बाबा के दीवानों से कुछ बातें...


4 जून 2011
बाबा रामदेव को लेकर लिखने का आज जी तो नहीं कर रहा है लेकिन खबरों में वे इस कदर छाए हुए हैं कि लोगों को यह उम्मीद होगी कि उनके बारे में कुछ और अधिक चर्चा हो। और हमारी चर्चा जनसैलाब की भावनाओं से कुछ हटकर है इसलिए उसे यहां लिखने में कोई हर्ज नहीं है और यह बात शायद पढऩे के लायक बन जाए। आज सुबह-सुबह बाबा के मंच पर साध्वी ऋतंभरा का लंबा-चौड़ा भाषण हुआ और बाबा ने साध्वी को देश की पचास-साठ करोड़ लड़कियों-महिलाओं के लिए आदर्श और पे्ररणास्रोत बताया। बाबा और साध्वी में सिर्फ एक फर्क है कि 1992 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई तो उस वक्त बाबा का कहीं नामो-निशान नहीं था और साध्वी खुशी से कूद रही थीं। लेकिन अब जब बाबा ने साध्वी की स्तुति में उन्हें पूरे देश की न सिर्फ माताओं और बहनों का पे्रेरणास्रोत बताया बल्कि भाईयों पर भी यह बात लागू होने की बात कही तो यह जाहिर है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के बुनियादी मकसद के तहत भी साम्प्रदायिकता और हिंसा की तरफ बाबा की सोच क्या है?
इंटरनेट पर ट्विटर और फेसबुक जैसी वेबसाईटों पर आज सुबह से बहस कुछ बढ़ गई है और बहुत से नामी-गिरामी और बहुत से साधारण लोग इस शास्त्रार्थ में जुट गए हैं कि साम्प्रदायिक लोगों का इस आंदोलन में जोड़ा जाना ठीक है या नहीं है। और अभी दोपहर एक बजे जब हम यह बात लिख रहे हैं तब यह खबर आ रही है कि कल तक बाबा और अन्ना के साथ-साथ जो स्वामी अग्निवेश जुड़े हुए थे वे आज बाबा से कुछ कतराते दिख रहे हैं और शायद अन्ना भी साध्वी वाले मंच पर आने से कतरा सकते हैं। दरअसल दुनिया के इतिहास में बहुत से ऐसे तानाशाह हुए हैं जिन्होंने अपने आंदोलन, अभियान या लड़ाई की शुरुआत बहुत ही महान दिखने वाले मकसद को लेकर शुरू की, जिनकी बातें और जिनके नारे बहुत ही महान रहे, जिन्होंने अपने देश के भीतर के लोगों को एक करने के लिए एक घोर और आक्रामक राष्ट्रवाद का नारा उछाला। ऐसे इतिहास को देखने के बाद आज जब बाबा रामदेव के इस आंदोलन को समझने की कोशिश की जाए तो यह साफ होता है कि साम्प्रदायिकता से किसी भी किस्म के परहेज के बिना का यह आंदोलन उन मध्यमवर्गीय औसत राजनीतिक समझ के लोगों को बहुत जानदार और शानदार लग सकता है जिन्हें मोदी का गुजरात बहुत अच्छा लगता है। लेकिन बाबरी मस्जिद को गिराकर जिन लोगों ने इस देश को एक अभूतपूर्व हिंसा में झोंक दिया था, उन लोगों को साथ रखकर अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई आंदोलन चलता है तो उसकी विश्वसनीयता इस देश के एक बहुत बड़े तबके में शून्य होगी। और यह बहुत बड़ा तबका सिर्फ उन अल्पसंख्यक मुस्लिमों का नहीं है जिन पर अयोध्या में साध्वियों ने कुदाली चलाई थी बल्कि इस देश के उन तमाम अमनपसंद लोगों का तबका भी है, धर्मनिरपेक्ष लोगों का तबका भी है जो कि अयोध्या में कानून हाथ में लेने के खिलाफ थे, और आज भी हैं। जिन लोगों को इतिहास और असल राजनीति की समझ कम है, वे लोग बाबा के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को एक सीधा-सादा आंदोलन मानने की चूक कर सकते हैं, लेकिन ऐसी नासमझी आज भीड़ बढ़ाने के अलावा और किसी काम नहीं आएगी। और एक भीड़ सब कुछ साबित नहीं करती, लोकतंत्र में जब मतपेटियों के भीतर भीड़ जुटती है तो वह मायने रखती है। आज भ्रष्टाचार से थकी हुई जनता के मन में सरकार के लिए जो नफरत है वह बाबा को समर्थन की शक्ल में सामने आ रही है, अन्ना को