30 जून 11
न्यूयॉर्क में अभी कोई एक सेलून में बाल कटाने पहुंचा तो वहां साथ-साथ उसका ब्लडपे्रशर भी लेकर उसे बताया गया कि वह बिल्कुल तंदरुस्त है। पूरे अमरीका में सेलून और ब्यूटीपॉर्लर जैसी जगहों को मेडिकल जांच के लिए इस्तेमाल करने का एक नया सिलसिला शुरू हुआ है। चूंकि बाल काटने वाले लोग अपने ग्राहकों के करीब रहते हैं और काफी देर तक उन पर काम करते हैं इसलिए अमरीका में यह माना गया कि लोगों की सेहत के लिए जागरूकता में वे मददगार हो सकते हैं। वहां यह बात भी सामने आई कि लोग अपने रक्तचाप की जांच जैसे मामूली काम के लिए डॉक्टर के पास जाने में तो लापरवाही बरत सकते हैं लेकिन हर कुछ हफ्तों में जब उन्हें अपने नाई के पास जाना होता है तो वे वहां ऐसी जांच लगे हाथों करवा सकते हैं। दरअसल इलाज के लिए बीमे पर टिकी हुई अमरीकी जिंदगी में बीमा कंपनियां भी यह चाहती हैं कि बीमारी बढऩे के पहले ही उसके ग्राहकों को इसका पता लग जाए और शुरुआत में इलाज सस्ता पड़ता है।
सेहत के लिए जागरूकता से लोगों की खुद की और सरकार की भी बहुत बड़ी बचत हो सकती है। जब किसी तकलीफ की शिनाख्त शुरुआत में ही जल्द हो जाती है तो उसका इलाज आसान रहता है, सस्ता भी रहता है। जैसे-जैसे मर्ज बढ़ते जाता है वैसे-वैसे उसके ठीक होने की गुंजाइश घटती है और इलाज की लागत बढ़ती रहती है। इसलिए अमरीका में इस नई पहल से नसीहत लेकर हिंदुस्तान में भी ऐसी जगहों को पहचाना जा सकता है जहां पर लोगों का ब्लडपे्रशर नापा जा सके। बिना किसी लागत वाली ऐसी जांच अगर कुछ खतरनाक आंकड़े बताती है तो उसके बाद लोग डॉक्टर के पास जा सकते हैं। आज भारतीय समाज में बहुत ही छोटा हिस्सा समय रहते मेडिकल जांच करवाता है। इस सिलसिले को बदलने के लिए कई किस्म की नई तरकीबें सोचना चाहिए। हम पहले भी कुछ किस्तों में अलग-अलग समय पर सेहत को बचाने और बीमारी को समय रहते पहचानने के बारे में इसी जगह लिख चुके हैं। एक तो यह कि शादी के समय कुंडलियां और ग्रह नक्षत्र मिलवाने के बजाय दोनों परिवारों को जोड़े की खून की ऐसी जांच जरूर करवाना चाहिए जिससे एचआईवी, थैलेसीमिया, सिकलसेल एनेमिया जैसी बीमारियों का पता लग जाए और फिर डॉक्टरी सलाह पर रिश्ता तय हो, या तय न हो। दूसरी तरफ हमने यह भी सुझाया था कि लोगों को सेहतमंद बने रहने के लिए सरकार और समाज से लगातार सुझाव मिलने चाहिए। आज जब बगीचे और मैदान या तो घटते जा रहे हैं या फिर पैदल घूमने लायक सड़कें गंदगी से भरी हुई हैं, उनमें गाडिय़ों का धुआं छाए रहता है, गड्ढे, गोबर और धूल के चलते जहां चलना मुश्किल होता है, वहां पर सुबह-शाम लोग सैर कर सकें, योग या दूसरे किस्म की कसरत कर सकें, खेलकूद सकें ऐसा इंतजाम होना चाहिए। शहरी योजनाओं में कागजों पर तो ऐसा हो जाता है लेकिन जब हर इलाके के बीच ऐसी साफ-सुथरी और खुली हवा वाली जगह की बात करें तो ये घटती चल रही हैं। सरकार या समाज को एक बड़े पैमाने पर योग और साधारण कसरत की मुफ्त ट्रेनिंग देने का इंतजाम भी करना चाहिए ताकि लोग इस पर अमल करें और सेहतमंद रहें।
