27 जून 11
कई बार हम यह बात लिखते हैं कि किस तरह नेपाल की छोटी-छोटी नाबालिग लड़कियां वहां से लाकर मुंबई में चकलाघरों में दिन में कई-कई बार बेची जाती हैं। भारत और महाराष्ट्र में समय-समय पर हिन्दूवादी पार्टियों का भी राज रहा लेकिन दुनिया के अकेले हिंदू देश नेपाल की बच्चियों का यहां बिकना न बंद हुआ, न कम हुआ। एक बहुत जमे-जमाए जुर्म के कारोबार के तहत वहां की गरीब बच्चियों को लाकर मुंबई और हिन्दुस्तान के कई दूसरे शहरों के चकलों में बेचा जाता है। इनकी यहां पर हालत का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि देह के ग्राहक कई बार अपने एड्स को लेकर आते हैं और इस खुशफहमी को लेकर भी आते हैं कि किसी कुंवारी लड़की के साथ बिना कंडोम सेक्स से उनका एड्स उस लड़की में चले जाएगा। इसलिए कम उम्र की बच्चियों को सौ-सौ बार कुंवारा बताकर भी बेच दिया जाता है।
अमरीका के टीवी चैनल सीएनएन ने कल इन बच्चियों पर एक डाक्यूमेंट्री प्रसारित की है-नेपाल्स स्टोलन चिल्ड्रन। इसे हॉलीवुड की एक अभिनेत्री डेमी मूर ने बनाया है और इसके केंद्र में इन बच्चियों को बचाने के लिए मेहनत कर रही एक नेपाली सामाजिक कार्यकर्ता अनुराधा कोइराला है। सीएनएन की यह कोशिश उसके फ्रीडम प्रोजेक्ट के तहत हो रही है जिसमें वे आज की दुनिया में गुलामी पर ऐसी डाक्यूमेंट्री बना रहे हैं। इस फिल्म का अंदाज है कि हर बरस कोई 15 हजार नेपाली बच्चियां भारत में स्मगल करके यहां देह के धंधे में धकेल दी जाती है।
एक दूसरी खबर अभी दिल दहलाकर थमी भी नहीं है जिसमें अफग़ान सरकार का कहना है कि दक्षिणी अफग़ानिस्तान में पुलिस पर हमला करने के लिए चरमपंथियों ने आठ साल की जिस लड़की का इस्तेमाल किया था, उसकी धमाके में मौत हो गई है। चरमपंथियों ने लड़की को एक पैकेट दिया और कहा कि वो उसे लेकर पुलिस की गाड़ी तक जाए। जैसे ही लड़की गाड़ी तक पहुंची चरमपंथियों ने रिमोट कंट्रोल से उसमें धमाका कर दिया। इस घटना में और किसी की मौत नहीं हुई है।
इस खबर के बाद बस्तर में नक्सल मुठभेड़ में पुलिस के हाथ लगे ऐसे वीडियो याद पड़ते हैं जिनमें नक्सली अपने हमलों में बच्चों को साथ लेकर चलते हैं और हमलों के बाद लूटे गए हथियार ढोने के लिए इन बच्चों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे वीडियो खुद नक्सली अपने हमलों को दस्तावेज करने के लिए बनाते हैं। दुनिया के कुछ दूसरे देशों में भी आतंकी या बागी लोग मोर्चों पर बच्चा का सैनिकों की तरह इस्तेमाल करते हैं।
अपनी बात लिखने के पहले मैं उत्तरप्रदेश को एक बार और याद कर लेना चाहता हूं जहां इन दिनों कोई सूरज नाबालिग पर बलात्कार या सामूहिक बलात्कार की खबर के बिना शायद ही निकल पा रहा है। ऐसी बहुत सी बच्चियों की, किसी की आंख फोड़ दी जा रही है तो किसी को जला दिया जा रहा है और ऐसी बहुत सी बच्चियां वहां की महिला मुख्यमंत्री मायावती की हमजात भी हैं।
