25 जून 11
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने कल छत्तीसगढ़ विधानसभा में विधायकों के बीच कहा कि विधानसभा सत्रों के बीच का वक्त उन्हें अपने क्षेत्र की जनता की आकांक्षाओं को जानने में लगाना चाहिए और बाद में उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। आज उन्होंने रायपुर नगर निगम की नई ईमारत के उद्घाटन के मौके पर शहरी गरीबों की याद दिलाते हुए शहरी संपन्न तबके को उसका जिम्मा समझाया कि उसे कमजोर और वंचित तबके के हितों का ध्यान रखना चाहिए और उसके लिए रहने, इलाज और पढ़ाई की सहूलियतें जुटाने चाहिए। ये दोनों ही बातें उनके सरकारी भाषण की लंबाई-चौड़ाई के बीच भी अलग से नगीने की तरह दिखती हैं। इन दोनों ही जरूरतों को लेकर ऐसा नहीं कि लोगों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है। लेकिन इस जिम्मेदारी को बहुत कम लोग पूरा कर रहे हैं, इसलिए राष्ट्रपति का इस बारे में याद दिलाना हम एक नसीहत जैसा मानते हैं और उम्मीद करते हैं कि सरकार और समाज इस बारे में सोचेंगे।
पाठकों को याद होगा कि कुछ समय पहले जब लोकपाल मसौदा कमेटी को लेकर हमने कई संपादकीय लिखे तो उनमें यह भी लिखा कि सांसदों-विधायकों या राजनीतिक दलों अलग-अलग जगह बैठकें रखकर अपने इलाके की जनता की राय इस बारे में जाननी चाहिए ताकि बाद में संसद या विधानसभा में इस पर चर्चा होने पर वे जनभावनाओं से परिचित रहेंगे। यह बात सिर्फ लोकपाल के मामले में लागू नहीं होती, सभी मामलों में लागू होती है और राष्ट्रपति ने उसी नजरिए से जनता की नब्ज पर हाथ बनाए रखने की बात कही है। हम निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को आज की तमाम नकारात्मक हवा के बाद भी एक तबके के रूप में देश के बहुत से दूसरे तबकों के मुकाबले अधिक जिम्मेदार मानते हैं। इसकी एक वजह यह है कि वे जनता के बीच जीतकर आते हैं और चुनाव की तमाम खामियों के बावजूद वे जनता के प्रति पांच बरस बाद के चुनाव में जवाबदेह तो रहते ही हैं। इसलिए यहां पर हम आज की चर्चा के इस मुद्दे को भी जोड़कर रखना चाहेंगे कि अन्ना-बाबा के मुकाबले निर्वाचित सांसद-विधायक जनता के प्रति अधिक जवाबदेह रहते हैं और वे ही यह दावा कर सकते हैं कि जनता उनके साथ है। आज जो प्रचारतंत्र यह साबित करने पर उतारू रहता है कि किसी एक बाबा, गुरु या गांधीवादी के साथ पूरा देश खड़ा है, उस प्रचारतंत्र के पास न तो खुद परखने की कोई तरकीब होती कि कितने लोग किसके साथ खड़े हैं। बस मीडिया की मेहरबानी से किसी के भी साथ पूरा देश खड़ा दिख जाता है और कभी गिने-चुने लोग किसी के साथ गिनाए जाते हैं। लेकिन यह एक अलग चर्चा का मुद्दा है और हम आज यहां पर राष्ट्रपति की कही बातों पर ही बात आगे बढ़ाना चाहते हैं।
छत्तीसगढ़ की आर्थिक संपन्नता की चर्चा करते हुए राष्ट्रपति ने इस राजधानी की अलग से चर्चा की है और उसी के साथ उन्होंने यहां के संपन्न तबके की जिम्मेदारियां गिनाई हैं। शासन और प्रशासन के दबाव में यहां के उद्योगपति किसी तालाब या नदी की सफाई के काम में तो अनमने तरीके से कुछ किराए की मशीनें लगा देते हैं लेकिन स्थानीय विकास में कोई ठोस योगदान नहीं रहता। और फिर बात सिर्फ उद्योगपतियों की नहीं है, सारे संपन्न तबके की है जिसे कि स्थानीय टैक्स देने से परे भी अपनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए। पूर्वी भारत में टाटा के चाय बगान हैं। इसलिए कोलकाता में टाटा ने अभी सैकड़ों करोड़ रुपए खुद के लगाकर एक कैंसर अस्पताल बनवाया है और उसके पूरे हो जाने के बाद अब टाटा ने बाकी लोगों से भी सहयोग की अपील की है। छत्तीसगढ़ में हम सिर्फ यह देखते आते हैं कि किस तरह संपन्न तबका सरकारी नियमों के तहत अधिक से अधिक रियायत के लिए कोशिश करते रहता है और अपनी जिम्मेदारियों के बारे में चर्चा भी नहीं करना चाहता। राष्ट्रपति की नसीहत ऐसे ही तबके के बारे में अधिक है।
