5 जून 2011
सुनील कुमार
बाबा रामदेव के अनशन को देर रात दिल्ली पुलिस ने खत्म करवाया और वहां मौजूद भीड़ को हटा दिया। इसे लेकर देर रात से टीवी देख रहे लोगों के बीच एक हलचल मची रही और आज सुबह से शांतिभूषण जैसे बड़े वकील पुलिस की इस कार्रवाई को आपातकाल की याद दिलाने वाला बताने लगे और उन्होंने ऐसा लंबा-चौड़ा बयान दिया कि केन्द्र की इस सरकार को तुरंत हटाकर एक दूसरी काम चलाऊ सरकार बनाने की जरूरत है। आरएसएस और भाजपा की भी कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया बाबा रामदेव के समर्थन में है और उन्हें भी यह घटना आपातकाल जैसी लग रही है। लेकिन बाबा के साथ कल तक मंच पर रहे स्वामी अग्निवेश का कहना काफी कुछ अलग है। वे पुलिस की इस कार्रवाई को ज्यादती तो मान रहे हैं लेकिन उन्होंने बहुत खुलासे से ये सवाल उठाए कि बाबा रामदेव ने केन्द्र सरकार के साथ कोई गोपनीय लिखित समझौता आखिर क्यों किया? और ऐसा करने के बाद उन्होंने उनके साथ अनशन करने वाले लोगों को अंधेरे में क्यों रखा? देश भर के लोगों को यह बताया क्यों नहीं कि यह अनशन खत्म करने का समझौता उन्होंने पहले ही कर लिया है? स्वामी अग्निवेश ने ये सवाल उठाए कि बाबा रामदेव ने पारदर्शिता से काम क्यों नहीं किया?
आज हम दो मुद्दों पर यहां लिखने जा रहे हैं। एक तो यह कि शांतिपूर्ण दिख रहे इस अनशन को पुलिस ने इस तरह आधी रात के बाद क्यों खत्म करवाया? दूसरा यह कि बाबा रामदेव का यह पूरा अनशन कल रात तक क्या साबित हो चुका था और आज देश के सामने उनके अनशन को लेकर क्या मुद्दे रहने वाले थे, और हैं। इन दोनों बातों को अलग-अलग समझने की जरूरत इसलिए है कि पुलिस की लाठियां देखकर जिन लोगों के मन में लाठी के शिकार होने वाले लोगों के लिए हमदर्दी पैदा होती है उन लोगों को यह जानना चाहिए कि इतनी बड़ी भीड़ के खतरे क्या होते हैं। देश में जगह-जगह भीड़ की जगहों पर हादसे होते हैं और अगर इस भीड़ के बीच किसी भी वजह से भगदड़ फैली होती तो क्या होता? अगर शामियाने में आग लग गई होती, अगर बिजली बंद हो गई होती तो क्या होता? और अगर वहां 25-50 हजार की भीड़ थी तो क्या उतने लोगों को दिन की रौशनी में दिल्ली की व्यस्त सड़कों पर वहां से हटाना समझदारी होती या नहीं होती? कुछ सवाल शांतिभूषण जैसे जानकार ने उठाए हैं कि एक शांतिपूर्ण अनशन को खत्म करवाने की पुलिस की कार्रवाई कैसे सही कही जा सकती है। शांतिभूषण आपातकाल में जेल में बंद रह चुके हैं और जनता पार्टी सरकार में वे केन्द्रीय मंत्री रहे हैं। इसलिए आपातकाल की उनकी यादों का ताजा रहना स्वाभाविक है। लेकिन पुलिस की यह कार्रवाई तो केन्द्र सरकार और बाबा रामदेव के बीच के एक गोपनीय, रहस्यमय और लिखित समझौते पर बाबा द्वारा अमल न करने से पैदा हुई नौबत से निपटने के लिए की गई दिखती है। कल शाम ही देश के सामने इस बात का खुलासा हो गया था कि देश को धोखे में रखकर बाबा