समर्थन की शक्ल में काम आ रही है। यह भी है कि साम्प्रदायिकता से परहेज न रखने वाले लोग, धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ अधिक मुखर लोग, दिल और जुबान पर नफरत करने वाले लोग अधिक बोलते हैं और उनकी मौजूदगी असल से अधिक दिखती है। लेकिन अगर ऐसा हुआ रहता तो जनता के वोटों से ही राममंदिर बन गया होता। जब अटल सरकार का इंडिया शाइन कर रहा था तब भी जनता ने, और यह तो आंकड़े ही हैं कि मंदिर वाले धर्म के लोगों की बहुतायत वोटरों में है, मंदिरमार्गियों के खिलाफ वोट दिया।
भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता की नफरत अन्ना और बाबा की शक्ल में एक राह मिली है और यह नफरत किसी ज्वालामुखी से निकले लावे की तरह बह चली है। लेकिन न तो बाबा के पास किसी तरह की योजना है और न ही इस तात्कालिक जनसमर्थन से परे उनकी अलग से कोई ठोंकी-परखी गई विश्वसनीयता है। जब उनका आंदोलन साम्प्रदायिक लोगों की स्तुति पर चल रहा है तो चाहे उसे आज जनता के एक तबके का साथ मिल रहा हो, उसकी अपनी साख बहुत कम है। किसी विचलित या भावना से भरी हुई या उत्तेजित भीड़ में सिर बहुत होते हैं लेकिन उतने दिमाग भी हों ऐसा जरूरी नहीं होता। आज की यूपीए सरकार ने अपने अनगिनत कुकर्मों के चलते बाबा के सामने जिस तरह दंडवत होकर लोकतंत्र की साख को चौपट किया है, उससे भी आम जनता के बीच बाबा को एक नई शोहरत मिली है। लोगों को यह लगा कि जिसे इस देश की सरकार इतनी गंभीरता से ले रही है उसे जनता क्यों गंभीरता से न ले। लेकिन इस तात्कालिक सोच से परे अगर बाबा के नारों को देखें तो वे तमाम देश की अर्थव्यवस्था को लेकर हैं और उनमें अर्थव्यवस्था की समझ बहुत कम है और लोगों को राहत देने या उकसाने वाली बातें अधिक हैं।
हम ऐसा कोई आंदोलन लोकतंत्र के भीतर नहीं देखते जिसमें कि आंदोलन का मुखिया सारे वक्त सिर्फ अपने-आपको लेकर बातें करता हो और वह आंदोलन इतिहास गढ़ सके। बाबा रामदेव की बातों को अगर कुछ घंटे सुना जाए तो उनके बारे में जो विशेषण हमें सूझते हैं, वे एक आत्मकेंद्रित, आत्ममुग्ध, महत्वोन्मादी और कम समझ इंसान के दिखते हैं। उनकी यह बात सुनकर समझदार को सिर्फ हंसी आ सकती है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के बीच अचानक ही देश में प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव की मांग को जोड़ रहे हैं और अपनी तमाम मांगों के पूरे हो जाने तक वे अनशन जारी रखने की घोषणा कर रहे हैं। क्या भारतीय लोकतंत्र में आम्बेडकर से लेकर नेहरू और पटेल तक, देश के बड़े-बड़े संविधान विशेषज्ञों तक सबकी सारी सोच को आज रामलीला मैदान के मंच पर झूमते हुए बाबा के पैरों तले कुचल देना लोकतंत्र है? बाबा की चुनाव प्रणाली को लेकर, शासन-व्यवस्था को लेकर कितनी समझ है कि वे एक नारे के रूप में प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव की बात कहें और इसके पूरे न होने पर देश की सरकार को आमरण-अनशन की धमकी दें? यह पूरा सिलसिला पूरी तरह अलोकतांत्रिक है और भ्रष्टाचार से घायल जनता को इसमें एक मरहम दिख रहा है लेकिन यह मरहम किसी तरह का स्थाई इलाज नहीं है। सिर्फ एक सरकार जो कि कटघरे में खड़ी है और जिसके जेल जाने की गारंटी है, वही ऐसे बाबा को इतनी गंभीरता से लेकर दंडवत प्रणाम कर सकती है। अगर ऐसा नहीं है तो कांगे्रस पार्टी इतनी चतुर या धूर्त भी हो सकती है कि वह अन्ना के ए और बाबा के बी के बीच एक चौड़ी खाई खड़ी कर रही हो।

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