अब हम प्रतिभा पाटील की कही हुई दोनों बातों को जोड़कर देखते हैं तो लगता है कि अगर निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों की भावनाओं को समझते होते तो वे संपन्न तबके से अपने चुनावी चंदे से परे जनहित के काम भी करवाते। और जनहित के कामों से हमारा मतलब किसी बगीचे या किसी सभा भवन से नहीं है। जैसा कि राष्ट्रपति ने कहा है कि हम सबसे कमजोर तबके के इलाज, उसके रहने और उसकी पढ़ाई की बात कर रहे हैं कि इनमें से कौन सी बातों को वह संपन्न तबका पूरा कर सकता है जिसे कि राष्ट्रपति ने सभ्य तबका भी कहा है। भारत की आम बोलचाल की भाषा में संपन्न को सभ्य भी मान लिया जाता है हालांकि राष्ट्रपति ने बहुत विस्तार से संपन्नता और विपन्नता के बीच के फासले को गिनाया है और संपन्न की जिम्मेदारी गिनाई है। क्या इसी बात को लेकर छत्तीसगढ़ के कुछ बहुत संपन्न लोग एक बैठक करके उस तरह की कोई पहल कर सकते हैं जैसी कि अमरीका में बिल गेट्स ने पिछले कुछ बरसों से शुरू की है, जिसके तहत संपन्न लोग अपनी आधी दौलत समाज के लिए दे रहे हैं। हम इन दो दिनों में राष्ट्रपति की कही इन दो बातों को उनके साधारण रहने पर भी बहुत प्रासंगिक मानते हैं और अब गेंद यहां के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और संपन्न लोगों के पाले में है।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने कल छत्तीसगढ़ विधानसभा में विधायकों के बीच कहा कि विधानसभा सत्रों के बीच का वक्त उन्हें अपने क्षेत्र की जनता की आकांक्षाओं को जानने में लगाना चाहिए और बाद में उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। आज उन्होंने रायपुर नगर निगम की नई ईमारत के उद्घाटन के मौके पर शहरी गरीबों की याद दिलाते हुए शहरी संपन्न तबके को उसका जिम्मा समझाया कि उसे कमजोर और वंचित तबके के हितों का ध्यान रखना चाहिए और उसके लिए रहने, इलाज और पढ़ाई की सहूलियतें जुटाने चाहिए। ये दोनों ही बातें उनके सरकारी भाषण की लंबाई-चौड़ाई के बीच भी अलग से नगीने की तरह दिखती हैं। इन दोनों ही जरूरतों को लेकर ऐसा नहीं कि लोगों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है। लेकिन इस जिम्मेदारी को बहुत कम लोग पूरा कर रहे हैं, इसलिए राष्ट्रपति का इस बारे में याद दिलाना हम एक नसीहत जैसा मानते हैं और उम्मीद करते हैं कि सरकार और समाज इस बारे में सोचेंगे।
पाठकों को याद होगा कि कुछ समय पहले जब लोकपाल मसौदा कमेटी को लेकर हमने कई संपादकीय लिखे तो उनमें यह भी लिखा कि सांसदों-विधायकों या राजनीतिक दलों अलग-अलग जगह बैठकें रखकर अपने इलाके की जनता की राय इस बारे में जाननी चाहिए ताकि बाद में संसद या विधानसभा में इस पर चर्चा होने पर वे जनभावनाओं से परिचित रहेंगे। यह बात सिर्फ लोकपाल के मामले में लागू नहीं होती, सभी मामलों में लागू होती है और राष्ट्रपति ने उसी नजरिए से जनता की नब्ज पर हाथ बनाए रखने की बात कही है। हम निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को आज की तमाम नकारात्मक हवा के बाद भी एक तबके के रूप में देश के बहुत से दूसरे तबकों के