7 जून 2011
सुनील कुमार
पिछले कुछ वक्त से हिन्दुस्तान एक ऐसे शक में डूब गया है जिसमें लोगों के दिलों में लोकतंत्र के कई दफ्तरों पर से भरोसा उठ चुका दिखता है। कभी सुप्रीम कोर्ट सरकार से कहता है कि वह अदालतें बंद क्यों नहीं कर देती, तो कभी प्रधानमंत्री खुद होकर भाषण देते हैं कि भ्रष्टाचार को लेकर जनता का बर्दाश्त खत्म हो गया है। हर दिन किसी नए राजा या कलमाड़ी का कलमुंहा चेहरा लेकर आता है और लोगों के जख्मों पर नमक छींट जाता है। लेकिन इन सबसे परे एक बात यह, कि हिन्दुस्तान के गैरसरकारी तबके के कुछ लोग सरकार और भ्रष्टाचार के खिलाफ लीडरशिप लेकर आज आसमानी लहरों पर घुड़सवारी करते हुए चांद-तारों पर जाते दिख रहे हैं।
आज की हमारी बात अन्ना हजारे, शांति भूषण और उनके साथियों को लेकर है जिनको केंद्र सरकार ने लोकपाल बिल के लिए बने मसौदा कमेटी में रखा है। इस कमेटी के बनने के पहले के उनके तेवर, अब और तीखे हो गए हैं। कमेटी के पहले ही दिन से वे पारदर्शिता के नाम पर यह बात कहते आए थे कि इस कमेटी की बैठकों का प्रसारण किया जाए, फिर कहा कि इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए, और फिर आखिर में ऑडियो रिकॉर्डिंग की बात कही। ये मांग आज भी जारी है, अगर इस कमेटी की बैठकें जारी रही हैं तो। आज हम एक-दो बातें फिर से लिखने को मजबूर हैं जिनके बिना आज का मुद्दा पूरा नहीं होगा। जिस गांधीवाद के नाम पर अन्ना हजारे की टोली ने लोकपाल का मुद्दा उठाया और सरकार के साथ बैठकों में शामिल हुए, वह गांधीवाद तो पहले ही दिन हवा हो गया। अपने-आपको पूरे देश के सामाजिक तबके का एकाधिकारी मानते हुए इस टोली ने पांचों गैरसरकारी कुर्सियों को जिस तरह से मंजूर कर लिया वह हमारे हिसाब से एक गैरगांधीवादी काम था। कोई महिला नहीं, कोई अल्पसंख्यक नहीं, कोई दलित-आदिवासी नहीं, अपनी टोली के बाहर का कोई समाज नहीं, और एक ही पेशे के एक जोड़ी बाप-बेटे। ये एक सरासर गैरगांधीवादी काम था, लेकिन इसे लेकर बहुत कम लोगों ने लिखा और बाद में मायावती ने ही इस मुद्दे को ठीक से उठाया।
लेकिन एक बार कमेटी बन गई तो उसमें बैठकर गंभीरता से काम करने के बजाय इसके तकरीबन तमाम मेम्बर इस अंदाज में दिन में कई-कई बार सरकार के खिलाफ बयान देते रहे हैं, कि मानो जनता के बीच सुबूत गढ़कर रहे हों कि वे कमेटी में आकर सरकार के हाथों बिक नहीं गए हैं। सरकार से, देश के निर्वाचित सरकार से इतनी नफरत के साथ कोई कमेटी नहीं चल सकती। ऐसा ही था तो इन लोगों को सरकार की बनाई कमेटी में आना ही नहीं था। लेकिन कमेटी की तो तमाम कुर्सियों पर एक साथ काबिज होते हुए भी जिन लोगों को झिझक नहीं हुई, वे लोग अब कमेटी के काम-काज में अड़ंगे के सिवाय कुछ नहीं कह गए। जिस अन्ना हजारे के अनशन के वक्त हमने अभी कुछ हफ्तों पहले ही यह लिखा था कि पूरे देश को इनका साथ देना चाहिए, आज कुछ हफ्तों के भीतर ही हमें लग रहा है कि अन्ना-टोली आज सिर्फ अपने अंहकार को दुलार रही है, सहला रही है, और देश का एक बड़ा नुकसान कर रही है।
