जादू की छड़ी की उम्मीद

27 जून 11
मुंबई में एक प्रमुख अखबार मिड-डे के एक बड़े पत्रकार की हत्या के बाद महाराष्ट्र से लेकर देश की राजधानी तक बहुत हलचल हुई। यह पत्रकार पिछले दस-बीस बरसों से मुंबई के अंडरवल्र्ड की रिपोर्टिंग कर रहा था और अपराधियों के साथ उसका लगातार संपर्क बना हुआ था। जब बड़े-बड़े माफिया गिरोह मुंबई में हजारों करोड़ रुपए महीने के नफे का कारोबार करते हैं तो जाहिर है कि इंसानी जिंदगी अगर रोड़ा बनकर उनकी राह में आती है तो उसे हटाने में उन्हें कोई अधिक सोचने की जरूरत नहीं होती। जो अखबारनवीस खतरों से इतने करीब रहकर इतने समय तक काम करते रहा, उसके सिर पर तब तो कोई खतरा मंडराना ही था जब उसकी किसी खबर से माफिया का कोई बड़ा नुकसान हो सकता था, ऐसी नौबत के बीच जब यह हत्या हुई तो मीडिया और उनके हमदर्द बनकर खड़े हुए राजनीतिक दलों ने सरकार पर एक बड़ा दबाव खड़ा किया कि अपराधियों को तुरंत पकड़ा जाए। वैसे भी मीडिया की नाराजगी से बचने के लिए सरकार और उसके मातहत पुलिस कोई कसर तो रखने वाली थी नहीं, एक बड़ा सा ईनाम और घोषित किया गया और आज हफ्ते-दस दिन के भीतर गिरफ्तारी हो गई।
देश में चल रही बहुत सी दूसरी घटनाओं के बीच हमें इस पर लिखने का समय नहीं मिला लेकिन आज जब पांच-सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है और जब माफिया के एक सरगना छोटा शकील ने यह बयान दिया है कि पुलिस ने कातिलों का पता लगाने के लिए उससे भी संपर्क किया था, तब यह सोचने की जरूरत है कि क्या किसी अपराध को सुलझाने के लिए, अपराधियों को पकडऩे के लिए सरकार पर ऐसा कोई दबाव जांच में मदद करता है या जांच को गलत तरफ मोड़ भी सकता है? इस देश में बहुत से मामलों में लोगों का पुलिस का यह अनुभव तो हो सकता है कि बिना दबाव वह कोई काम नहीं करती। लेकिन एक दूसरा अनुभव यह भी रहा है कि जुलूस, धरना, प्रदर्शन और बंद के चलते कई बार इन सबको बंद करवाने के लिए पुलिस आनन-फानन जो हाथ लगे उसी को अपराधी साबित कर देना आसान काम समझती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जब एक बच्ची श्वेता शर्मा की हत्या के बाद बंद कुछ अधिक होने लगे और शहर कुछ अधिक खौलने लगा तो पुलिस ने कुछ बेकसूर लड़कों को पड़कर अपराधी बताकर शहर को शांत कर दिया। ये लड़के अदालत की एक पेशी में ही छूट गए और असली अपराधी कभी नहीं पकड़ा पाए।
मुंबई के मामले में कुछ हैरानी इसलिए भी हुई कि अपराधियों के समंदर में पुलिस को जाल डालकर घंटों में ही किसी को पकड़ लेने की बात मीडिया भी करते रहा और राजनीतिक दल भी। अपराधों की जांच कई बार इतनी मुश्किल होती है कि दिल्ली में आज तक आयुषी तलवार के कत्ल का मामला सुलझ नहीं रहा। मां-बाप गिरफ्तार करके जेल में डाल दिए गए लेकिन अदालत में कुछ साबित नहीं हो पा रहा। मुंबई में हाईकोर्ट ने इस पत्रकार की हत्या पर लगाई गई एक याचिका पर पुलिस को नोटिस जारी करके उससे एक रिपोर्ट भी मांगी। हत्या के किसी मामले में अदालत की ऐसी दखल पहले कभी देखी-सुनी याद नहीं पड़ती। यहां पर ब्रिटेन के सबसे माहिर पुलिस-जांच विभाग स्कॉटलैंड यार्ड की कहानियां याद पड़ती हैं कि किस तरह चौथाई या आधी सदी की मेहनत के बाद भी इसके जासूस कई अपराधों को सुलझा ही नहीं पाए। वहीं की एक दूसरी खबर बहुत बरस पहले आई थी कि मौत की सजा दिए जाने के अठ्ठावन बरस बाद यह साबित हुआ कि एक बेकसूर को अदालत ने मौत दे दी थी।
किसी तबके का एक इंसान मार डाला जाए तो उस तबके का विचलित होना और सड़कों पर आना जायज है। लेकिन ऐसे में भी हमारा यह मानना है कि अखबारनवीसों के अनुभवी तबके को यह याद रखना चाहिए कि हड़बड़ी में किस तरह जांच गलत होती है। और इस एक मामले से परे दूसरे बहुत से मामलों में भी हम यही रूख देखते हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि म्युनिसिपल चुनाव के दौरान राजधानी में एक भाजपा नेता गायब हो गया था और उसके अपहरण से लेकर उसकी हत्या तक के आरोप दूसरे दल पर लगते रहे, यह सत्तारूढ़ पार्टी सड़कों पर रही, शायद शहर भी बंद करवाया गया और बाद में पता लगा कि विरोधियों को मतदान के पहले बदनाम करने के लिए एक साजिश के तहत यह छोटा नेता गायब हो गया था। इस देश में चूंकि ऐसी चुनावी साजिशों पर बाद में कोई कार्रवाई होती नहीं है इसलिए बार-बार लोग तरह-तरह से ऐसी हरकत करते रहते हैं।
तरह-तरह की इन वारदातों को देखते हुए हमारा यह मानना है कि पुलिस या सरकार को कार्रवाई करने के लिए एक ठीक-ठाक समय देना चाहिए और उससे जादू की छड़ी घुमाने की कोई उम्मीद नहीं करना चाहिए।

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