रामदेव ने किस तरह अपने, उन्हीं की जुबान में एक करोड़ से दस करोड़ तक, लोगों को अनशन में झोंक दिया था। जिस अनशन की जमीन बाबा ने केन्द्र सरकार के साथ पता नहीं किन वजहों से सौदे में बेच सी दी थी, उसी जमीन को देश के लोगों को दिखाकर बाबा ने सपनों की एक अवैध कॉलोनी सी बना ली थी और लोगों को प्लॉट बांट दिए थे। यह धोखा एक छोटा धोखा नहीं था, देश के मीडिया पर एक किस्म से एकाधिकार कर लेने के बाद अगर सामाजिक जीवन का कोई नेता ऐसी बड़ी धोखाधड़ी देश के लोगों के साथ करता है तो उसने यह धोखाधड़ी उस भगवे कपड़े के साथ भी की है जिसका कि इस देश के एक बड़े तबके के बीच बड़ा सम्मान है, अपने नाम के साथ जुड़े बाबा शब्द के साथ भी धोखाधड़ी की है जिस नाम से बाबा आमटे जैसे लोग जाने जाते थे, उन्होंने अपने सन्यासी और योगी जैसे चोले के साथ भी धोखाधड़ी की है जिस पर कि इस देश की आबादी के एक हिस्से की बड़ी आस्था है, उन्होंने प्राचीन भारत से चली आ रही योग की परंपरा का भी अपमान किया है कि कोई योगी ऐसा धोखेबाज हो सकता है, और योग का नाम लेकर हो सकता है, उन्होंने आयुर्वेद के साथ भी धोखाधड़ी की है कि आयुर्वेद को बढ़ावा देने वाला कोई व्यक्ति सरकार के साथ 5-7 सितारा होटलों के भीतर बैठकर किए गए लिखित समझौतों में जनता से ऐसी धोखाधड़ी कर सकता है। इससे भी अधिक उन्होंने इस देश के सामाजिक आंदोलन के साथ धोखाधड़ी की है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने वाले लोग खुद अपने आचार व्यवहार में इस तरह भ्रष्ट हो सकते हैं कि जनता को इतना बड़ा धोखा दे दें।
हम यहां पर बाबा रामदेव की ही कही बातों को याद दिलाकर यह कहना चाहेंगे कि कल अगर सच में ही देश के करोड़ों लोगों ने अनशन किया था तो उसमें बहुत से लोग रोज कमाने-खाने वाले लोग रहे होंगे, उन्होंने कल वैसे वक्त उनको धोखा दिया जब वे तमाम लोग अपनी रोज की आदत के उल्टे, गर्मी में भूखे बैठे थे और अपनी रोजी खो रहे थे। दूसरी ओर बाबा दिल्ली की सबसे आलीशान होटल में केन्द्र सरकार की मेजबानी में एक गोपनीय समझौता कर रहे थे। इससे बड़ा धोखा इस देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने का दावा करने वाले आंदोलन द्वारा और क्या किया जा सकता था? हमारा मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन ने कल अपनी जो विश्वसनीयता खोई है वह किसी भी बाबा की विश्वसनीयता खोने से अधिक बड़ा नुकसान है। जनता की नजर में जब कोई मूर्तिभंजन होता है तो वह उस प्रतिमा के टुकड़े हो जाने से अधिक बड़ा नुकसान होता है। बाबा रामदेव ने कल देश के साथ जो धोखा किया है वह हाल के बरसों में सार्वजनिक जीवन में किया गया सबसे बड़ा धोखा है। हम इसे सबसे बड़ा इसलिए भी लिख रहे हैं कि खुद बाबा इसे एक करोड़ से शुरू होकर सौ करोड़ जनता तक फैल जाने वाला आंदोलन कह रहे थे और हम उनके दावे को चुनौती देने के बजाय इसे एक करोड़ से