एचआईवी कलंक कब तक?


8 जून 2011
गुजरात के भावनगर जिले में एचआईवी से ग्रस्त परिवार की तीन बेटियों ने कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली। कीटनाशक पीकर जान देने वाले यह लड़कियां बस 16, 14 और10 साल की थीं जिनमें से कहा जाता है कि 10 साल की उम्र वाली लड़की को तो एचआईवी था भी नहीं। चार साल पहले इन लड़कियों की मां और भाई की एचआईवी से मौत के बाद इन लड़कियों के समाज में अकेलापन और अपमान झेलने का भी शक है। बताया जाता है कि इन लड़कियों को शादी , और दूसरे उत्सवों में अलग बैठने को कहा जाता था और गांव के मंदिर तक में इनके साथ अछूतों जैसा बर्ताव किया जाता था। आज जब अखबारों, और पत्र पत्रिकाओं में एचआईवी पॉजि़टिव खुलकर अपनी स्थिति बयान करते हुए अपने लिए एचआईवी साथी ढूंढते देखे जाते है अपने अपमानित वर्तमान से डरकर भविष्य की चिंता में इन लड़कियों का यंू जान दे देना बहुत अफसोसनाक है हालांकि स्थानीय पुलिस और एड्स नियंत्रण के जिम्मेदार लोग उनके साथ समाजिक भेदभाव की खबर से इंकार कर रहे हंै लेकिन इस कच्ची उमर में लड़कियों का कीटनाशक पीकर जान देना, जीवन  के प्रति उनकी हताशा बताता है, जो एचआईवी पॉजि़टिव लोग अक्सर समाज में महसूस करते देखे गए हैं। पुलिस और एड्स नियंत्रण के काम में लगे लोगों का यह कहना स्वाभाविक है कि उनके साथ कोई सामाजिक भेदभाव नहीं  किया जाता था, क्योंकि ऐसा न किया जाए यह देखना उनका काम था। इसलिए ऐसे हालात मौजूद थे, यह मानने की उम्मीद उनसे की भी नहीं जाती है। एड्स नियंत्रण कर्मियों का यह भी कहना है कि वह 2009 तक उनके सम्पर्क में थे और उसके बाद क्या हुआ वह नहीं जानते और यह भी कि कभी-कभार उनका परिवार एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के कर्मियों पर हमले भी करता था, जमीनी हालात की तरफ इशारा  करता है। मुद्दे की बात यह है कि तीन जि़न्दगियां, जिनमें शायद बहुत सी उम्मीद पैदा की जा सकती थी बचाई नहीं जा सकी।
गुजरात के किसी जिले के गांव में एचआईवी ग्रस्त सीमांत किसान की  बेटियों की आत्महत्या से शायद दुनिया के रोज-बरोज के काम काज में बहुत फर्क न पड़े, लेकिन इस घटना से जैसे  जमीनी हालात नजर आ रहे हंै वह खतरनाक जरूर है। एड्स नियंत्रण कार्यक्रमों के बावजूद समाज एचआईवी के मरीजों का नाउम्मीद  होना, इन कार्यक्रमों की पहुंच और असर बताता है गांवों में जहां शिक्षा और संचार की अपेक्षाकृत कम प्रसार के कारण आज भी अपने स्वार्थ  से प्रेरित राजनीतिज्ञों के लिए, अपने फायदों के लिए, लोगो को जात-पांत, मजहब में बांटे रखना आसान होता है। दिनों दिन यह  बंटवारा  और गहरा बनते जा रहा है। यही नहीं समाज में दो और वर्ग पैदा हो चुके हंै-एचआईवी पॉजिटिव और निगेटिव। संचार तक्नालॉजी ने जहां दुनिया को एक छोटे से दायरे में समेट दिया है वहीं  इंसान-इंसान के बीच की दीवारें ऊंची  होते जा रही हैं। इनमें भी  एड्स की दीवार तो अभेद्य हो जाते  हंै क्योंकि यह मान लिया जाता है कि दीवार के एक तरफ जीने की उम्म्मीद  और दूसरी तरफ मौत की