चीन की कुछ तस्वीरें पहले हमने छापी थीं जिनमें सड़क किनारे फुटपाथ पर कसरत के लिए कुछ ऐसी साधारण मशीनें सरकार ने लगा रखी थीं जो मौसम की मार झेल सकती हैं और बस या ट्रेन का इंतजार करते हुए लोग उन मशीनों पर मामूली कसरत कर सकते हैं। कुछ महीने पहले अमरीका में भी सड़क किनारे ऐसे पूरे कसरत-बगीचे की तस्वीर हमने छापी थी जो कि खुली हवा की एक व्यायाम शाला जैसी थी। ऐसी बहुत सस्ती और मजबूत मशीनें आसानी से जगह-जगह लगाई जा सकती हैं जो लोगों का उत्साह बढ़ाए। इस बात की पहचान बहुत आसानी से हो सकती है कि लोगों को कहां-कहां इंतजार में समय खराब करना पड़ता है और इस खाली वक्त का इस्तेमाल लोग किस तरह की कसरत में या किस तरह की जानकारी-जागरूकता पाने में कर सकते हैं। इस देश में लोगों का कतार में लगे रहना एक किस्म से आए दिन का काम है। छोटे-छोटे फास्टफूड रेस्त्रां ग्राहकों की कतार लंबी होने पर एक डिजिटल काउंटर लगाकर लोगों को कतार से छुटकारा दिला देते हैं और लोग अपना नंबर आने पर काउंटर पर पहुंचते हैं। यह काम सरकारी अस्पतालों, गैस सिलेंडर की कतारों या दूसरे सरकारी काउंटरों पर क्यों नहीं हो सकता? जब लोगों को आए दिन लाईन में घंटों खड़ा होना पड़ता है तो सरकार के खिलाफ उनकी नाराजगी भी बढ़ती है। हमारा यह भी मानना है कि देश के विकास के साथ-साथ अब गैरजरूरी तरीके से कतारों में लोगों को खड़े रखने को मानवाधिकार का हनन भी मानना चाहिए और भीड़ की ऐसी तमाम जगहों को लोगों की सेहत और जानकारी की बेहतरी के लिए काम में लाना चाहिए। भारत जैसे लोकतंत्र में जनता के इलाज का जिम्मा आज भी कुछ हद तक तो सरकार का है ही और फिर यह बात अपनी जगह है कि अगर लोगों की सेहत ठीक नहीं रहती तो देश की उत्पादकता पर भी उसका असर पड़ता है।
सरकार और समाज को कुछ ऐसा इंतजाम भी करना चाहिए कि रक्तदान करने वाले लोगों के खून की कुछ किस्म की जांच मुफ्त करके उन्हें रिपोर्ट दे दी जाए। इससे एक तो लोगों का रक्तदान का उत्साह बढ़ेगा और दूसरी तरफ बीमारियों की शिनाख्त जल्दी हो सकेगी। लेकिन संपादकीय की यह जगह ऐसी बहुत सी जानकारियों के लिए कम पड़ती है और हमारी सलाह यह है कि संगठित संस्थाओं के, तबकों के लोग अपने स्तर पर भी और सरकार की ताकत को शामिल करके भी ऐसा इंतजाम करें ताकि लोग जागरूक भी हों और सेहतमंद भी रहें। यह बात मामूली लग सकती है लेकिन यह देश और उसके नागरिकों दोनों की सेहत के लिए बहुत अहमियत रखती है।