इस दुनिया में जो लोग मानवीय मूल्यों की बात करते हैं उन्हें अपनी जुबान पर एक बार फिर गौर करना चाहिए। इंसानियत शब्द से जो कागजी मतलब निकलते हैं उन्हें इंसानों की सच्ची पहचान मान लेना पूरी तरह झूठ होगा। इंसान ने अपने-आपको अपनी असलियत से बेहतर दिखाने के लिए एक हैवान की तस्वीर गढ़ी और तमाम बुराईयों को उसमें ठूंसकर इस तरह अपने-आपको उससे अलग कर लिया मानो जलाने के लायक सिर्फ दशहरे का रावण है, या होली पर जलाई जाने वाली होलिका। कुछ दूसरे धर्मों में शैतान को पत्थर मारने का रिवाज है या कहीं पर कोई और तरीका होगा बुराई के सीने में सलीब ठोंक देने का।
कुल मिलाकर बात इतनी है कि बुराई के प्रतीक के रूप में कुछ प्रतिमाएं चबूतरों पर खड़ी करके इंसान अपने-आपको उससे बिल्कुल अलग साबित करने की कोशिश जाने कबसे कर रहा है। यह एक तरफ तो अपने-आपको धोखा देने की बात है और दूसरी तरफ दूसरों को धोखा देने की बात है। यह इंसान के धोखेबाजी के मिजाज के कई पहलुओं में से एक है। वह अपने-आपको मानवीय बताते चलता है और बात-बात पर इंसानियत का उलाहना देते चलता है।
इंसानियत का एक काफी बड़ा हिस्सा उन तमाम बातों से भरा हुआ है, लबालब है जिसे हम हैवानियत कहकर पत्थर मारते हैं। ऊपर बच्चों के साथ जो सुलूक गिनाया गया है, उसे अगर कुछ आगे ले जाकर या कुछ पीछे ले जाकर देखें तो ऑस्ट्रेलिया की स्टोलन जनरेशन याद पड़ती है। वहां के मूल निवासियों (भारत की जुबान में आदिवासी) के बच्चों को वहां की गोरी और शहरी सरकार ने उनके मां-बाप से छीनकर लाकर शहरी गोरे परिवारों के साथ या चर्च के हास्टलों में रखने का जुर्म किया था ताकि उन बच्चों को सलीका सिखाया जा सके। यह एक और संपन्न, शहरी, कुलीन सोच है जो किसी लहू को नीला कहती है और किसी सांवले रंग से नफरत करते हुए गोरे बनने की क्रीम का बाजार बढ़ाती है।
चौथाई या आधी सदी के ऐसे प्रयोग के बाद अभी कुछ बरस पहले जब ऑस्ट्रेलिया में एक आत्मचिंतन, आत्ममंथन और आत्मग्लानि के बाद सरकार को लगा कि दुनिया के इतिहास में उसका नाम नफरत के साथ लिखा जा रहा है तो उसने इन समुदायों के लोगों को वहां की संसद में बुलाकर उनसे इतिहास के इस अपराध के लिए माफी मांगी।
बड़े जुल्मों की ऐसी दिल दहलाने वाली कहानियों को अगर छोड़ भी दें तो हिंदुस्तान के घर-घर में ऐसे छोटे बच्चे काम करते मिल जाते हैं जिन्हें स्कूल में होना चाहिए और कुछ मामलों में तो वे इतने छोटे होते हैं कि उन्हें सिर्फ गोद में होना चाहिए।
बच्चों की बात करते ही छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश के समय से चली आ रही बाल आरक्षक की एक प्रथा याद आती है और इसके बारे में मैं पहले कई बार अलग-अलग सिलसिले में लिख भी चुका हूं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जहां आजादी का स्मारक, जयस्तंभ बना हुआ है, वहीं पर अभी कुछ बरस पहले तक रेल्वे पुलिस का दफ्तर था। वहां पर एक पांच बरस का बच्चा पुलिस की भारी-भरकम वर्दी पहने, बड़े बक्कल वाला मोटा बेल्ट लगाए और टोपी पहने ड्यूटी करते दिखता था। दफ्तर में वह कागज इधर-उधर लाने-ले जाने का काम करता था और बाहर पान ठेले पर जाकर दिन भर सिगरेट-बीड़ी, गुटका लाने का काम भी करता था। वहां मैंने जब उसकी फाईल निकलवाकर देखी तो गोद के बच्चे जैसे मासूम चेहरे वाले उसके फोटो के साथ उसकी पढ़ाई का जिक्र था, शैक्षणिक योग्यता केजी-वन।