मुकाबले अधिक जिम्मेदार मानते हैं। इसकी एक वजह यह है कि वे जनता के बीच जीतकर आते हैं और चुनाव की तमाम खामियों के बावजूद वे जनता के प्रति पांच बरस बाद के चुनाव में जवाबदेह तो रहते ही हैं। इसलिए यहां पर हम आज की चर्चा के इस मुद्दे को भी जोड़कर रखना चाहेंगे कि अन्ना-बाबा के मुकाबले निर्वाचित सांसद-विधायक जनता के प्रति अधिक जवाबदेह रहते हैं और वे ही यह दावा कर सकते हैं कि जनता उनके साथ है। आज जो प्रचारतंत्र यह साबित करने पर उतारू रहता है कि किसी एक बाबा, गुरु या गांधीवादी के साथ पूरा देश खड़ा है, उस प्रचारतंत्र के पास न तो खुद परखने की कोई तरकीब होती कि कितने लोग किसके साथ खड़े हैं। बस मीडिया की मेहरबानी से किसी के भी साथ पूरा देश खड़ा दिख जाता है और कभी गिने-चुने लोग किसी के साथ गिनाए जाते हैं। लेकिन यह एक अलग चर्चा का मुद्दा है और हम आज यहां पर राष्ट्रपति की कही बातों पर ही बात आगे बढ़ाना चाहते हैं।
छत्तीसगढ़ की आर्थिक संपन्नता की चर्चा करते हुए राष्ट्रपति ने इस राजधानी की अलग से चर्चा की है और उसी के साथ उन्होंने यहां के संपन्न तबके की जिम्मेदारियां गिनाई हैं। शासन और प्रशासन के दबाव में यहां के उद्योगपति किसी तालाब या नदी की सफाई के काम में तो अनमने तरीके से कुछ किराए की मशीनें लगा देते हैं लेकिन स्थानीय विकास में कोई ठोस योगदान नहीं रहता। और फिर बात सिर्फ उद्योगपतियों की नहीं है, सारे संपन्न तबके की है जिसे कि स्थानीय टैक्स देने से परे भी अपनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए। पूर्वी भारत में टाटा के चाय बगान हैं। इसलिए कोलकाता में टाटा ने अभी सैकड़ों करोड़ रुपए खुद के लगाकर एक कैंसर अस्पताल बनवाया है और उसके पूरे हो जाने के बाद अब टाटा ने बाकी लोगों से भी सहयोग की अपील की है। छत्तीसगढ़ में हम सिर्फ यह देखते आते हैं कि किस तरह संपन्न तबका सरकारी नियमों के तहत अधिक से अधिक रियायत के लिए कोशिश करते रहता है और अपनी जिम्मेदारियों के बारे में चर्चा भी नहीं करना चाहता। राष्ट्रपति की नसीहत ऐसे ही तबके के बारे में अधिक है।
अब हम प्रतिभा पाटील की कही हुई दोनों बातों को जोड़कर देखते हैं तो लगता है कि अगर निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों की भावनाओं को समझते होते तो वे संपन्न तबके से अपने चुनावी चंदे से परे जनहित के काम भी करवाते। और जनहित के कामों से हमारा मतलब किसी बगीचे या किसी सभा भवन से नहीं है। जैसा कि राष्ट्रपति ने कहा है कि हम सबसे कमजोर तबके के इलाज, उसके रहने और उसकी पढ़ाई की बात कर रहे हैं कि इनमें से कौन सी बातों को वह संपन्न तबका पूरा कर सकता है जिसे कि राष्ट्रपति ने सभ्य तबका भी कहा है। भारत की आम बोलचाल की भाषा में संपन्न को सभ्य भी मान लिया जाता है हालांकि राष्ट्रपति ने बहुत विस्तार से संपन्नता और विपन्नता के बीच के फासले को गिनाया है और संपन्न की जिम्मेदारी गिनाई है। क्या इसी बात को लेकर छत्तीसगढ़ के कुछ बहुत संपन्न लोग एक बैठक करके उस तरह की कोई पहल कर सकते हैं जैसी कि अमरीका में बिल गेट्स ने पिछले कुछ बरसों से शुरू की है, जिसके तहत संपन्न लोग अपनी आधी दौलत समाज के लिए दे रहे हैं। हम इन दो दिनों में राष्ट्रपति की कही इन दो बातों को उनके साधारण रहने पर भी बहुत प्रासंगिक मानते हैं और अब गेंद यहां के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और संपन्न लोगों के पाले में है।
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