13 जून 2011
इन दिनों सुर्खियों में बने हुए अन्ना हजारे ने यूपीए की मुखिया और कांगे्रस की अध्यक्ष सोनिया गांधी को फिर चि_ी लिखी है और शिकायत की है कि कांगे्रस के कुछ नेता और कुछ मंत्री लोकपाल कमेटी से जुड़े सामाजिक-सदस्यों को बदनाम करने में लगे हैं। इसी किस्म की एक दूसरी चि_ी उन्होंने कुछ हफ्ते पहले लिखी थी और उस वक्त वे अपनी पूरी टोली के साथ लोकपाल मसौदा कमेटी में आ चुके थे। हमारे पाठक अगर पिछले दो-तीन महीनों की अखबारी सुर्खियां ही देख लें तो उन्हें दिख जाएगा कि अपने अनशन पर बैठने के पहले से अन्ना हजारे यूपीए सरकार, कांगे्रस पार्टी और सोनिया गांधी को किस तरह की भाषा में कोसते आए हैं। हमने पहले भी इसी जगह संपादकीय में लिखा है कि बेंगलुरू में अन्ना हजारे ने एक सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक भले आदमी का चरित्र प्रमाणपत्र देते हुए माईक से ही कहा था कि लेकिन उनको पीछे से एक रिमोट कंट्रोल चलाता है। एक गांधीवादी होने का दावा करने वाले अन्ना हजारे के उस बयान को हमने गैरगांधीवादी, अन्यायपूर्ण और हिंसक माना था और उसकी कड़ी आलोचना की थी। आज फिर अन्ना हजारे कुछ कांगे्रसियों के बयानों से घायल होकर उसी रिमोट कंट्रोल तक दौड़ लगा रहे हैं।
एक देश में दो तरह की करेंसी नहीं चल सकती। भारतीय लोकतंत्र में अगर अन्ना-टोली यह समझे कि वही रात-दिन सरकार को गालियां दे सकती है और सरकार को झूठा, बेईमान, दगाबाज कह सकती है और सौ किस्म के आरोप लगा सकती है और इसके मुकाबले चुप रहना कांगे्रस की कोई बेबसी है तो यह खुशफहमी अन्ना-टोली को दूर कर लेनी चाहिए। यह लोकतंत्र सिर्फ अन्ना या बाबा के लिए लोकतंत्र नहीं है और न ही इस लोकतंत्र में अन्ना और बाबा से घायल लोग किसी गुलामतंत्र के नागरिक हैं। अगर एक गांधीवादी होने का दावा करने वाला एक समूह पूरे देश को उथल-पुथल करने की एक नाकामयाब कोशिश के बाद सरकार को कोसने और उसे गालियां देने को ही खादी का कपड़ा बुनना मान ले तो उसे हकीकत की याद दिलाना जरूरी है। यह सिलसिला किसी भी जिंदा समाज में नहीं चल सकता। सोनिया गांधी पर अन्ना हजारे हमला भी करें और उन्हीं के पास कांगे्रसियों के जवाबी हमले की शिकायत लेकर भी दौड़ें यह बात ठीक नहीं है। लगे हाथों यहां पर हम अन्ना हजारे के बारे में कुछ और बातें भी करना चाहते हैं। उन्होंने बाबा रामदेव के बारे में दो दिन पहले यह कहा कि वे किसी भी आंदोलन की अगुवाई करने के लायक अनुभवी नहीं हैं, वे अकेले मनमानी फैसले लेते हैं और अपरिपक्व हैं। उन्होंने बाबा के बारे में यह भी कहा कि उनका ज्ञान योग तक सीमित है और वे बाकी चीजों को नहीं समझते हैं। यह बात हम काफी हद तक अन्ना हजारे पर भी लागू होते देख रहे हैं और यही वजह है कि देश में सूचना के अधिकार के बाद जो दूसरा सबसे ताकतवर कानून, लोकपाल, बनने जा रहा है उसकी पटरी को अन्ना-टोली सब्बल लेकर उखाडऩे के लिए ओवरटाईम करते दिखती है। गांधी का नाम ले लेना, खादी पहन लेना, अपना चाल-चलन ठीक रखना और भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा-डंडा उठाकर चलना किसी सफल आंदोलन या अभियान के लिए काफी खूबियां नहीं हैं। एक आंदोलन की अगुवाई के लिए जो बातें जरूरी हैं वे अन्ना-टोली की इन खूबियों से कहीं अधिक हैं। अन्ना हजारे किसी दिन अचानक मोदी-चालीसा लिखने और पढऩे लगते हैं और किसी दिन वे रिमोट कंट्रोल को गालियां देने लगते हैं। और अगर उनकी बातों को ध्यान से सुना जाए तो वे भी बाबा की तरह आत्मकेंद्रित, आत्ममुग्ध और कम समझ इंसान लगते हैं जो कि ठीक बाबा की ही तरह महत्वोन्मादी भी हैं। वे महाराष्ट्र के भ्रष्ट मंत्रियों को हटाने की अपनी कामयाबी के दावे के एक अहंकार के अंदाज में कहते हैं, और क्या कोई गांधी की जुबान से इस तरह की बात सुन सकता था कि अंगे्रजों को उन्होंने किस तरह भगाया और देश को उन्होंने कैसे अंगे्रजी विकेट गिराकर आजादी दिलाई?
