10 जून
भारत के मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन का लंदन में देहांत हो गया। अपने एक महान कलाकार को खोने के साथ ही भारत के लिए अफसोस की एक बात यह भी है कि हुसैन को कट्टरपंथी विचारधारा के लोगों के फिजूल विरोध के कारण आखिरी वक्त में अपने देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई। उन्होंने अपने आखिरी दिन कतर में बिताए और मौत उन्हें लंदन में आई। भारत जैसे महान संस्कृतिक विरासत का दम भरने वाले देश के लिए यह एक शर्म की बात है कि उसका एक रत्न जैसा कलाकार अपने जीवन के आखिरी दिनों में देश छोड़कर जाने पर मजबूर किया गया और विदेशी धरती पर ही उसे अपनी आखिरी सांसें लेनी पड़ी। संविधान में वैचारिक और अभिव्यक्ति की आजादी मिलने के बावजूद कुछ साम्प्रदायिक तालिबानियों ने उन्हें इससे वंचित कर दिया। आज इस महान कलाकार की मौत पर देश के लिए यह सोचने का मौका है कि हम अपने लिए कैसा समाज चाहते हंै। शुद्धता, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति के नारे को, संविधान में हर नागरिक को मिले अधिकारों में कितना दखल देने दिया जा सकता है। अगर आज भी हम इस सवाल से नजर चुराएंगे तो अपने सामाज में पहले ही पैर पसार रहे दिमागी संकरेपन को और छूट देंगे।
यह अजीब बात है कि भारतीय संस्कृति में, और खासकार हिन्दू संस्कृति में नग्नता को लेकर जितनी उदारता पहले रही, आज उसे उतना ही बड़ा मुद्दा बनाया जा रहा है। हिन्दू संस्कृति के ग्रंथों में अगर देवी-देवताओं का ब्यौरा पढ़ें या खजुराहो जैसे बहुत से पुराने शिल्पों में उनकी मूर्तियां देखें, तो साफ पता चलता है कि नग्नता इस संस्कृति में मुद्दा कभी रही ही नहीं, बल्कि यह एक परम्परा के रूप में मौजूद रही है। ऐसी अनगिनत प्रतिमाएं सार्वजनिक स्थानों पर बनाई गई हंै जिन पर इस तरह के मुद्दे उठाए जाने के पहले कोई प्रतिक्रिया भी नहीं करता था, जिसकी तरफ कोई ध्यान भी नहीं देता था। जैसे हुसैन के भीतर का कलाकार स्त्री को उसके शुद्ध रूप में पेंट करता था, वैसे ही इन संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों की ज़ुबान में नग्न कही जा सकने वाली सैकड़ों मूर्तियों में बरसों हिन्दुओ ने नग्नता नहीं भक्ति और श्रद्धा ही देखी थी। इसे संकरे दिमाग की और साम्प्रदायिक सोच वाले लोगों ने जबरदस्ती संस्कृति और राष्ट्रवाद की दुहाई देकर मुद्दा बनाया, और भारतीय संस्कृति का इस कदर तालिबानीकरण कर दिया कि कलात्मक अभिव्यक्ति पर भी इसकी चाबुक बरसने लगी। साम्प्रदायिक तनाव फैलाने के खब्ती लोगों ने जिस तरह से हुसैन की तस्वीरों में नजर आती उनके विचारों की मौलिकता, उनके कलात्मक नजरिये, उसकी बारीकियों, और एक राजनीतिक टिप्पणीकार के रूप में उनकी अभिव्यक्ति के लिए भी कुछ जगह छोडऩे की बजाए, उन पर हमेशा भारतीय संस्कृति के अपमान का आरोप ही लगाए रखे। इन तत्वों ने हुसैन के चित्रों के अपनी ही सोच से मतलब भी निकाले । एक ऐसी तस्वीर जिसे कभी खुद हुसैन नेे भारतमाता नाम नहीं दिया, उसके बारे में इन सांस्कृतिक ृतालिबानियों ने खुद होकर यह तय कर दिया कि वह पेंटिंग भारतमाता की है, यही नहीं, यह भी देख लिया गया कि हुसैन उसमें देश के बंटवारे की बात कर रहे थे। देश भर में जगह-जगह उन पर मुकदमे ठोंके गए, उन्हें इतना परेशान किया गया कि वह देश छोडऩे पर मजबूर हो गए। एक उम्दा कलाकार, जिसे भारत सरकार ने पद्मविभूषण जैसे सम्मान से नवाजा, उसके भारत में सुरक्षित रहने की व्यवस्था करने में भारत सरकार नाकाम रही। हम किस 63 साल पुरने प्रजातंत्र की बात करते हंै ?क्या यह 63 साल की उम्र में नजर आने वाली परिपच्ता है?