लेकर सौ करोड़ तक लोगों को धोखे के रूप में मानते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि सरकार को आधी रात के बाद भी पुलिसिया कार्रवाई की क्या जरूरत थी? बाबा तो सरकार से कह चुके थे कि उनका यह अनशन शांतिपूर्ण रहेगा। इस बारे में आज सुबह दिग्विजय सिंह के दिए हुए तर्क समझने की जरूरत है कि दिल्ली में अदालती आदेश से अनशन की जगह तय है, और रामलीला मैदान उसके लिए नहीं है। इस मैदान को बाबा ने योग शिविर के नाम पर लिया था और यह तो कल दिन भर देश ने टीवी पर देखा ही है कि बाबा ने वहां पर योग के अलावा सब कुछ किया। लेकिन यह भी एक छोटा तकनीकी भ्रष्टाचार था, जिसे अनदेखा किया जा सकता है। लेकिन बाबा के साथ इसी मंच पर साध्वी ऋतंभरा जैसे लोग बैठे हुए थे जो कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने वाले लोगों में अगुवा थे। 1992 में जब अयोध्या में इसी किस्म की भीड़ जुट रही थी तो राष्ट्रीय शांति परिषद की बैठक में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने यह भरोसा दिलाया था कि वहां पर कानून पूरी तरह काम करेगा और कोई गड़बड़ी नहीं होने दी जाएगी। लेकिन वहां पर क्या हुआ इसे पूरे देश ने देखा है और उसके बाद देश भर में जो हिंसक घटनाएं हुई हैं, उन्हें भी लोगों ने देखा कि किस तरह उनमें सैकड़ों लोगों की जानें गईं। इसलिए जब लाखों की भीड़ की कोई बात करता है तो सरकार के सामने उस भीड़ से परे भी लोगों की जिंदगी को बचाने और चलाने की जिम्मेदारी रहती है और उस भीड़ में किसी झांसे में पहुंच गए भक्तों को भी चूंकि खतरों का अंदाज नहीं रहता, इसलिए उनको भी बचाने की जिम्मेदारी सरकार पर ही आती है। इसलिए हमें सरकार की इस कार्रवाई के खिलाफ कोई तर्क नहीं दिखता और यह प्रशासन की अपनी सुविधा की बात रहती है कि ऐसी बड़ी भीड़ को रात की सूनी सड़कों पर दूर तक ले जाना आसान होगा या दिल्ली में दिन की भीड़ भरी सड़कों पर। फिर जब कभी ऐसी कार्रवाई होती है तो उससे पैदा होने वाली उत्तेजना को भी ध्यान में रखकर प्रशासन काम करता है। यह सिर्फ इसी मामले में नहीं हुआ है, देश भर में हर प्रदेश और हर शहर में जब कभी अनशन पर बैठे लोगों पर कार्रवाई होती है तो पुलिस ही उन्हें पकड़कर भी ले जाती है और अक्सर ऐसी कार्रवाई रात के अंधेरे में होती है। देश भर के राजनीतिक दलों, मजदूर और कर्मचारी संगठनों के अनशनों पर आए दिन ऐसी कार्रवाई कहीं न कहीं होती है और हमें हैरानी यह है कि शांतिभूषण जैसे समझदार व्यक्ति उस कार्रवाई को आपातकाल जैसी बता रहे हैं और केन्द्र सरकार को हटा देने की बात कह रहे हैं, जिस कार्रवाई के बिना हो सकता है कि अधिक लोगों की जान अधिक खतरे में पड़ी होती। बाबा रामदेव पर भरोसा रखने वाले लोग बिना अपनी सेहत का ख्याल किए हुए इस गर्मी में अगर अनशन पर बैठे रहते और उनमें से किसी की मौत हो जाती तो यह किस तरह का तनाव पैदा नहीं करता?
