11 जून 2011
जिनेवा में जारी 100 वें अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में जहां दुनिया भर के देशों में कामगारों के अधिकारों के संबंध में चर्चा और करार किए जाएंगे, भारत सरकार इस बात के लिए दबाव डालेगी कि घरेलू नौकरी के क्षेत्र में कामगारों के लिए जिस सामाजिक सुरक्षा की मांग की जा रही है वह केवल सिफारिशों तक ही सीमित रहे, उसे करार की शक्ल न दी जाए। सरकार का कहना है कि पश्चिम की तरह यहां घरेलू नौकरों को हफ्ते में एक दिन छुटी, साल में एक बार पगार के साथ छुट्टी, काम के नियमित घंटे जैसी बुनियादी शर्तें लागू करना भारत में मुमकिन नहीं। उसकी दलील है कि भारत में ऐसे हालात नहीं हैं कि इन्हें लागू किया जाए। वह कह रही हंै कि 'भारत में पश्चिम के मुकाबले श्रम सस्ता है अगर हम इतने सख्त नियम लागू करेंगे तो बहुत से लोग रोजी-रोटी से वंचित कर दिए जाएंगे।Ó सामंत शाही मनसिकता वाली नौकरशाही की शह पर भारत सरकार का एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह दलील देना शर्मनाक है। हालांकि हम सरकार के इस रवैये से ज्यादा चौंके भी नहीं है, क्योंकि जब इस देश के बड़े अफसर सरकारी नौकरी जैसे संगठित क्षेत्र में काम कर रहे निम्न श्रेणी कर्मियों को बेगार मजदूरों की तरह इस्तेमाल कर सकते हंै, तो असंगठित क्षेत्र में, बहुत छोटी पगारों पर काम कर रहे घरेलू नौकरों की मुश्किलों के लिए उनके दिलों में दर्द जागने की उम्मीद भी बेकार है। तरह तरह के तमगे से नवाजे जा रहे देश का अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह कहना कि कि भले हमारा विकास राकेट की गति से हो रहा है आजादी के 64 साल बाद भी हम अपने देश के लाखों कामगारों को उनके बुनियादी अधिकार देने लायक हालात नहीं बना पाए हंै, एक अफसोसनाक स्थिति है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की इस मांग को इस तरह सीधे सीधे नकारने की बजाए सरकार बहुत आसानी से इसे चरणबद्ध तरीके से लागू कर सकती थी, लेकिन उसने इस मामले में एक कमजोर तबके का साथ देने की बजाए घरेलू नौकरों के मालिकों की फिक्र की। उसने कहा- घरेलू नौकर और ऐसा कोई भी व्यक्ति, जो घर के मालिक से किसी बात पर बदला लेना चाहता हो, वह इसका दुरुपयोग कर सकता है हमें सावधानी से आगे बढऩा होगा।
असंगठित क्षेत्र में एक बेहद कमज़ोर कामगार वर्ग के लिए ऐसी असंवेदनशीलता शर्मनाक है। घरेलू नौकरों को पश्चिम की तर्ज पर सामाजिक सुरक्षा हम भले न दे सकें, लेकिन सरकार इन्हें अपने माहौल के मुताबिक, अपने स्तर पर कोई सामाजिक सुरक्षा देने के शुरुआत तो कर ही सकती है। हमारी सलाह है कि घरेलू कामगारों को सामाजिक सुरक्षा देने के पहले चरण के रूप में उनका वर्गीकरण कर दिया जाए, श्रम क्षेत्र में पहले से ही कामगारों को अलग-अलग आधारों पर बांटने की प्रथा है ही। अब घरेलू नौकरों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए भी उन्हें ऊंची और बेहतरीन आर्थिक परिस्थिति वाले घरों में काम कर रहे घरेलू नौकरों और मध्यम या निम्न मध्यमवर्ग वाले घरों में काम कर रहे घरेलू नौकरों के वर्ग में बांटा जा सकता है। पूरे दिन काम कर रहे, आधे दिन काम कर रहे और घरों में एक या दो काम कर रहे घरेलू नौकरों के वर्ग में बांटकर सरकार करदाताओं पर यह कानून सीधे सीधे लागू कर इसके अमल की शुरुआत कर सकती है। उनके लिए जरूरी कर सकती है कि वह अपने घरेलू नौकरों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करे।