इस बच्चे के पिता की पुलिस की ड्यूटी में रहते हुए मौत हो गई थी और मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में पुलिस में यह इंतजाम है कि ऐसे गुजर गए कर्मचारियों के किसी भी उम्र के बच्चे को पुलिस बाल आरक्षक बना सकती है। इससे उन्हें सिपाही की तनख्वाह का आधा हिस्सा मिलता है और अपनी मां सहित पुलिस लाईन में घर में रहने भी मिलता है। इसके एवज में उन्हें एक दिन की आड़ से ड्यूटी करनी होती है और बाकी दिन वे स्कूल जा सकते हैं। मुझे अपने बचपन की स्कूल याद है जहां हमारी क्लास में ऐसा एक बाल आरक्षक था और थाने के बगल से आते-जाते हम उसे वर्दी में देखने के आदी हो गए थे। वह चूंकि एक दिन की आड़ से ही स्कूल आता था इसलिए पढ़ाई में उसका कमजोर रहना जायज था और इसके लिए वह गुरुजी की मार खाते ही रहता था।
यह बात आधी सदी से कुछ कम पहले की है और अभी इस छोटे बच्चे को देखे भी पांच बरस से कुछ ही अधिक वक्त हुआ होगा। कुल मिलाकर बात यह कि चालीस बरसों का यह अरसा भी बच्चों की हालत को बहुत अधिक बदल नहीं पाया। यह नया बाल आरक्षक सरकार के बड़े ही हैवानी नियमों के तहत जकड़ा हुआ था और सरकार की जुबान उसे मानवीय आधार पर दी जा रही रियायत गिन रही थी। जब इस बच्चे के पिता की मौत हुई तो वह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सवा सौ किलोमीटर दूर बिलासपुर में तैनात था। नियमों के मुताबिक उसके पांच बरस के बेटे को वहीं पर तैनाती मिली, लेकिन बाल आरक्षकों को एसपी के दफ्तर से नीचे अब तैनात नहीं किया जाता इसलिए इस बच्चे को रेल्वे के एसपी के दफ्तर आना पड़ता था जो कि रायपुर में था। एक दिन की आड़ से यह लड़का बिलासपुर में घर से स्टेशन आता था, वहां से रेल्वे के किसी दूसरे आते-जाते सिपाही के साथ ट्रेन से रायपुर पहुंचता था और फिर यहां रेल्वे स्टेशन से कोई चार-पांच किलोमीटर दूर रेल्वे एसपी के ऑफिस आकर ड्यूटी करता था।
नियम तो ऐसे ही थे लेकिन बाद में पुलिस के कुछ बड़े अफसरों से मैंने बात की, कुछ उनके मन में खुद भी रहम पैदा हुआ था और उन्होंने इस बच्चे को इस ड्यूटी से धीरे-धीरे रियायत देना शुरू किया।
हमारे घर के जिस उम्र के बच्चे को सिर्फ गोद, आइसक्रीम और चॉकलेट का हकदार माना जाता है उस उम्र का, पिता खो चुका बच्चा अपनी मां से दूर सवा सौ किलोमीटर आता था और सवा सौ किलोमीटर जाता था।
लेकिन फिर भी लोकतंत्र की यह कू्ररता मुंबई के चकलों के मुकाबले कुछ नहीं है, अफगानिस्तान और बस्तर के आतंकियों के मुकाबले कुछ नहीं है।
अब बताएं इंसानियत के मायने क्या हैं?