गारंटी है। जीवन जैसी सकारात्मक चीज के साथ किसी को नाउम्मीद करने की हद तक स्वार्थी हो जाने का नकारात्मक जज़्बा देखने को मिल रहा है,  जो किसी भी तरह एक विकसित देश कहलाने की हसरत रखते देश के समाज के लिए सही नहीं हो सकता। भावनगर जिले की इस घटना के बाद पुलिस और एडस नियंत्रण कर्मी चाहे जो भी सफाई दें, सच यही है कि मरने वाली लड़कियों को समाज का भरोसा नहीं था, उनमें अपने जीवन में उगने वाले अगले दिन के लिए कोई उत्साह नहीं था और ऐसी स्थिति सही काऊंसिलिंग के बाद नहीं हो सकती।
लेकिन एड्स पीडि़तों की संख्या और इस महामारी  से निपटने के लिए दुनिया के पास मौजूद संसाधन देखें तो पाएंगे कि इस क्षेत्र में राहत देने वालों के हाथ बहुत सी सीमाओं में बंधे हुए हैं। ऐसी स्थिति में  जो संसाधान  हाथ में है ,उनका ही सही, और पूरी क्षमता के साथ इस्तेमाल होना बहुत जरूरी है। एड्स नियंत्रण से जुड़े हर कार्यक्रम के संचालन पर पूरी नजर रखना बहुत जरूरी है क्योंकि यह रोग समाज को, आपसी रिश्तों को, हमारे बीच मौजूद इंसनियत  के जज़्बे को, गहरे प्रभावित कर रहा है। इन कार्यक्रमों में जनता की भागीदारी बढ़ाना, उसकी जिम्मेदारी तय करना बहुत जरूरी है। एड्स के रोग से जुड़ी तमाम बातों के अलावा  एक आम स्वस्थ इंसान को यह सोचने की जरूरत है, कि इस रोग की रोकथाम में जो पैसा लग रहा है वह करदाता का दिया पैसा है जो उसकी  अपनी जेब से जा रहा है। उसका सही इस्तेमाल हो, इसमें उसकी ही भलाई है, और उसका सही इस्तेमाल  तब होगा जब एड्स के प्रति तमाम सतर्कता बरतने के साथ काऊंसिलिंग के स्तर और उसके तौर-तरीके, गंभीरता पर जनता खुद ध्यान दे। उसे उसके इस अधिकार से वाकिफ करवाना और वह अपने इस अधिकार का इस्तेमाल हर स्तर पर करे, यह तय करना सरकार की जिम्मेदारी है। 
आज जब समाज में बहुत सी कुरीतियां मिटाने के लिए सरकारें तरह-तरह के प्रोत्साहन देती हंै एचआईवी पॉजि़टिव लोगों के प्रति समाज का रवैया बदलने के लिए भी कोई योजान शुरू की जा सकती है। अखबारों और पत्रिकाओं के वैवाहिक विज्ञापनों में हम  कभी-कभार पॉजि़टिव लोगों द्वारा पॉजि़टिव लोगों से शादी करने के लिए दिए गए विज्ञापन भी देखते हैं। हो सकता है इस प्रयोग के अपने खतरे हों, लेकिन ऐसी हालत में शादी करने वाले दोनों व्यक्ति कम से कम यह जानते हैं कि उसका साथी पॉजिटिव है। वह  किसी धोखे में शादी नहीं करते अगर एचआईवी पॉजिटिव लोगों के लिए सही डाक्टरी सलाह के साथ इस तरह के विवाह की कोई व्यवस्था  या कार्यक्रम हो सके तो  इस रोग से ग्रस्त बहुत से लोग किसी को धोखा दे शादी करके समाज में  एड्स नहीं फैलाएंगे। इस तरह के धोखे का शिकार ज्यादातर मामलों में औरतें होती हंै। भावनगर जिले में जो मौतें हुर्इं, उनके बारे में पुलिस और एड्स नियंत्रण कर्मियों के बयान, सब कुछ ठीक होने का भरोसा नहीं दिलाते,  इस बात की चुगली खाते हंै कि एड्स पीडि़तों के साथ सब कुछ जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं है।

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