज इक्कसवीं सदी में भी दस-दस महीने तक डकैतों के कब्जे में लोगों के रहने और फिरौती देकर छूटने की नौबत आती रहेगी। सोमालिया को लेकर यह चर्चा बहुत कम होती है इसलिए आज हम यहां पर उसके बारे में लिखना जरूरी समझ रहे थे।
सोमाली समुद्री डकैतों के चंगुल से दस महीनों बाद छूटकर भारत और पाकिस्तान के जहाज कर्मचारी बचने की तरफ बढ़े हैं। उनके लिए जहाज के मालिक ने भुगतान किया और इस भुगतान में भारत सरकार ने कोई भी हिस्सा नहीं बंटाया। हम भी इस मुद्दे पर नहीं जा रहे हैं कि एक कारोबार में काम कर रहे भारतीय नाविकों को छुड़ाने के लिए भारत सरकार को डकैतों को भुगतान करना था या नहीं, हमारा आज का मुद्दा कुछ अलग है। सोमालिया के समुद्री डकैत पिछले कुछ बरसों में उसी अंदाज में दूसरे देशों के जहाजों पर कब्जा करके वसूली कर रहे हैं जिस अंदाज में आधी सदी पहले समुद्री डकैती पर अंगे्रजी फिल्में बना करती थीं। आज यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि दुनिया के जिन देशों के पास बड़ी-बड़ी नौसेनाएं हैं, उनके जहाज या उनके कर्मचारियों के चलाए हुए जहाज पर समुद्री लुटेरे या डकैत कब्जा कर लें और कोई देश उनका कुछ न बिगाड़ सके। लेकिन इसके पीछे की वजह जानने के लिए संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट और कई दूसरी रिपोर्ट को भी देखने की जरूरत है, जिनमें यह बताया गया है कि सोमालिया समुद्र तट से पिछले पांच-सात बरसों में ऐसी समुद्री डकैती बढऩे के क्या कारण हैं?
2005 के बाद से यह समुद्री डकैती बढ़ी है और इसकी एक बड़ी वजह यह पाई गई कि सोमालिया के समुद्र में बाहरी बड़ी कंपनियों द्वारा जिस बड़े पैमाने पर गैरकानूनी तरीके से मछलियां मारी जाती हैं और सोमालिया के पानी में विदेशी जहाज आकर जिस तरह से जहरीला कचरा फेंक जाते हैं, उनकी वजह से सोमाली मछुआरों की रोजी-रोटी छिन गई है। इनमें से बहुत से लोग लूटपाट जैसे अपराधों को जिंदा रहने का एक जरिया पा रहे हैं। कुछ रिपोर्ट यह भी बताती हैं कि समुद्र तट पर बसे हुए सोमाली समुदायों के बीच इन डकैतों को पूरा समर्थन मिला हुआ है क्योंकि इनकी ताकत को सोमालिया के समुद्री अधिकार बचाने का अकेला जरिया पाया गया है।
इंटरनेट पर इस तरह की जानकारी वाली सैकड़ों रिपोर्ट मौजूद हैं और उनमें से हर किसी को परखे बिना भी हम इतना तो मान ही सकते हैं कि जब लोगों के जायज कामकाज छिन जाते हैं तो उनके पास नाजायज काम करके जिंदा रहने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता। यह बात सिर्फ सोमालिया पर लागू नहीं होती, भारत में भी जहां-जहां लोगों को उनकी जमीन से बेदखल किया जाता है, जहां-जहां उनके काम छिन जाते हैं, उन तमाम जगहों पर बेइंसाफी के शिकार लोगों के पास इंसाफ पर भरोसे की वजह भी नहीं बचती और जिंदा रहने की बेबसी में गलत काम की तरफ धकेल भी देती है। सोमालिया के लोगों को अगर दुनिया के दूसरे देशों से अपने समुद्र तट को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून अपने हाथ में लेना ही अकेला रास्ता दिख रहा है तो उसके साथ हमले जैसा बर्ताव करने वाले देशों को अपने बारे में भी सोचना चाहिए। यह सुनकर और देखकर हमें एक बार फिर पिछले साल हॉलीवुड से आई चर्चित फिल्म 'अवतारÓ याद पड़ती है जिसमें इस धरती के लालची इंसान एक दूसरे ग्रह पर जाकर वहां एक महंगे खनिज को निकालने के लिए वहां के जंगल, जमीन, जानवर और इंसान, सब पर हमला कर देते हैं और फिर अपनी हस्ती को बचाने के लिए वहां के लोग धरती से गए हमलावरों पर हमला करते हैं।
भारत में भी जिन इलाकों की जनता कानून अपने हाथ में लेने का हौसला जुटा पाती है वहां-वहां बाजारू हमलों को ऐसा जवाब देखना पड़ता है। और यह बात तो है ही कि हर बार ये जवाब सिर्फ हमलावरों को नहीं झेलने पड़ते, जो सामने पड़ता है उसे झेलने पड़ते हैं, जैसा कि सोमालिया के डकैत कर रहे हैं। यह बात तो अपनी जगह ठीक है कि दुनिया के कई देशों की फौजें मिलकर इन डकैतों को निपटा सकती हैं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि ऐसी हिंसा और अपराध की जमीन को ही कैसे खत्म किया जाए। इसके लिए दुनिया के आज के विकसित और ताकतवर, संपन्न और असरदार देशों को, उनके तहत आने वाले कारोबारों को अपनी नीयत काबू में रखनी होगी। इसके बिना बेइंसाफी के खिलाफ ये लड़ाई कई शक्लों में कई किस्म के नुकसान लेकर आएगी और आज इक्कसवीं सदी में भी दस-दस महीने तक डकैतों के कब्जे में लोगों के रहने और फिरौती देकर छूटने की नौबत आती रहेगी। सोमालिया को लेकर यह चर्चा बहुत कम होती है इसलिए आज हम यहां पर उसके बारे में लिखना जरूरी समझ रहे थे।
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