कई बार हम यह बात लिखते हैं कि किस तरह नेपाल की छोटी-छोटी नाबालिग लड़कियां वहां से लाकर मुंबई में चकलाघरों में दिन में कई-कई बार बेची जाती हैं। भारत और महाराष्ट्र में समय-समय पर हिन्दूवादी पार्टियों का भी राज रहा लेकिन दुनिया के अकेले हिंदू देश नेपाल की बच्चियों का यहां बिकना न बंद हुआ, न कम हुआ। एक बहुत जमे-जमाए जुर्म के कारोबार के तहत वहां की गरीब बच्चियों को लाकर मुंबई और हिन्दुस्तान के कई दूसरे शहरों के चकलों में बेचा जाता है। इनकी यहां पर हालत का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि देह के ग्राहक कई बार अपने एड्स को लेकर आते हैं और इस खुशफहमी को लेकर भी आते हैं कि किसी कुंवारी लड़की के साथ बिना कंडोम सेक्स से उनका एड्स उस लड़की में चले जाएगा। इसलिए कम उम्र की बच्चियों को सौ-सौ बार कुंवारा बताकर भी बेच दिया जाता है।
अमरीका के टीवी चैनल सीएनएन ने कल इन बच्चियों पर एक डाक्यूमेंट्री प्रसारित की है-नेपाल्स स्टोलन चिल्ड्रन। इसे हॉलीवुड की एक अभिनेत्री डेमी मूर ने बनाया है और इसके केंद्र में इन बच्चियों को बचाने के लिए मेहनत कर रही एक नेपाली सामाजिक कार्यकर्ता अनुराधा कोइराला है। सीएनएन की यह कोशिश उसके फ्रीडम प्रोजेक्ट के तहत हो रही है जिसमें वे आज की दुनिया में गुलामी पर ऐसी डाक्यूमेंट्री बना रहे हैं। इस फिल्म का अंदाज है कि हर बरस कोई 15 हजार नेपाली बच्चियां भारत में स्मगल करके यहां देह के धंधे में धकेल दी जाती है।
एक दूसरी खबर अभी दिल दहलाकर थमी भी नहीं है जिसमें अफग़ान सरकार का कहना है कि दक्षिणी अफग़ानिस्तान में पुलिस पर हमला करने के लिए चरमपंथियों ने आठ साल की जिस लड़की का इस्तेमाल किया था, उसकी धमाके में मौत हो गई है। चरमपंथियों ने लड़की को एक पैकेट दिया और कहा कि वो उसे लेकर पुलिस की गाड़ी तक जाए। जैसे ही लड़की गाड़ी तक पहुंची चरमपंथियों ने रिमोट कंट्रोल से उसमें धमाका कर दिया। इस घटना में और किसी की मौत नहीं हुई है।
इस खबर के बाद बस्तर में नक्सल मुठभेड़ में पुलिस के हाथ लगे ऐसे वीडियो याद पड़ते हैं जिनमें नक्सली अपने हमलों में बच्चों को साथ लेकर चलते हैं और हमलों के बाद लूटे गए हथियार ढोने के लिए इन बच्चों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे वीडियो खुद नक्सली अपने हमलों को दस्तावेज करने के लिए बनाते हैं। दुनिया के कुछ दूसरे देशों में भी आतंकी या बागी लोग मोर्चों पर बच्चा का सैनिकों की तरह इस्तेमाल करते हैं।
अपनी बात लिखने के पहले मैं उत्तरप्रदेश को एक बार और याद कर लेना चाहता हूं जहां इन दिनों कोई सूरज नाबालिग पर बलात्कार या सामूहिक बलात्कार की खबर के बिना शायद ही निकल पा रहा है। ऐसी बहुत सी बच्चियों की, किसी की आंख फोड़ दी जा रही है तो किसी को जला दिया जा रहा है और ऐसी बहुत सी बच्चियां वहां की महिला मुख्यमंत्री मायावती की हमजात भी हैं।