न्यूयॉर्क में अभी कोई एक सेलून में बाल कटाने पहुंचा तो वहां साथ-साथ उसका ब्लडपे्रशर भी लेकर उसे बताया गया कि वह बिल्कुल तंदरुस्त है। पूरे अमरीका में सेलून और ब्यूटीपॉर्लर जैसी जगहों को मेडिकल जांच के लिए इस्तेमाल करने का एक नया सिलसिला शुरू हुआ है। चूंकि बाल काटने वाले लोग अपने ग्राहकों के करीब रहते हैं और काफी देर तक उन पर काम करते हैं इसलिए अमरीका में यह माना गया कि लोगों की सेहत के लिए जागरूकता में वे मददगार हो सकते हैं। वहां यह बात भी सामने आई कि लोग अपने रक्तचाप की जांच जैसे मामूली काम के लिए डॉक्टर के पास जाने में तो लापरवाही बरत सकते हैं लेकिन हर कुछ हफ्तों में जब उन्हें अपने नाई के पास जाना होता है तो वे वहां ऐसी जांच लगे हाथों करवा सकते हैं। दरअसल इलाज के लिए बीमे पर टिकी हुई अमरीकी जिंदगी में बीमा कंपनियां भी यह चाहती हैं कि बीमारी बढऩे के पहले ही उसके ग्राहकों को इसका पता लग जाए और शुरुआत में इलाज सस्ता पड़ता है।
सेहत के लिए जागरूकता से लोगों की खुद की और सरकार की भी बहुत बड़ी बचत हो सकती है। जब किसी तकलीफ की शिनाख्त शुरुआत में ही जल्द हो जाती है तो उसका इलाज आसान रहता है, सस्ता भी रहता है। जैसे-जैसे मर्ज बढ़ते जाता है वैसे-वैसे उसके ठीक होने की गुंजाइश घटती है और इलाज की लागत बढ़ती रहती है। इसलिए अमरीका में इस नई पहल से नसीहत लेकर हिंदुस्तान में भी ऐसी जगहों को पहचाना जा सकता है जहां पर लोगों का ब्लडपे्रशर नापा जा सके। बिना किसी लागत वाली ऐसी जांच अगर कुछ खतरनाक आंकड़े बताती है तो उसके बाद लोग डॉक्टर के पास जा सकते हैं। आज भारतीय समाज में बहुत ही छोटा हिस्सा समय रहते मेडिकल जांच करवाता है। इस सिलसिले को बदलने के लिए कई किस्म की नई तरकीबें सोचना चाहिए। हम पहले भी कुछ किस्तों में अलग-अलग समय पर सेहत को बचाने और बीमारी को समय रहते पहचानने के बारे में इसी जगह लिख चुके हैं। एक तो यह कि शादी के समय कुंडलियां और ग्रह नक्षत्र मिलवाने के बजाय दोनों परिवारों को जोड़े की खून की ऐसी जांच जरूर करवाना चाहिए जिससे एचआईवी, थैलेसीमिया, सिकलसेल एनेमिया जैसी बीमारियों का पता लग जाए और फिर डॉक्टरी सलाह पर रिश्ता तय हो, या तय न हो। दूसरी तरफ हमने यह भी सुझाया था कि लोगों को सेहतमंद बने रहने के लिए सरकार और समाज से लगातार सुझाव मिलने चाहिए। आज जब बगीचे और मैदान या तो घटते जा रहे हैं या फिर पैदल घूमने लायक सड़कें गंदगी से भरी हुई हैं, उनमें गाडिय़ों का धुआं छाए रहता है, गड्ढे, गोबर और धूल के चलते जहां चलना मुश्किल होता है, वहां पर सुबह-शाम लोग सैर कर सकें, योग या दूसरे किस्म की कसरत कर सकें, खेलकूद सकें ऐसा इंतजाम होना चाहिए। शहरी योजनाओं में कागजों पर तो ऐसा हो जाता है लेकिन जब हर इलाके के बीच ऐसी साफ-सुथरी और खुली हवा वाली जगह की बात करें तो ये घटती चल रही हैं। सरकार या समाज को एक बड़े पैमाने पर योग और साधारण कसरत की मुफ्त ट्रेनिंग देने का इंतजाम भी करना चाहिए ताकि लोग इस पर अमल करें और सेहतमंद रहें।