खैर गांधी की स्केल का इस्तेमाल करके हम इस देश में कद-काठी नापने का कोई धंधा नहीं चला सकते। उसमें भूखा मर जाना तय है और फुटपाथ पर वजन और ऊंचाई की मशीन लेकर बैठने वाले लोगों को गांधी के पैमाने पर पूरे देश में कोई एक इंसान भी नहीं मिलेगा, और वह स्केल धूल खाती रहेगी। लेकिन फिर भी आज के भारतीय लोकतंत्र में जो लोग जनता के सामने घटनाओं के हिस्सेदार हैं उन्हीं पर तो चर्चा करनी होगी, हम आज की चर्चा के लिए तीस जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस के पहले के इतिहास को लेकर बैठे नहीं रह सकते इसलिए असली या नकली, खरे या मिलावटी, जैसे भी हों गांधीवादियों से लेकर कांगे्रसियों तक और योगियों से लेकर भोगियों तक, चर्चा तो आज के जिंदा लोगों पर ही होगी।
किसी भी आंदोलन की हिंसा को रोकने के लिए जब पत्थर खाती हुई पुलिस भी पत्थर उठा-उठाकर भीड़ को जवाब देने लगती है तो वे पत्थर पुलिस के लिए मंजूरीशुदा जायज हथियार नहीं होते, लेकिन जिसके सिर पर पत्थर पड़ते हैं और जिनके साथी या कप्तान जख्मी होते हैं तो फिर वे अकेले ही कानून को ढोने के लिए बेबस नहीं हो सकते। और फिर दिग्विजय सिंह या प्रणब मुखर्जी तो कोई खाकी वर्दीधारी तो नहीं हैं, वे खादी वर्दीधारी हैं जिनके मुखिया महात्मा गांधी ने एक समय यह भी कहा था कि हिंसा को बर्दाश्त करना भी हिंसा है। इसलिए अगर अन्ना की एक अठन्नी के एवज में अगर दिग्विजय या कोई और दो चवन्नियां दे रहे हैं तो फिर अन्ना को दौड़कर किसी रिमोट कंट्रोल का पल्लू नहीं खींचना चाहिए। लोकपाल मसौदा कमेटी में पूरी की पूरी अन्ना-टोली बाराती कार में चढऩे के जिस अंदाज में दौड़ी और किसी और सामाजिक कार्यकर्ता, किसी और विचारधारा को इस कार में चढऩे नहीं दिया, उस दिन भी अन्ना ने वैसी ही अपरिपक्वता दिखाई थी जैसी वे आज बाबा में देख रहे हैं। एक कमेटी में आने के बाद वहां की चर्चा में ईमानदारी दिखाने और उस पर मेहनत करने के बजाय जिस अंदाज में अन्ना-टोली रात-दिन एक बागी-बगावती-बकबक करते दिख रही है वह देश से भ्रष्टाचार को हटाने में अड़ंगे की तरह है। किसी मकसद से काम करने वाले बेबुनियाद बकवास करने में ओवरटाईम नहीं करते और बेकसूरों पर बदनीयती से हिंसक हमले नहीं करते। अगर इस देश का प्रधानमंत्री अन्ना को एक रिमोट कंट्रोल से चलते ही दिखता है तो उस सरकार के साथ एक कमेटी में ऐसी एकाधिकार वाली भागीदारी उन्होंने क्यों की? आम जनता की सड़कछाप जुबान में कहें तो अन्ना-टोली तो इस सरकार की बनाई इस कमेटी में घुसने के लिए मरी पड़ रही थी।
बाबा हों या अन्ना, जब कोई व्यक्ति अपने-आपको किसी मकसद से ऊपर मानने लगता है, और अपने तौर-तरीकों को ही अकेला सही तरीका मानने की जिद पर भी अड़ जाता है, और वह वक्त की रफ्तार को भी तय करने लगता है, और जब वह अपनी जान दे देने की धमकी भी देने लगता है तो यह पूरा सिलसिला अलोकतांत्रिक हो जाता है। हमारे पाठकों को याद होगा कि अभी पिछले दिनों हमने बार-बार इस मुद्दे पर लिखा है और हमने यह भी कहा है कि अन्ना या बाबा चाहे कितने ही अच्छे क्यों न हो, अन्नातंत्र या बाबातंत्र कभी भी लोकतंत्र से बेहतर नहीं हो सकता। लोकतंत्र पर से आस्था खत्म करने वाली जितनी वजहें हों, उनसे निपटना तो ठीक है, लेकिन लोकतंत्र