इस दुनिया में जो लोग मानवीय मूल्यों की बात करते हैं उन्हें अपनी जुबान पर एक बार फिर गौर करना चाहिए। इंसानियत शब्द से जो कागजी मतलब निकलते हैं उन्हें इंसानों की सच्ची पहचान मान लेना पूरी तरह झूठ होगा। इंसान ने अपने-आपको अपनी असलियत से बेहतर दिखाने के लिए एक हैवान की तस्वीर गढ़ी और तमाम बुराईयों को उसमें ठूंसकर इस तरह अपने-आपको उससे अलग कर लिया मानो जलाने के लायक सिर्फ दशहरे का रावण है, या होली पर जलाई जाने वाली होलिका। कुछ दूसरे धर्मों में शैतान को पत्थर मारने का रिवाज है या कहीं पर कोई और तरीका होगा बुराई के सीने में सलीब ठोंक देने का।
कुल मिलाकर बात इतनी है कि बुराई के प्रतीक के रूप में कुछ प्रतिमाएं चबूतरों पर खड़ी करके इंसान अपने-आपको उससे बिल्कुल अलग साबित करने की कोशिश जाने कबसे कर रहा है। यह एक तरफ तो अपने-आपको धोखा देने की बात है और दूसरी तरफ दूसरों को धोखा देने की बात है। यह इंसान के धोखेबाजी के मिजाज के कई पहलुओं में से एक है। वह अपने-आपको मानवीय बताते चलता है और बात-बात पर इंसानियत का उलाहना देते चलता है।
इंसानियत का एक काफी बड़ा हिस्सा उन तमाम बातों से भरा हुआ है, लबालब है जिसे हम हैवानियत कहकर पत्थर मारते हैं। ऊपर बच्चों के साथ जो सुलूक गिनाया गया है, उसे अगर कुछ आगे ले जाकर या कुछ पीछे ले जाकर देखें तो ऑस्ट्रेलिया की स्टोलन जनरेशन याद पड़ती है। वहां के मूल निवासियों (भारत की जुबान में आदिवासी) के बच्चों को वहां की गोरी और शहरी सरकार ने उनके मां-बाप से छीनकर लाकर शहरी गोरे परिवारों के साथ या चर्च के हास्टलों में रखने का जुर्म किया था ताकि उन बच्चों को सलीका सिखाया जा सके। यह एक और संपन्न, शहरी, कुलीन सोच है जो किसी लहू को नीला कहती है और किसी सांवले रंग से नफरत करते हुए गोरे बनने की क्रीम का बाजार बढ़ाती है।
चौथाई या आधी सदी के ऐसे प्रयोग के बाद अभी कुछ बरस पहले जब ऑस्ट्रेलिया में एक आत्मचिंतन, आत्ममंथन और आत्मग्लानि के बाद सरकार को लगा कि दुनिया के इतिहास में उसका नाम नफरत के साथ लिखा जा रहा है तो उसने इन समुदायों के लोगों को वहां की संसद में बुलाकर उनसे इतिहास के इस अपराध के लिए माफी मांगी।
बड़े जुल्मों की ऐसी दिल दहलाने वाली कहानियों को अगर छोड़ भी दें तो हिंदुस्तान के घर-घर में ऐसे छोटे बच्चे काम करते मिल जाते हैं जिन्हें स्कूल में होना चाहिए और कुछ मामलों में तो वे इतने छोटे होते हैं कि उन्हें सिर्फ गोद में होना चाहिए।
बच्चों की बात करते ही छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश के समय से चली आ रही बाल आरक्षक की एक प्रथा याद आती है और इसके बारे में मैं पहले कई बार अलग-अलग सिलसिले में लिख भी चुका हूं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जहां आजादी का स्मारक, जयस्तंभ बना हुआ है, वहीं पर अभी कुछ बरस पहले तक रेल्वे पुलिस का दफ्तर था। वहां पर एक पांच बरस का बच्चा पुलिस की भारी-भरकम वर्दी पहने, बड़े बक्कल वाला मोटा बेल्ट लगाए और टोपी पहने ड्यूटी करते दिखता था। दफ्तर में वह कागज इधर-उधर लाने-ले जाने का काम करता था और बाहर पान ठेले पर जाकर दिन भर सिगरेट-बीड़ी, गुटका लाने का काम भी करता था। वहां मैंने जब उसकी फाईल निकलवाकर देखी तो गोद के बच्चे जैसे मासूम चेहरे वाले उसके फोटो के साथ उसकी पढ़ाई का जिक्र था, शैक्षणिक योग्यता केजी-वन।