चीन की कुछ तस्वीरें पहले हमने छापी थीं जिनमें सड़क किनारे फुटपाथ पर कसरत के लिए कुछ ऐसी साधारण मशीनें सरकार ने लगा रखी थीं जो मौसम की मार झेल सकती हैं और बस या ट्रेन का इंतजार करते हुए लोग उन मशीनों पर मामूली कसरत कर सकते हैं। कुछ महीने पहले अमरीका में भी सड़क किनारे ऐसे पूरे कसरत-बगीचे की तस्वीर हमने छापी थी जो कि खुली हवा की एक व्यायाम शाला जैसी थी। ऐसी बहुत सस्ती और मजबूत मशीनें आसानी से जगह-जगह लगाई जा सकती हैं जो लोगों का उत्साह बढ़ाए। इस बात की पहचान बहुत आसानी से हो सकती है कि लोगों को कहां-कहां इंतजार में समय खराब करना पड़ता है और इस खाली वक्त का इस्तेमाल लोग किस तरह की कसरत में या किस तरह की जानकारी-जागरूकता पाने में कर सकते हैं। इस देश में लोगों का कतार में लगे रहना एक किस्म से आए दिन का काम है। छोटे-छोटे फास्टफूड रेस्त्रां ग्राहकों की कतार लंबी होने पर एक डिजिटल काउंटर लगाकर लोगों को कतार से छुटकारा दिला देते हैं और लोग अपना नंबर आने पर काउंटर पर पहुंचते हैं। यह काम सरकारी अस्पतालों, गैस सिलेंडर की कतारों या दूसरे सरकारी काउंटरों पर क्यों नहीं हो सकता? जब लोगों को आए दिन लाईन में घंटों खड़ा होना पड़ता है तो सरकार के खिलाफ उनकी नाराजगी भी बढ़ती है। हमारा यह भी मानना है कि देश के विकास के साथ-साथ अब गैरजरूरी तरीके से कतारों में लोगों को खड़े रखने को मानवाधिकार का हनन भी मानना चाहिए और भीड़ की ऐसी तमाम जगहों को लोगों की सेहत और जानकारी की बेहतरी के लिए काम में लाना चाहिए। भारत जैसे लोकतंत्र में जनता के इलाज का जिम्मा आज भी कुछ हद तक तो सरकार का है ही और फिर यह बात अपनी जगह है कि अगर लोगों की सेहत ठीक नहीं रहती तो देश की उत्पादकता पर भी उसका असर पड़ता है।
सरकार और समाज को कुछ ऐसा इंतजाम भी करना चाहिए कि रक्तदान करने वाले लोगों के खून की कुछ किस्म की जांच मुफ्त करके उन्हें रिपोर्ट दे दी जाए। इससे एक तो लोगों का रक्तदान का उत्साह बढ़ेगा और दूसरी तरफ बीमारियों की शिनाख्त जल्दी हो सकेगी। लेकिन संपादकीय की यह जगह ऐसी बहुत सी जानकारियों के लिए कम पड़ती है और हमारी सलाह यह है कि संगठित संस्थाओं के, तबकों के लोग अपने स्तर पर भी और सरकार की ताकत को शामिल करके भी ऐसा इंतजाम करें ताकि लोग जागरूक भी हों और सेहतमंद भी रहें। यह बात मामूली लग सकती है लेकिन यह देश और उसके नागरिकों दोनों की सेहत के लिए बहुत अहमियत रखती है।
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