12 जून 2011
कांग्रेस का मुखपत्र कांग्रेसियों के आम चरित्र चापलूसी से परे बरत रहा है, और अब खबर है कि उसके संपादक को पार्टी की सीमाओं में रहने की ताकीद भी कर दी गई है। बात यूपीए के चार बड़े कांग्रेसी मंत्रियों के , एयरपोर्ट पर योग गुरु बाबा रामदेव के स्वागत में लाल कालीन बिछाने पर ,बाहर पार्टी की थुक्का फजीहत और अंदरूनी मतभेदों की है। कांग्रेस मुखपत्र संदेश ने इस पर सवाल उठा दिए, और यह भी कह दिया कि जनता का भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानून के लिए बेसब्र होना लाजिमी है। मुखपत्र ने सरकार को सामाजिक संगठनों को सिर पर न चढ़ाने की नसीहत भी दे डाली। अब कांग्रेस प्रवक्ता जनार्दन द्विव्दी ने कहा है कि कांग्रेस मुखपत्र को पार्टी की आवाज में बोलना चाहिए,जो लिखा गया वह सम्पादक की अपनी राय थी, और आगे से उन्हें अपनी राय संपादकीय में न लिखने की ताकीद कर दी गई है। यानि, कांग्रेस पार्टी अन्दरूनी तौर पर अगर चार बड़े मंत्रियों के एयरपोर्ट जाने के खिलाफ थी भी , तो भी इसे यंू लिखना नहीं चाहिए था। यह कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही सरकार की नीतियां एक जैसा रखने का आग्रह दिखता है, जबकि हम आज तक इसी बात की शिकायत करते आए हंै कि सारे सांसद, संसद में अपनी पार्टी की घोषित नीति की जुबान में बोलते हंै और इस तरह बेबाक बहस की गुंजाईश खत्म हो जाती है। इसलिए हम पार्टी और सरकार, और सरकार और पार्टी के बीच मतभेद को गलत नहीं समझते, बल्कि देश की राजनीति में आंतरिक प्रजातंत्र के लिए इसे एक अच्छी बात मानते हंै।
वैसे यूपीए में कांग्रेस नेताओं का अपनी ही सरकार की नीतियों, अपनी ही सरकार के जिम्मेदार मंत्रियों के खिलाफ बोलने का यह कोई पहला मौका नहीं है। सरकार बनते ही इसकी शुरुआत शशि थरूर ने कर दी थी जब उन्होंने प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के किफायत संबंधी निर्देशों का सरेआम ट्विटर पर मजाक उड़ाया। फिर दिग्विजय सिंह ने गृहमंत्री पी चिदम्बरम पर, एक बहुत ही संवेदनशील दौर में कड़े और व्यक्तिगत प्रहार किए, जयराम रमेश की शिकायतें तो समय समय पर चालू ही रहती हैं, और अब कांग्रेस संदेश के संपादक, पार्टी के चार वरिष्ठ मंत्रियों समेत, यूपीए सरकार की नीति की टीका कर रहे हंै। सामाजिक संगठनों को लेकर कांग्रेसियों की वेदना भी बेवजह नहीं है। यू पी ए -1 में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सोनिया गांधी ने कुछ समाजिक कार्यकर्ताओं को मनोनीत किया, जो उनके वास्तविक सलाहकार हैं। इनका रसूख इतना है कि यह कई मंत्रियों ,और बाज दफा प्रधानमंत्री और उनके प्रिय मित्र मॉंटेक सिंह आहलुवालिया की मर्जी के भी खिलाफ सरकार की नीतियां प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं।
लेकिन हमारा यह मानना है कि सरकार से बाहर बैठे लोगों का सरकार की नीतियों पर प्रभाव आम जनता के लिए अक्सर बेहतर होता है इसलिए आज अगर कांग्रेस पार्टी का मुखपत्र इसके मंत्रियों की बुराई कर रहा है तो हम इसमें कांग्रेस पार्टी के लिए कोई
हड़बड़ाने वाली बात नहीं देखते, न ही हमारी समझ से उसे इस बारे में कोई सफाई देने की जरूरत है। हमेशा से चापलूसी के लिए बदनाम रही कांग्रेस के लिए हमारी समझ से यह अच्छे लक्षण हंै। अभी कुछ ही दिन हुए है कि कांग्रेस के सवा सौ बरस पूरे होने पर लिखे गए पार्टी के इतिहास में इसकी सबसे तगड़ी नेता के बारे में बहुत कड़ी भाषा में लिखा गया है, आपातकाल की खुली जुबान में आलोचना की गई है। यही नहीं, यूपीए में विदेश राज्य मंत्री रहते हुए शशि थरूर ने एक सम्मेलन में खुलेआम जवाहरलाल नेहरू की विदेशनीति की आलोचना की, और उसके बावजूद वह मंत्री पद पर बने रहे। एक पार्टी के अन्दर सांस लेने की इतनी जगह, कम से कम इतनी आज़ादी, देश की राजनीति की ठीक-ठाक सेहत के लिए बहुत अच्छी है। प्रजातंत्र में निर्वाचित सरकार ,और पार्टी के विचारों और कभी-कभार नीतियों में फर्क होना लाजिमी हो जाता है, जैसे- राम मंदिर भाजपा का चुनावी एजेंडा था, लेकिन एनडीए के एजेंडे की खातिर उसने सरकार में आने के बाद उसे छोड़ दिया। 2008,में अमरनाथ यात्रा श्राईन बोर्ड के ज़मीन के विवाद को लेकर जब वीएचपी ने भारत बंद किया तो सभी भाजपा शासित राज्यों में सरकारों ने इसका समर्थन किया, लेकिन हिन्दुत्व की प्रयोगशाला कहे जाते गुजरात में मोदी सरकार ने रथयात्रा जैसा अहम् स्थानीय त्यौहार पर स्थानीय लोगों की भावनाओं को पार्टी की नीतियों पर तरजीह देना जरूरी समझा, और बंद को समर्थन नहीं दिया। प्रजातंत्र में एक पार्टी को, एक निर्वाचित सरकार को, और निर्वाचित सरकार को अपनी पार्टी को इतनी आजादी देनी ही चाहिए।
हमने ऐसे दो उदाहरण देखे हंै जिनमें पार्टी और सरकार के एक दूसरे पर तानाशाही की हद तक काबू करने के बुरे नतीजे सामने आए हंै। हाल ही में पश्चिम बंगाल में 33 साल के राज के बाद नेस्तनाबूद हो गई वाम मोर्चा सरकार पर पार्टी का इतना काबू था कि वहां प्रशासन ही नहीं बचा, और देश के चुनावी इतिहास में शायद पहली बार कोई राज्य सरकार इतनी बुरी तरह चुनाव हारी। वहीं दूसरी ओर आपातकाल में कांग्रेस पार्टी पर सरकार, यानि इन्दिरा गांधी, संजय गांधी और अम्बिका सोनी समेत उनके साथियों का इतना काबू था कि पार्टी की अपनी हस्ती ही जैसे खत्म हो गई थी। वह भारतीय प्रजातंत्र के इतिहास के सबसे काले दिन थे, इसलिए हमारी समझ से कांग्रेस महासचिव दिगविजय सिंह का योगगुरु से मिलने गए मंत्रियों की आलोचना करने में कुछ भी गलत नहीं है बल्कि बोलने की ऐसी आजादी हर पार्टी में होनी चाहिए। पहले पार्टियां अपने भीतर प्रजातंत्र मजबूत कर लें, देश में यह अपने आप मजबूत हो जाएगा।
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