26 जून 11
पुट्टपर्थी में सत्य सांई बाबा के गुजरने के बाद सैकड़ों करोड़ की उनकी सम्पत्ति में अब ट्रस्ट के लोगों द्वारा चोरी की खबर है। ऐसा एक मामला तो रंगे हाथों पकड़ाया है और वहां के लोग आश्रम के सामने धरने पर बैठ गए हैं कि बेईमान ट्रस्टियों को हटाया जाए। इन ट्रस्टियों में सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज सहित बाबा के कुछ रिश्तेदार भी हैं। इस सिलसिले में भारत के एक वामपंथी दल ने मांग की है कि राज्य सरकार इस ट्रस्ट को अपने नियंत्रण में ले ले। राज्य सरकारों का किसी ईमानदारी का कोई लंबा-चौड़ा रिकॉर्ड तो नहीं है लेकिन फिर भी वे अदालत, संसद और विधानसभा तथा जनता के प्रति जवाबदेह तो रहती ही हैं। इसलिए चोरी कर रहे लोगों वाले ट्रस्ट के मुकाबले सरकार को हम बेहतर मानते हैं और सरकार के साथ-साथ उसमें दूसरे निर्विवाद और बेदाग मौजूदा ट्रस्टी भी रखे जा सकते हैं।
धर्मों और आध्यात्मिक संस्थाओं से जुड़े हुए ट्रस्ट, वक्फबोर्ड और चर्चों के तहत आने वाली जमीन-जायदाद को लेकर हमेशा से यह सुनाई पड़ता है कि किस तरह लोग उसे लूट-खा रहे हैं। ईश्वर का कोई अस्तित्व होता तो वह अपने नाम पर दिए गए दान को बदमाशों से बचाता भी। लेकिन ईश्वर का सिर्फ नाम है, सिर्फ एक धारणा है इसलिए उसके नाम पर जुटी सम्पत्ति में चोरी करने में भी उसके नामलेवा ट्रस्टी जरा भी नहीं हिचकते हैं। देश में शायद ही ऐसे कोई धार्मिक ट्रस्ट हों जिनमें चोरी, बेईमानी न हो रही हो। छत्तीसगढ़ में हम लगातार यह देखते हैं कि किस तरह चर्च की लंबी-चौड़ी जमीन को समाज के ही प्रमुख लोग जालसाजी-धोखाधड़ी से खरीद लेते हैं। जो लोग एक धर्म के गुरू के आगे-पीछे घूमते हैं, वे ही अपने धर्म की जायदाद हो या किसी दूसरे धर्म की, उसे बेईमानी से खरीदने में जान लगा देते हैं। ऐसे मामले सरकारी दफ्तरों से लेकर अदालतों तक पटे हुए हैं। इसके अलावा दान के पैसों से चलने वाले बहुत से और ऐसे ट्रस्ट हैं जिनमें समाज सेवा के नाम पर इंसानी हरामखोर पल रहे हैं। किसी नेक काम के नाम पर, ईश्वर या गुरू के नाम पर, जाति या आध्यात्म के नाम पर दान जुटाया जाता है और उस पर ट्रस्टी ऐश करते हैं। उनकी सामाजिक और राजनीतिक ताकत इतनी होती है कि सरकार भी आमतौर पर उनके खिलाफ कुछ करने से कतराती है। अब सूचना का अधिकार आने के बाद इतना तो हुआ है कि ऐसे कई छल-कपट उजागर होने लगे हैं। लेकिन अदालत या सरकार से कार्रवाई होने में बहुत वक्त लग जाता है, अगर कोई कार्रवाई हो पाती है तो। कल तक जिस बाबा रामदेव को लेने के लिए केन्द्रीय मंत्रियों की टोली दिल्ली के विमानतल पर बिछी हुई थी और उनके साथ दिल्ली के सबसे आलीशान होटल में घंटों बैठक हुई, वही रामदेव अपनी कंपनियों और ट्रस्टों के लिए आज सरकारी जांच के घेरे में हैं। हमारा यह सवाल है कि ऐसी कोई जानकारी रातों-रात तो सरकार के पास आई नहीं होगी, और जब तक सरकार से उनकी बातचीत ठीक चल रही है तब तक तो किसी ट्रस्ट पर कोई कार्रवाई न हो, और जब बातचीत टूट जाए, वे सरकार पर हमले करने लगे तो फिर रातों-रात ऐसे ट्रस्ट निशाने पर आ जाएं। सरकार का यह रूख ठीक नहीं है और सार्वजनिक सम्पत्ति के लिए एक बेहतर इंतजाम देश में होना चाहिए।