पर एक नाजायज तरीके से अनास्था को बढ़ाते चलना हम गलत मानते हैं। फिर अन्ना-टोली को जिस तरह यह बात बुरी लग रही है कि लोकपाल मसौदे पर केंद्र सरकार राज्य सरकारों से सलाहमशविरा क्यों कर रही है, तो यह बात हम पूरी तरह अलोकतांत्रिक मानते हैं और गैरगांधीवादी भी। हम स्वघोषित गांधीवादियों, स्वघोषित ईमानदारों की ऐसी किसी भी टोली को कानून बनाने का ठेका देने के खिलाफ हैं। हम प्रणब मुखर्जी के रखे गए इस तर्क से पूरी तरह सहमत भी हैं कि संसदीय लोकतंत्र को खारिज करके इस तरह से किसी आंदोलन के हवाले देश को नहीं किया जा सकता। आज सरकार की फजीहत करने के लिए अगर एक मौका हाथ आया देखकर कुछ विपक्षी दलों को अन्ना-बाबा को कंधे पर बिठाकर घूमने में मजा आ रहा है तो वे यह भी समझ लें कि उनकी सरकारों वाले राज्य में या कल अगर वे केंद्र सरकार में आते हैं तो वहां सरकार चलाते हुए वे भी जमालघोटानुमा ऐसे गैरजरूरी बागी तेवरों को अपने पेट में नहीं पचा पाएंगे।
दूसरी एक बात हम अलग से लिखने की सोच रहे थे, लेकिन हम आज यहीं पर उसे जोड़ देना चाहते हैं क्योंकि सारा प्रसंग एक ही है। इस देश की सरकार को और प्रदेशों की सरकारों को भी हमारी सलाह है कि आमरण अनशन की नोंक पर उसे किसी बातचीत में नहीं पडऩा चाहिए। आमरण अनशन देश के मौजूदा कानून के मुताबिक एक अपराध है और इससे देश की जनता को पूरी तरह गैरजरूरी अंदाज में उत्तेजित करने का काम अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग संगठन या नेता करते हैं, और हम इसे एक अलग तरह की अन्यायपूर्ण बात मानते हैं। अब सवाल यह है कि आज एक अन्ना या बाबा के समाचार-महत्व को देखते हुए, उनके पीछे खड़े हुए लोगों की भीड़ को देखते हुए अगर उनके आमरण अनशन को खत्म करवाने के लिए सरकार अगर आनन-फानन, सही या गलत कोई फैसले लेती हैं तो फिर क्या इस देश में हर किसी को अपनी मांग पूरी करवाने के लिए यही रास्ता अपनाना चाहिए? और सवाल यह भी है कि किसी बाबा या किसी अन्ना की जिंदगी के मुकाबले उस रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी की जिंदगी कम मायने कैसे रख सकती है जो कि बरसों से पेंशन के लिए भूखे पेट लड़ाई लड़ रहा है? अगर बेइंसाफी के खिलाफ और जायज मांगों को पूरा करवाने के लिए आमरण अनशन, बिगड़ती सेहत और भड़की हुई भावनाओं के आधार पर ही सरकारें पंडालों में बैठकर सरकार फैसले करने लगें तो फिर सरकार के किसी भी ढांचे की जरूरत क्या है? आस्था चैनल के स्टूडियो में उसके मालिक बाबा रामदेव के चरणों में बैठकर सरकार देश चला सकती है। जिस तरह हमने पहले आतंकियों के मामले में यह सिफारिश की थी कि सरकार को यह तय कर लेना चाहिए और घोषित कर देना चाहिए कि वह बंधकों को छुड़ाने के लिए आतंकियों की कोई मांग नहीं मानेगी, उसी तरह आज हम यह सिफारिश कर रहे हैं कि आमरण अनशनकारियों से सरकार को कोई बात नहीं करनी चाहिए फिर चाहे वे अन्ना-बाबा हों या वामपंथी हों या संघी। भारत के लोकतंत्र की लाख खामियों के बावजूद वह एक जवाबदेह तंत्र है, न कि एक ऐसा तानाशाही भरा हुआ बाबातंत्र जिसे कि हर कुछ घंटों में केंद्र सरकार के खिलाफ रामलीला मैदान की पुलिस कार्रवाई को लेकर नए-नए आरोप सूझते हैं।
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