संघर्ष की एक मिसाल यह भी...


देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक क्रांति की बातें हो रही है अन्ना हजारे के अनशन के बाद बाबा रामदेव का विवादास्पद अनशन देश देख रहा है। देश में जब यह सब हो रहा है तब स्वाश्रयी महिला संगठन की संस्थापक इला भट्ट को हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने समाज में बदलाव लाने के लिए उनके योगदान पर सम्मानित किया। सम्मान इला भट्ट के लिए कोई नई बात नहीं। जिन पद्म सम्मानों को लोग खरीदने की हद तक जाते हंै, वह पद्म सम्मान इला भट्ट की दराज में यंू ही पड़े रहते हंै ,क्योंकि उन्होंने अपने सम्मान  को अर्सा पहले देश की गरीब बेजुबान औरतों के सम्मान से जोड़ लिया और दुनिया में एक बेमिसाल मजदूर आंदोलन की शुरुआत की, जिसने लाखों परिवारों की आने वाली पीढिय़ों के भविष्य बदल दिए।
सेवा आज महिला सशक्तीकरण का दूसरा नाम बन चुका है जब सरकार  के तमाम गरीबी हटाओ कार्यक्रम नाकाम हो चुके, तब सेवा ने औरतों को परिवार में, समाज में फैसला करने की ताकत हसिल करने के लिए प्रेरित किया। ऐसे समय में जब नेतागिरी शब्द औरतों के लिए किसी अपमान के, यह हॅंसी उड़ाने के संदर्भ में ही इस्तेमाल होता था, सेवा ने गरीब खोमचे वालियों ,खेत मजदूरों, कारखाना मजदूरों, दस्तकारों और असंगठित  क्षेत्र में बिना किसी सुरक्षा काम करने वाली तमाम औरतों को नेता बनने की तालीम दी। उन्हें नई से नई तक्नालॉजी से मुखातिब होने के मौके दिए, हाशिये से मुख्य धारा में आने की राह दिखाई। सेवा की नेता आज दुनिया भर में महिलाओं के लिए एक मिसाल हंै। देश भर में और विदेश में भी महिलाओं के साथ अपने अनुभव बांटकर उन्हें आगे बढऩे में मदद कर रही हैं।  कभी  अहमदाबाद  में कपड़ा मिल मजदूर संगठन की वकील इला भट्ट के साथ 7 औरतों ने जो संगठन  70 के दशक की  शुरुआत में बनाया था ,आज कोई 13 लाख औरतें उसकी सदस्य हैं। दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री हों, मजदूर  संगठन या भारत के पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम या आज की अमरीकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन,  सेवा के सदस्यों ने अपनी सूझबूझ और वित्तीय प्रबन्धन की समझ का लोहा सबसे मनवाया है।
जर्रे से उठकर आसमान छूने के किस्से सेवा में आम हंै। आज के जमाने में जब तमाम तरक्की और दुनियाभर की ताकत, तमगों के बावजूद देश में गरीबी बढ़ती जा रही है सेवा की नीतियां काबिलेगौर हैं, जिन्होंने अपने सदस्यों को काली गरीबी से चक्रव्यूह से निकालकर  गरिमा और आत्मसमान से जीने के सब साधन दिए हैं- सेवा बैंक में  बैंकखाता, जरूरत पडऩे पर कजऱ् की सुविधा, जीवन जीने के लायक साक्षरता, उसके और उसके परिवार के लिए उसकी जेब को माफिक आए ऐसी स्वास्थ्य सेवा, उसे जीवन की मुसीबतों से बचाने के लिए बीमा, उसके छोटे-मोटे व्यापार धंधे के लिए बाजार, जमाने के साथ कदम मिलाने के लिए हुनर की तालीमें सब कुछ। इस संगठन की कहानी, और हमारी सरकारों की नाकामियों की कहानियों में इतना ही फर्क है कि सेवा गरीब