जिस मानसिकता ने हुसैन पर हिन्दू देवी-देवताओं की नग्न तस्वीरें बनाने के झूठे इल्ज़ाम लगाए, वह मानसिकता व्यापक, उदार और सहनशील हिन्दू संस्कृति का हिस्सा कभी रही ही नहीं। हुसैन को हमेशा मुस्लिम धर्म के किरदारों के ऐसे चित्र बनाने की चुनौतियां दी जातीं, लेकिन सच तो यह है कि इस तरह के प्रतीक और इतनी विविधता वाले पौराणिक चरित्र मुस्लिम या किसी अन्य धर्म का हिस्सा नहीं रहे। एक कलाकार को इस विविधता ने अपनी तरह से आकर्षित किया और उसने इसे अपनी तरह से चित्रित किया। हुसैन की मौलिकता, उनकी कला और उम्र के 9 वे दशक तक में नए तरीके से सोचने की उनकी ललक को सराहने की जगह, इस देश ने उन्हें दुत्कारा ,जो कि बेहद अफसोसनाक है। इसी का नतीजा है कि आज हुसैन की मौत पर जब हमें ऐसे कलाकार के भारतीय होने पर गर्व होना चाहिए था, हम इस बात पर शर्मसार हैं कि उसे अपने आखिरी वक्त में अपने वतन में दफ्न के लिए दो गज़ जमीन भी नसीब नही हो सकी। हुसैन वापस लौटने की इच्छा लिए हुए ही इस दुनिया से विदा हो गए। इस महान कलाकार को जिसे यूरोप और पश्चिम के तमाम देश अपने यहां इज्जत से रखने में गर्व महसूस करते थे उसे मरने के लिए भी अपने देश में जगह नसीब नहीं हुई। क्या संविधान में दी गई बराबरी के यही मायने है? अगर हिन्दू संस्कृति के कथित रक्षकों को हिन्दू भावनाओं के लिए हमलावर अन्दाज में खड़े होने का हक था, तो क्या एक कलाकार को अपनी मौलिकता और रचनात्मकता के साथ इस देश में जीने का हक नहीं था? उस देश में, जिसे वह विभाजन के समय छोड़ कर जा सकते थे लेकिन जिसे उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया। हुसैन की मौत पर आम हिन्दुओं के लिए भी यह सोचने का मौका है कि क्या वह अपने धर्म पर इतनी नफरत, इतनी संकीर्णता के धब्बे लगने देना चाहते हैं?
धर्म का नाम ले कर एक नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों को जहां इस हद तक छीना जाएगा, वहां लोकतंत्र का क्या भविष्य होगा, इस पर भी गौर करने की जरूरत है। अमूमन अपने देश की महान हस्तियों की मौत पर एक देश गमगीन होता है लेकिन फख्र के साथ उसके जीवन से खुद को जोड़ता भी है। कितने अफसोस की बात है कि विभाजन के समय भारत को अपना देश चुनने वाले हुसैन की मौत पर, यह देश उनकी उपलब्धियों पर फख्र करने की बजाय शर्मसार है। हुसैन का देश से हकाले जाकर यंू विदेश में मरना, एक देश के रूप में सामाजिक मोर्चे पर ही नहीं सांस्कृतिक और राजनीतिक, हर मोर्चे पर हमारी हार है। इस महान कलाकार की ऐसी मौत ने हमारी परिपच्ता, हमारी व्यवस्था, सब पर सवाल खड़े किए है जिनसे मुंह चुराना इस देश में लोकतंत्र की बुनियाद खोखली करेगा।
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