जिस कमेटी में देश के दो सबसे नामी-गिरामी वकील हों, उस कमेटी का बर्ताव कानूनी न होकर बाकी हर किस्म का है। रोज सुबह ऐसा लगता है कि कमेटी यह बहाना तलाश रही है कि कैसे इसके बैठकों में न जाए। अब पिछले दो-तीन दिनों से शांति भूषण और अन्ना हजारे सरकार को गालियां देने पर उतर आए हैं, वह भी इस कमेटी को लेकर। इसके पहले अन्ना ने बेंगलूरु में सोनिया गांधी की ओर इशारा करते हुए उन्हें मनमोहन सिंह का रिमोट कंट्रोल बताया, ये किस तरह का गांधीवाद था अन्ना? इस लोकपाल के फेर में सड़कों से सिरों का सैलाब जब लौट जाएगा तब इतिहास दर्ज करेगा कि गांधी की माला जपने वाले लोग किस कदर हिंसक हो सकते हैं। हिंसा महज हथियारों से नहीं होती, किसी को बिना किसी बिना के जब गालियां दी जाती हैं तो वह भी हिंसा होती है। आज लोकपाल कमेटी के लोग वही काम कर रहे हैं।
यह अनुभव देश के लिए इसलिए भी बहुत खतरनाक है क्योंकि इसके बाद कोई सरकार गैरसरकारी लोगों को किसी कमेटी में रखने के पहले सौ बार सोचेगी कि कहीं एक और अन्ना तो खड़ा नहीं कर देगी वह? इस लोकपाल मसौदा कमेटी को देखकर हमें लगता है कि इसके पहले जो कानून सरकार खुद की बनाती आई थी उनमें गैरसरकारी लोगों को रखने की कोई बंदिश तो थी नहीं, और रखा भी नहीं गया। ये शांति भूषण कानून मंत्री थे, उस वक्त कितने की कानून बने होंगे यह विचार हुआ होगा, बीजेपी की सरकारें बाद में भी बनीं एनडीए के बैनर तले, उस वक्त भी कानून बने होंगे, लेकिन हर किसी के लिए समाज के लोगों को लेकर कमेटी बनीं हो, ऐसा तो याद नहीं पड़ता। आज इस कमेटी का अनुभव सरकार को कैसा भी लग रहा हो, हमें तो बहुत खराब लग रहा है। जिस तरह रूस के बारे में एक बात कही जाती थी- सर्वहारा वर्ग की तानाशाही, आज लोकपाल कमेटी को लेकर हमें लग रहा है कि यह स्वघोषित गांधीवादियों की तानाशाही बन गई है। इसे किसने यह इज्जत दी है कि यह सरकार को रोके कि वह देश में मुख्यमंत्रियों से सलाह न ले? राजनीतिक दलों से सलाह न ले?
बाबा रामदेव के साथ हुए लिखे समझौते की बाबा की धोखेबाजी के बात सरकार ने जारी कर दिया तो सरकार को बेईमान और गद्दार कहने वाली अन्ना-टोली यह भूल गई कि वह तो खुद अपनी बैठकों के वीडियो रिकॉर्डिंग और प्रसारण की बात कह रहे थे! अब एकदम की रहस्य की वकालत होने लगी? और गाली-गलौज होने लगी! सरकार की बाबा पर हुई कार्रवाई को लेकर लोकपाल के बहिष्कार की बात होने लगी! एक तरफ तो इस देश में अन्ना-टोली के ही लोग उन नक्सलियों से बात करने की वकालत रात-दिन करते हैं जो रात-दिन बेकसूरों को मारने में लगी हैं, और दूसरी तरफ सरकार अगर अपना काम कर रही है, तो उसे लेकर लोकपाल के बहिष्कार की बात हो रही है? जिस पाकिस्तान से हिन्दुस्तान पर रोज हमले होते हैं, उस पाकिस्तान से बातचीत जारी रखते हैं, लेकिन बाबा की धोखाधड़ी के बाद सरकार अगर कोई कार्रवाई करती है तो उस पर अन्ना-टोली लोकपाल कानून बनाने के सिलसिले को तोडऩे की बात करती है? अन्ना टोली के स्थायी रूप से फुंफकारते दिखते अरविंद केजरीवाल इसे गलत मानते हैं कि सरकार ने मुख्यमंत्रियों की राय ली!