को आवाज देती है, उसे फैसला करने  का अधिकार देती है उसकी समस्याओं को एक या दो तरफ से नहीं, हर तरफ से खत्म करती है। जैसे बनासकांठा के सूखाग्रस्त इलाकों को जल संवर्धन सिखाकर पानी की समस्या दूर करना, वहां की कसीदाकारी की परम्परा को जीवित कर के महिलाओं की आय का साधन पैदा करके  पलायन में  उल्लेखनीय कमी करने में कामयाबी हासिल करना, ऐसे कितने ही काम हैं जो सरकार शायद कभी नहीं कर पाती, लेकिन सेवा ने मुमकिन किए।
ऐसा इसलिए हुआ कि सेवा के सर्वोच्च नेतृत्व में देश में दूसरी आजादी लाने का सपना अभी जिंदा है, जिसके लिए वह जरूरत पड़े तो जद्दोजहद करने से, और जरूरत पड़े तो समझौते करने से नहीं चूकता। ऐसा इसलिए है कि उसकी सोच के केन्द्र में गरीबों की दुश्वारियां खत्म करने का मकसद हर बात से ऊपर है, ऐसा इसलिए है कि सेवा में देश की आधी आबादी को मजबूत बनाने की महज बात नहीं होती, यह काम होता है सेवा की बड़ी नेताओं, और जिनके लिए वह काम करती है, उन आम औरतों के सपनों में कोई फर्क नहीं है। जातपांत, मजहब सबसे ऊपर उठकर सेवा की सदस्य बस एक ही मकसद के लिए जुटी हुई है- दूसरी आजादी  पाने  के लिए, जो राजनीतिक नेताओं ने जनता से छीन ली। हर साल, हर मुसीबत के बीच वह अपने लिए आगे बढऩे के नए तरीके खोजती है, अपने तरीके से तक्नालॉजी पर हाथ आजमाती है, अपने तरीके से भाषा की सीमाएं लांघती है- लेकिन गरीबी से उबरने का उनका हौसला बढ़ता ही जाता है। ऐसा इसलिए है कि सेवा में जमीन पर मौजूद सदस्य की बात जितनी आसानी  से ऊपर जाती है, ऊपर बैठे नेतृत्व की बात भी उतनी ही आसानी से बिना रुकावट नीचे जमीनी स्तर तक आ जाती है।
गरीब ,आम औरतों  में यह हौसला इला भट्ट  जैसी नेताओं से आता है जो आज भी ऑटो रिक्शा में बैठकर सेवा के दफ्तर आ जाती हंै, तंबाकू के कारखानों के मशीनीकरण के कारण  बेरोजगार हुई जिन औरतों को दूसरा रोजगार जुटाने कपड़े बुनना सिखाया था, उनकी बुनी साडिय़ां, बिना कलफ किए पहनती हंै। उनके साथ बैठकर अपने डिब्बे से खाना खाती हंै, और उम्र के सातवें दशक में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के लिए वह किताब लिखती है, जो इन औरतों की कामयाबी  की कहानी है- वी आर पूअर, बट सो मैनी। इलाभट्ट से यह बात पुराने कपड़े बेचने वाली एक फेरी वाली ने कही, तो उनमें सेवा बैंक खड़ी करने का हौसला आया, लेकिन यही बात भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और अफसरों के लिए एक चेतावनी भी है। गरीब उनके बिना ही नहीं, उनके बावजूद आगे बढ़ सकते हंै। यह इलाभट्ट ने अपने कामों से, अपने जीवन से साबित किया है। आज सरकार के साथ सामाजिक संगठनों के संघर्ष के बहुत से वाकये हम देख रहे हंै जिनमें इन संंगठनों के कार्यकर्ता देश की आम जनता के हित में काम करने के लिए सरकार पर तरह तरह से दबाव डालते हैं और सरकार को एक सामाजिक एजेंडा अपनाने के लिए अपने तरीके से सरकार को मजबूर भी करते हंै, तब इला भट्ट और उनकी साथियों की कामयाबी भी अपनी तरह की एक मिसाल है।

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