न सिर्फ सत्य सांई बाबा का ट्रस्ट बल्कि देश-प्रदेश के बाकी तमाम ट्रस्ट भी पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और उनमें सरकार के प्रतिनिधि होने चाहिए और उसका सारा हिसाब-किताब खुला होना चाहिए। हमारा यह भी मानना है कि किसी की निजी सम्पत्ति को लेकर धोखाधड़ी और जालसाजी की जो सजा है उससे बहुत अधिक सजा सार्वजनिक सम्पत्ति या समाजसेवा के लिए मिले पैसों में धोखाधड़ी पर दी जानी चाहिए। ऐसा हाल हम खादी ग्रामोद्योग आयोग से लेकर गांधी के नाम पर बनी संस्थाओं तक देखते हैं। खादी के नाम पर सरकार से एक अनुदान मिलता है। यह अनुदान तमाम किस्म के गैर खादी कपड़ों पर ले लिया जाता है और टैक्स की चोरी इस पर अलग से होती है।
हमारा यह भी मानना है कि ऐसे ट्रस्टों में किसी एक व्यक्ति या उसके परिवार के लोग, उसके रिश्तेदार, उसके कर्मचारी, इनके रहने की एक सीमा होनी चाहिए। जब वे वहां पर अपनी जड़ें बहुत अधिक जमा लेते हैं तो किसी बेईमानी की ताकत भी पा लेते हैं। इसलिए ट्रस्टों के नियमों में फेरबदल करके पीढ़ी-दर-पीढ़ी के ऐसे कब्जे को खत्म करना चाहिए। सत्य सांई बाबा के परिवार के लोग इस ट्रस्ट में हैं और ऐसे में वहां सरकार का नियंत्रण जरूरी है क्योंकि रिश्तेदार एक अलग किस्म की ताकत वहां रख सकते हैं। और इसी से सबक लेकर पूरे देश में सरकारों को अपने-अपने इलाके के ट्रस्टों को ईमानदार रखने लायक फेरबदल करने के लिए नियमों में बदलाव कर लेना चाहिए।
पुट्टपर्थी में सत्य सांई बाबा के गुजरने के बाद सैकड़ों करोड़ की उनकी सम्पत्ति में अब ट्रस्ट के लोगों द्वारा चोरी की खबर है। ऐसा एक मामला तो रंगे हाथों पकड़ाया है और वहां के लोग आश्रम के सामने धरने पर बैठ गए हैं कि बेईमान ट्रस्टियों को हटाया जाए। इन ट्रस्टियों में सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज सहित बाबा के कुछ रिश्तेदार भी हैं। इस सिलसिले में भारत के एक वामपंथी दल ने मांग की है कि राज्य सरकार इस ट्रस्ट को अपने नियंत्रण में ले ले। राज्य सरकारों का किसी ईमानदारी का कोई लंबा-चौड़ा रिकॉर्ड तो नहीं है लेकिन फिर भी वे अदालत, संसद और विधानसभा तथा जनता के प्रति जवाबदेह तो रहती ही हैं। इसलिए चोरी कर रहे लोगों वाले ट्रस्ट के मुकाबले सरकार को हम बेहतर मानते हैं और सरकार के साथ-साथ उसमें दूसरे निर्विवाद और बेदाग मौजूदा ट्रस्टी भी रखे जा सकते हैं।
धर्मों और आध्यात्मिक संस्थाओं से जुड़े हुए ट्रस्ट, वक्फबोर्ड और चर्चों के तहत आने वाली जमीन-जायदाद को लेकर हमेशा से यह सुनाई पड़ता है कि किस तरह लोग उसे लूट-खा रहे हैं। ईश्वर का कोई अस्तित्व होता तो वह अपने नाम पर दिए गए दान को बदमाशों से बचाता भी। लेकिन ईश्वर का सिर्फ नाम है, सिर्फ एक धारणा है इसलिए उसके नाम पर जुटी सम्पत्ति में चोरी करने में भी उसके नामलेवा ट्रस्टी जरा भी नहीं हिचकते हैं। देश में शायद ही ऐसे कोई धार्मिक ट्रस्ट हों जिनमें चोरी, बेईमानी न हो रही हो। छत्तीसगढ़ में हम लगातार यह देखते हैं कि किस तरह चर्च की लंबी-चौड़ी जमीन को समाज के ही प्रमुख