सीरिया से आई खबर की मिसाल

17 जून 2011
सीरिया की एक खबर है कि वहां सरकार से बगावत पर उतारू, सड़कों पर डटी हुई जनता के दबाव के सामने वहां के राष्ट्रपति के भाई ने अपने कारोबार की कमाई जनता को देने की घोषणा की है ताकि सार्वजनिक कामों के लिए उसका इस्तेमाल हो सके और उसने यह भी घोषणा कि वह कोई नया कारोबार नहीं करेगा जिससे कि उसे कोई निजी कमाई हो सके। सीरिया में जनता की नफरत को झेलने वाला सत्ता पर काबिज परिवार दुनिया के कई देशों द्वारा प्रतिबंधित भी कर दिया गया। ऐसे में इसके सामने अपनी जान बचाने के लिए और सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए इस तरह के कई समझौते करने का दबाव है। राष्ट्रपति का यह भाई देश की सबसे बड़ी टेलीफोन कंपनी सीरियाटेल में चालीस फीसदी का हिस्सेदार है। उसने अब अपने-आपको जनहित के कामों में लगा देने की घोषणा की है। उसने कहा कि वह अब सीरिया, उसकी जनता और उसके राष्ट्रपति पर बोझ नहीं बने रहना चाहता। राष्ट्रपति के इस रिश्ते के भाई पर सत्ता की मदद से कारोबार को फैलाने और बढ़ाने के आरोप लगते आए हैं।
हिन्दुस्तान में भी कई लोग इस मिसाल से एक नसीहत ले सकते हैं। जैसे कर्नाटक में रेड्डी बंधु, महाराष्ट्र में अशोक चव्हाण सहित दर्जन भर दूसरे नेता, दिल्ली में कलमाड़ी का कुनबा, चेन्नई में करूणानिधि का पूरा कुनबा और अंबानी जैसे कारोबारी। सीरिया में जिस तरह जनता की नफरत ने कानून से ऊपर जाकर सड़कों पर इंसाफ करना तय किया है, वैसी नौबत भारत में आए उसके पहले यहां के चोर और बेईमान सबक लेकर अगर काली कमाई को भूखी जनता के काम में लगाना तय करते हैं तो यह तथाकथित भारतीय संस्कृति की दान की तथाकथित परंपरा के अनुरूप भी होगा और देश का भी इससे भला होगा। पाठकों को याद होगा कि हम पहले से एक बात लिखते आ रहे हैं कि राजनीतिक दलों को एक ऐसी आचार संहिता बनानी चाहिए जिसके तहत वे अपनी पार्टी के संपन्न लोगों की कमाई का एक हिस्सा पार्टी के खर्च के लिए और एक हिस्सा सीधे जनता की जरूरत के कामों के लिए लेने की शर्त रख दें। पार्टी के किसी भी पद और किसी चुनाव में पार्टी की टिकट के लिए ऐसा घोषित दान जरूरी कर देना चाहिए। यह इसलिए न्यायसंगत होगा क्योंकि तमाम राजनीतिक कारोबारियों को अपने धंधे में अपनी राजनीतिक ताकत का फायदा भी होता है और राजनीति से अपनी प्रतिबद्धता के चलते जनहित में भागीदारी की जिम्मेदारी भी उनको निभानी चाहिए। जिस तरह कारखानों और कारोबारों को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के तहत स्थानीय विकास में भागीदारी सुझाई जाती है, उसी तरह राजनीतिक कारोबारियों को भी राजनीतिक प्रभाव के घोषित और अघोषित उपयोग के एवज में पार्टी को और जनता को ऐसा भुगतान करना चाहिए।
आज जब देश में जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक और सुप्रीम कोर्ट तक कालेधन जब्त करने की बात हो रही है तो हम यह भी सुझाना चाहेंगे कि कालाधन साबित होते ही उसे पूरी तरह राजसात करने के लिए एक कड़ा कानून बनाना चाहिए और जनता के खजाने से अगर ऐसा निकाला गया है तो उस पर एक कड़ी सजा भी रखनी चाहिए। यह बात हम अन्ना और बाबा के अभियान के बरसों पहले से लिखते आ रहे हैं और यह भी सुझाते आ रहे हैं कि ताकतवर लोगों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए एक अलग अदालत का इंतजाम होना चाहिए जो कि तेजी से कार्रवाई कर सके और सत्ता के बेजा इस्तेमाल पर, अपने से कमजोर के साथ रिश्वतखोरी करने वाले लोगों को एक अलग से कड़ी सजा का इंतजाम करना चाहिए। पाठकों को यह भी याद होगा कि हम बरसों से यह लिखते आ रहे हैं कि सत्ता की ताकत के बेजा इस्तेमाल के मामलों की जांच के लिए अलग से एक संवैधानिक संस्था बननी चाहिए, आज उसी किस्म की एक लोकपाल संस्था की बात हो रही है। लोकपाल की बात बहुत पुरानी है लेकिन आज उसके जिस तरह के ढांचे की चर्चा हो रही है वैसे एक संवैधानिक ढांचे की कल्पना हम पहले भी कर चुके हैं और वह किस तरह सरकारों के काबू से परे रहे यह भी हमने पहले सुझाया है।
सत्ता की ताकत से कालाधन जुटाने वाले लोगों को कड़ी सजा, उनकी जायदाद की जब्ती का काम रफ्तार से अगर नहीं हो पाता तो उससे ऐसे लोग सत्ता पर काबिज बने रहते हैं और एक तरफ तो ये लोग अपने खिलाफ चल रही जांच और अदालती कार्रवाई को प्रभावित करते हैं, दूसरी तरफ लंबी-चौड़ी काली कमाई जारी भी रखते हैं। यह सिलसिला बदलना चाहिए।
हमारी इस पूरी सलाह का अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के उठाए मुद्दों से कुछ भी लेना-देना नहीं है क्योंकि साधारण से मुद्दों को लेकर ये दोनों खेमे जिस तरह के हिंसक और अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों से काम कर रहे हैं उनसे हम बिल्कुल ही असहमत हैं। हमारा मानना है कि अच्छे मुद्दों को उठाकर गलत तरीके से चलने वाला कोई आंदोलन अच्छा नहीं हो जाता। इसलिए हम उनकी कोई भी चर्चा अपनी सलाह के साथ जोड़कर करना नहीं चाहते और न ही उसकी कोई जरूरत है। भ्रष्टाचार बुरा है और उसे खत्म करना चाहिए यह अन्ना-बाबा और उनके पीछे की राजनीतिक ताकतों से बहुत परे के वामपंथी दल अपने राज में लगभग पूरी तरह साबित कर चुके हैं। एक पार्टी का भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कैसा रूख रहना चाहिए और उसके नेताओं को कैसी आचार संहिता पर अमल करना चाहिए यह बात न तो शुचिता की बात करने वाली हिन्दुत्ववादी पार्टियां साबित कर पाईं, न लोहिया के पदचिन्ह पर चलने का दावा करने वाले लालू-मुलायम साबित कर पाए और न ही गांधी-नेहरू की तस्वीरें टांगकर फर्जीवाड़ा करने वाले कांगे्रसी साबित कर पाए। इसे एक बहुत ही नियमित और निरंतर शर्त की तरह वामपंथियों ने साबित किया और उनकी मिसाल भी बाकी राजनीतिक दलों के इस एक मामले में माननी चाहिए।
कुल मिलाकर कालाधन जनता के इस्तेमाल में वापिस आए और इसे जुटाने वाले सत्तारूढ़ या सत्ता आधारित भ्रष्ट लोग लंबी जेल काटें यह जरूरी है।

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