ये पूरा सिलसिला गैरगांधीवादी और गैरलोकतांत्रिक है, फिर चाहे इसे चलाने वाले लोग गांधी का झंडा लेकर ही क्यों न चल रहे हों। देश के हर एक घटना को लेकर एक तबका किसी दूसरे तबके को अछूत मान ले तो फिर चल गया लोकतंत्र। कालिख और कुकर्मों के बोझ से दबी यूपीए सरकार ने जिस अंदाज से इन्हें सिर पर बिठाया उसके लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है। इसलिए आज हमें बहुत तल्खी के साथ लिखना पड़ रहा है कि समाज के अकेले प्रतिनिधि बनकर जिन लोगों ने लोकपाल कमेटी पर काबिज होना ठीक समझा था, वे आज इस देश में लोकतंत्र की गाड़ी को पटरी से उतारने पर तूल गए हैं। ये लोकतंत्र नहीं है अन्ना, ये स्वघोषित-गांधीवादियों का अराजक-तंत्र है। इस देश के लोगों ने जिन्हें हीरो की तरह सिर पर उठाया, आज कुछ हफ्तों के भीतर ही वे लोग लोकतंत्र के पैमाने पर जीरो साबित हो रहे हैं। इस देश के राजनीतिक दलों को ये बात माकूल बैठ सकती है कि यूपीए सरकार की फजीहत हो, इसलिए बीजेपी और अग्निवेश आपसी टकराव भूलकर साथ हैं, इसलिए कम्युनिस्ट पार्टियां भी बाबा की मनमानी और दगाबाजी को भूलकर महज पुलिस कार्रवाई पर मुंह खोल रही हैं। बंगाल में ममता और कांग्रेस ने जो हाल किया है, हिसाब चुकता करने के लिए उसकी चुप्पी ठीक है लेकिन झंडे की शक्ल में बच चुकी जिन ताकतों को अपने सिर पर बिठा लिया, उनकी लोकप्रियता को अपना लिया क्या कम्युनिस्ट उन ताकतों को देखते हुए भी चुप रहेंगे, कुछ नहीं बोलेंगे। आज यह खतरे समझ में नहीं आ रहे हैं लेकिन उनकी चुप्पी इतिहास में दर्ज होगी।
लेकिन हमारा कहना बिल्कुल साफ है कि एक खामियों भरे लोकतंत्र का जवाब एक स्वघोषित-गांधीवादी तानाशाही नहीं हो सकती फिर चाहे वह कितने ही भले दिखते लोगों के हाथों में क्यों न हो। चाहे अन्ना-हजारे कितने ही अच्छे हों, लोकतंत्र का विकल्प अन्नातंत्र या बाबातंत्र नहीं हो सकता। यही बाबा रामदेव, क्यों उम्मीद कर सकता था कि यह जनता से इस कदर धोखा करेंगे कि सरकार के साथ एक लिखित समझौता करने के बाद भी बेमुद्दत अनशन का झूठा नाटक करेंगे? ये दौर मोहभंग का है। टीवी की खबरों पर पल-पल की जो बातें दिखती हैं वे बहुत बड़ा इतिहास नहीं लिखतीं, वे सिर्फ सतह पर तैरती हैं, बह जाती हैं। लेकिन जिस दिन इतिहास लिखा जाएगा उसमें दर्ज होगा कि बाबा से लेकर अन्ना तक ने किस कदर गैरजिम्मेदारी से काम किया। किस कदर हिंसक काम किया, देश के लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को किस कदर कुचला, वो भी महज अपने अहंकार के लिए। आज इन सबने देश की सरकारों के सामने एक ऐसी मिसाल पेश कर दी है कि कल किसी सरकारी कमेटी में किसी अन्ना या बाबा को रखने के पहले सरकारें सौ बार सोचेंगी कि इनको कैसे बर्दाश्त किया जाएगा। गांधी का नाम लेकर किया गया हर काम सही साबित नहीं होता, भ्रष्टाचार को लेकर किया गया हर विरोध गांधीवादी नहीं होता। आज अन्ना-बाबा टोली ने इस देश में कांगे्रस-विरोधियों को मजे का एक सामान तो दे दिया है, लेकिन सामाजिक आंदोलन की विश्वसनीयता गिरा दी है। लोकपाल बिल के लिए ईमानदारी के साथ काम करने के बजाए जब अन्ना-टोली नुक्कड़-नायक बनने के फेर में है, तो इतिहास उन्हें ऐसी शक्ल में दर्ज करेगा। आज खबरें चाहे उन्हें कुछ भी दर्ज करें।
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