लोग जालसाजी-धोखाधड़ी से खरीद लेते हैं। जो लोग एक धर्म के गुरू के आगे-पीछे घूमते हैं, वे ही अपने धर्म की जायदाद हो या किसी दूसरे धर्म की, उसे बेईमानी से खरीदने में जान लगा देते हैं। ऐसे मामले सरकारी दफ्तरों से लेकर अदालतों तक पटे हुए हैं। इसके अलावा दान के पैसों से चलने वाले बहुत से और ऐसे ट्रस्ट हैं जिनमें समाज सेवा के नाम पर इंसानी हरामखोर पल रहे हैं। किसी नेक काम के नाम पर, ईश्वर या गुरू के नाम पर, जाति या आध्यात्म के नाम पर दान जुटाया जाता है और उस पर ट्रस्टी ऐश करते हैं। उनकी सामाजिक और राजनीतिक ताकत इतनी होती है कि सरकार भी आमतौर पर उनके खिलाफ कुछ करने से कतराती है। अब सूचना का अधिकार आने के बाद इतना तो हुआ है कि ऐसे कई छल-कपट उजागर होने लगे हैं। लेकिन अदालत या सरकार से कार्रवाई होने में बहुत वक्त लग जाता है, अगर कोई कार्रवाई हो पाती है तो। कल तक जिस बाबा रामदेव को लेने के लिए केन्द्रीय मंत्रियों की टोली दिल्ली के विमानतल पर बिछी हुई थी और उनके साथ दिल्ली के सबसे आलीशान होटल में घंटों बैठक हुई, वही रामदेव अपनी कंपनियों और ट्रस्टों के लिए आज सरकारी जांच के घेरे में हैं। हमारा यह सवाल है कि ऐसी कोई जानकारी रातों-रात तो सरकार के पास आई नहीं होगी, और जब तक सरकार से उनकी बातचीत ठीक चल रही है तब तक तो किसी ट्रस्ट पर कोई कार्रवाई न हो, और जब बातचीत टूट जाए, वे सरकार पर हमले करने लगे तो फिर रातों-रात ऐसे ट्रस्ट निशाने पर आ जाएं। सरकार का यह रूख ठीक नहीं है और सार्वजनिक सम्पत्ति के लिए एक बेहतर इंतजाम देश में होना चाहिए।
न सिर्फ सत्य सांई बाबा का ट्रस्ट बल्कि देश-प्रदेश के बाकी तमाम ट्रस्ट भी पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और उनमें सरकार के प्रतिनिधि होने चाहिए और उसका सारा हिसाब-किताब खुला होना चाहिए। हमारा यह भी मानना है कि किसी की निजी सम्पत्ति को लेकर धोखाधड़ी और जालसाजी की जो सजा है उससे बहुत अधिक सजा सार्वजनिक सम्पत्ति या समाजसेवा के लिए मिले पैसों में धोखाधड़ी पर दी जानी चाहिए। ऐसा हाल हम खादी ग्रामोद्योग आयोग से लेकर गांधी के नाम पर बनी संस्थाओं तक देखते हैं। खादी के नाम पर सरकार से एक अनुदान मिलता है। यह अनुदान तमाम किस्म के गैर खादी कपड़ों पर ले लिया जाता है और टैक्स की चोरी इस पर अलग से होती है।
हमारा यह भी मानना है कि ऐसे ट्रस्टों में किसी एक व्यक्ति या उसके परिवार के लोग, उसके रिश्तेदार, उसके कर्मचारी, इनके रहने की एक सीमा होनी चाहिए। जब वे वहां पर अपनी जड़ें बहुत अधिक जमा लेते हैं तो किसी बेईमानी की ताकत भी पा लेते हैं। इसलिए ट्रस्टों के नियमों में फेरबदल करके पीढ़ी-दर-पीढ़ी के ऐसे कब्जे को खत्म करना चाहिए। सत्य सांई बाबा के परिवार के लोग इस ट्रस्ट में हैं और ऐसे में वहां सरकार का नियंत्रण जरूरी है क्योंकि रिश्तेदार एक अलग किस्म की ताकत वहां रख सकते हैं। और इसी से सबक लेकर पूरे देश में सरकारों को अपने-अपने इलाके के ट्रस्टों को ईमानदार रखने लायक फेरबदल करने के लिए नियमों में बदलाव कर लेना चाहिए।
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