घरेलू नौकरों के हालात देश में किसी से छिपे नहीं हैं, बड़े शहरों और राजधानियों में रह रहे ऊंचे सरकारी और कार्पोरेट अधिकारी अपने गांव से कम उम्र के नौकर ले आते हैं और उनसे कठिन मेहनत करवाते हैं। ऐसे बाल मजदूरों की पढ़ाई-लिखाई और उनकी सेहत, उनके पोषण, उनकी छुट्टी और आराम की कोई दरकार नहीं रखी जाती उम्र-दराज महिलाओं और दूसरे घरेलू नौकरों के हालात भी इतने ही बुरे हैं। इस वर्ग के कामगारों की एक बहुत बड़ी तादाद का सरेआम शोषण होता है। ऊंची पगार और वेतन पाने वालों की खबर जब सरकार को है, तो उन पर यह कानून लागू करने में कौन सी व्यवहारिक दिक्कत की दलील वह देती है, यह समझ से परे है। महानगरों में घरेलू कामगारों की आपूर्ति करने वाली बहुत सी एजेंसियां हैं,जो अपने ग्राहकों से इन कामगारों के काम की शर्तों के बारे में कड़े और लिखित करार करती हैं। इन करारों में इन कामगारों के महिला होने पर उन्हें सेनेटरी नैपकिन देने जैसी सुविधाएं भी शमिल होती हैं, लेकिन यह एजेंसियां यह सब अपने पेशे में दोनों सिरों पर अपना एक स्तर बनए रखने के लिए, मुनाफा कमाने के लिए करती हैं। सेवा जैसे बहुत से मजदूर संगठन रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए बेरोजगार महिलाओं को होम मैनेजर के रूप में प्रशिक्षित कर के उनकी सेवा की शर्तों के साथ सही वेतनमान के लिए उन्हें काम देने वालों के साथ करार करती हैं, लेकिन यह सब निजी स्तर पर की जाती कोशिशें हंै, जो अपने स्तर पर कामयाब भी है। ऐसे हालात में सरकार का अपने देश में घरेलू कामगारों को सामाजिक सुरक्षा देंने के रास्ते तलाशने की बजाए, उन्हें समाजिक सुरक्षा न देने के बहाने तलाशना, और इस कमज़ोर शोषित वर्ग की बजाए, समर्थ होते हुए भी उसका शोषण करने वाले वर्ग की फिक्र करना यह बताता है कि सरकार के 'आम आदमीÓ एजेंडा को नौकरशाह किस तरह मटियामेट कर सकते हंै आखिर 6 वें वेतन आयोग की दर पर ऊंचा वेतन पाने वाले सरकारी कर्मी, या कॉर्पोरेटों में ऊंचे वेतन पाने वालों को, अपने घरेलू कामगारों की मेहनत नाम मात्र की सुविधाओं के एवज में खरीदने की इजाज़त सरकार क्यों देना चाहती है?
घरों में काम करने वाले नौकरों के अधिकारों के बारे में बात करते हुए हम उन सरकारी या अर्ध सरकारी कर्मियों की भी बात करना चाहते हंै, जिन्हें घरेलू कामों में उनके ऊपरी अफसर जोत देते हंै। छत्तीसगढ़ में हमने एक ऐसे अफसर का भी मामला देखा है जिसने अपने विभाग के कोई डेढ़ सौ कर्मी अपने घरेलू कामों में जोत रखे थे। आज जब सरकार घरेलू नौकरों की काम की शर्तों पर जवाब देने की स्थिति में है उसे अधिकारियों के घरों में काम करने वाले चतुर्थ श्रेणी कर्मियों के बारे में भी सख्ती बरतनी चाहिए। एक बार अगर इस बारे में सरकार कड़ाई से नियमों का पालन करे तो हम जानते है कि सरकारी विभागों के काम करने वालो की कमी एक तिहाई तो पूरी हो ही जाएगी। मुद्दे की बात यह है कि घरेलू कामगारों का एक बहुत बड़ा वर्ग है, जिसके पास कमाने के साधन के रूप में बेचने के लिए अपनी मेहनत ही है, दिन के 24 घंटों में वह जितना काम करे उससे ही वह अपना और अपने परिवार का पेट पाल सकता है, जो ऐसा कमजोर तबका है, जिसके पास खुद को शोषण से बचाने के लिये कोई ताकत नहीं है। सरकार को उसके हितों की रक्षा की अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करने की बजाए इस दिशा में तुरंत कदम उठाने चाहिए, क्योंकि घरेलू कामगार ही वह फौज है जिसके दम पर इस देश में अलग-अलग क्षेत्रों में काम रहे लोग , बेफिक्र होकर काम कर सकते हैं। इस वर्ग की उपेक्षा करने की बजाए जल्द से जल्द इसे इसके हक देने के रास्ते निकालने चाहिए।
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