हम लोकतंत्र के भीतर ऐसी अराजकता के बिल्कुल खिलाफ हैं जिनमें बाबा रामदेव या कोई भी और व्यक्ति देश की जनता के साथ धोखाधड़ी करके कानून को तोडऩे के लिए भी तर्क ढूंढ ले और पूरी सरकार को अपने पैरों पर झुकाने का मजा सा लेते दिखे। कल ही हमने बाबा रामदेव पर लिखे संपादकीय में इसी जगह पर उन्हें आत्मकेन्द्रित, आत्ममुग्ध, महत्वोन्मादी और कमसमझ व्यक्ति लिखा था। तब तक केन्द्र सरकार के साथ उनका लिखित समझौता हमारी जानकारी में नहीं आया था। आज हम इसमें दो विशेषण और जोडऩा चाहेंगे, बाबा रामदेव पारदर्शिता से दूर, गैरजिम्मेदार और पूरे देश को धोखा देने वाले साबित हुए हैं। हो सकता है कि भ्रष्टाचार के उनके मुद्दे को लेकर जनता का एक तबका अब भी उन्हें भला माने और इस मुद्दे की वजह से उनका सम्मान करे। लेकिन हमारा मानना है कि एक तानाशाह के अंदाज में वे जिस कमसमझ के साथ यह अभियान चला रहे थे उसका लोकतंत्र से कुछ भी लेना-देना नहीं था और किसी भी धर्म या योग-आध्यात्म के बैनर तले एक सही दिखते मुद्दे के लिए भी चल रही तानाशाही को खारिज ही किया जाना चाहिए। भारत के लोकतंत्र में अपनी खामियों को सुधारने के लिए पर्याप्त गुंजाइश है और यहां की संवैधानिक संस्थाएं इस बारे में बहुत काम कर भी रही हैं, केन्द्र सरकार ने बाबा रामदेव को जो अभूतपूर्व और ऐतिहासिक महत्व दिया है वह भी एक किस्म से अलोकतांत्रिक रहा है। हम केन्द्र सरकार को भी इस बात के लिए दोषी मानते हैं कि वह अन्ना हजारे से लेकर बाबा रामदेव तक कुछ लोगों को संविधान की व्यवस्था से परे जाकर महत्व दे रही है और जनता के सामने एक ऐसा माहौल पेश कर रही है कि इन गिने-चुने लोगों को वह देश की जनता का प्रतिनिधि मानती है। लोकतंत्र में प्रतिनिधि बनने के लिए एक बहुत साफ-साफ रास्ता है चुनाव का। उससे परे किसी सरकार द्वारा किसी एक टोली को पूरे का पूरा, और अकेले उसी को पूरे समाज का प्रतिनिधि मान लेना गलत मानते हैं।
हम पुलिस की कार्रवाई की तस्वीरों की छाया में बाबा की धोखाधड़ी को दब जाने देना नहीं चाहते। पुलिस ने तो इतनी भीड़ को हटाते हुए कोई बड़ा नुकसान नहीं होने दिया जिससे कि उसकी नीयत साफ है लेकिन बाबा ने देश के साथ जो किया है, अगर किसी में समझ है तो उसे बाबा से इसका जवाब मांगना चाहिए। भीड़ में और कीर्तन में एक साथ हिलते हुए सिर तर्क और न्याय के बहुत सवाल नहीं करते लेकिन यह मौका ऐसे सवालों का है। बाबा रामदेव का आचरण उनके उठाए हुए मुद्दों से मेल नहीं खाता और न ही पुलिस कार्रवाई को बाबा रामदेव के आचरण को माफ कर देने वाला मान लेना चाहिए। आज देश के सामने सबसे बड़ा मुद्दा वह धोखा है जो दो दिन से बाबा रामदेव मासूम लोगों को दे रहे थे।
हम एक बात को यहां पर और जोर देकर लिखना चाहते हैं कि जो लोग धोखेबाजी के इस अनशन के समर्थन में जालियांवाला बाग की मिसालें दे रहे हैं वे इस देश के शहीदों का बहुत बड़ा अपमान भी कर रहे हैं। एक अंग्रेज अफसर ने वहां बैसाखी के दिन गोलियां चलवाई थीं जिनमें 379 लोग मारे गए थे और 1100 लोग घायल हुए थे। अंग्रेज सरकार के इन आंकड़ों के खिलाफ कांग्रेस ने इन मौतों को करीब एक हजार बताया था। इतिहास के किसी भी पन्ने को उठाकर इस तरह किसी भी घटना पर लागू कर देने वाले किसी बाबा के कीर्तन में हिलने वाले सिर तो हो सकते हैं, दिमाग नहीं।
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