इस बच्चे के पिता की पुलिस की ड्यूटी में रहते हुए मौत हो गई थी और मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में पुलिस में यह इंतजाम है कि ऐसे गुजर गए कर्मचारियों के किसी भी उम्र के बच्चे को पुलिस बाल आरक्षक बना सकती है। इससे उन्हें सिपाही की तनख्वाह का आधा हिस्सा मिलता है और अपनी मां सहित पुलिस लाईन में घर में रहने भी मिलता है। इसके एवज में उन्हें एक दिन की आड़ से ड्यूटी करनी होती है और बाकी दिन वे स्कूल जा सकते हैं। मुझे अपने बचपन की स्कूल याद है जहां हमारी क्लास में ऐसा एक बाल आरक्षक था और थाने के बगल से आते-जाते हम उसे वर्दी में देखने के आदी हो गए थे। वह चूंकि एक दिन की आड़ से ही स्कूल आता था इसलिए पढ़ाई में उसका कमजोर रहना जायज था और इसके लिए वह गुरुजी की मार खाते ही रहता था।
यह बात आधी सदी से कुछ कम पहले की है और अभी इस छोटे बच्चे को देखे भी पांच बरस से कुछ ही अधिक वक्त हुआ होगा। कुल मिलाकर बात यह कि चालीस बरसों का यह अरसा भी बच्चों की हालत को बहुत अधिक बदल नहीं पाया। यह नया बाल आरक्षक सरकार के बड़े ही हैवानी नियमों के तहत जकड़ा हुआ था और सरकार की जुबान उसे मानवीय आधार पर दी जा रही रियायत गिन रही थी। जब इस बच्चे के पिता की मौत हुई तो वह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सवा सौ किलोमीटर दूर बिलासपुर में तैनात था। नियमों के मुताबिक उसके पांच बरस के बेटे को वहीं पर तैनाती मिली, लेकिन बाल आरक्षकों को एसपी के दफ्तर से नीचे अब तैनात नहीं किया जाता इसलिए इस बच्चे को रेल्वे के एसपी के दफ्तर आना पड़ता था जो कि रायपुर में था। एक दिन की आड़ से यह लड़का बिलासपुर में घर से स्टेशन आता था, वहां से रेल्वे के किसी दूसरे आते-जाते सिपाही के साथ ट्रेन से रायपुर पहुंचता था और फिर यहां रेल्वे स्टेशन से कोई चार-पांच किलोमीटर दूर रेल्वे एसपी के ऑफिस आकर ड्यूटी करता था।
नियम तो ऐसे ही थे लेकिन बाद में पुलिस के कुछ बड़े अफसरों से मैंने बात की, कुछ उनके मन में खुद भी रहम पैदा हुआ था और उन्होंने इस बच्चे को इस ड्यूटी से धीरे-धीरे रियायत देना शुरू किया।
हमारे घर के जिस उम्र के बच्चे को सिर्फ गोद, आइसक्रीम और चॉकलेट का हकदार माना जाता है उस उम्र का, पिता खो चुका बच्चा अपनी मां से दूर सवा सौ किलोमीटर आता था और सवा सौ किलोमीटर जाता था।
लेकिन फिर भी लोकतंत्र की यह कू्ररता मुंबई के चकलों के मुकाबले कुछ नहीं है, अफगानिस्तान और बस्तर के आतंकियों के मुकाबले कुछ नहीं है।
अब बताएं इंसानियत के मायने क्या हैं?
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