18 जून
गुजरात के स्वर्ण जयंती वर्ष में राज्य ने 6 गिनीज बुक रिकार्ड बनाए हंै। अभी गुजरात सरकार इस बात पर अपनी पीठ थपथपा ही रही थी कि कांग्रेस ने एक सूचना अधिकार याचिका दायर करके यह पता लगाया कि एक साल पहले गांधी नगर में मोदी सरकार द्वारा दफन किए गए टाईम कैप्सूल में सरकार ने क्या सामग्री रखी है। राज्य कांग्रेस का दावा है कि इस कैप्सूल में सिर्फ मोदी का गुणगान करती सामग्री है। 3 फुट बाई ढाई इंच के लौह सिलेंडर में बंद इस सामग्री में आने वाले 200 से 1000 साल तक कायम रहने की उम्मीद है। कांग्रेस का आरोप है कि इसमें गांधी, सरदार पटेल, गुजरात के पहले मुख्य मंत्री जीवराज मेहता, और मोदी के पूर्वगामी केशुभाई पटेल का नाममात्र का जिक्र है, यहां तक कि 2002 के गुजरात दंगों का जिक्र भी नहीं है, कांग्रेस ने कहा है कि 1977 में जनता सरकार ने जिस तरह इंदिरा गांधी द्वारा लाल किले के सामने दफन किए गए टाईम्स कैप्सूल को खोदकर बाहर निकाल लिया था, वैसे ही सत्ता में आने पर वह भी मोदी द्वारा दफन किए हुए टाईम कैप्सूल को खोद निकालेगी। जबकि भाजपा के नेताओं का कहना है कि स्वर्ण जयंती के मौके पर यह कैप्सूल गुजरात के पिछले 50 बरस के इतिहास का ब्यौरा देने के लिए जमींदोज़ किया गया था, और गुजरात के इतिहास में चूंकि मोदी ही सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहे हंै, इसलिये जाहिर है उनके बारे में ही ज्यादा लिखा जाएगा। भाजपा और कांग्रेस के बीच इतिहास लेखन पर यह लड़ाई कोई नई नहीं है। 2004 में सत्ता में आते ही कांग्रेस ने एनडीए काल की पाठ्य पुस्तकों में इतिहास के भगवाकरण के आरोप लगाकर पाठ्यपुस्तकों की सामग्री में भारी फेरबदल करवाया था, जिससे विद्यार्थियों को भारी परेशानी हुई थी। वैसे ही, जैसे कि विद्यार्थियों को तमिलनाडु में आज हो रही है, जब मुख्यमंत्री जयललिता डीएमके नेता करुणानिधि और उनके परिवार वालों का जिक्र किताबों से निकलवाने के लिये कारवाई करवा रही है। सवाल यह है कि सता में बैठे लोगों को अपना इतिहास लिखने की इतनी ललक क्यों हो?
यह भी कोई नई बात नहीं है। पुराने जमाने से चारण भाट राजाओं की स्तुतियां, उनके कामकाज के बारे में पत्थर और ताम्रपत्रों पर लिखा करते थे ताकि आगे आने वाले समय में लोग इन राजाओं को इस तरह याद कर सकंे, इतिहास में उनका जिक्र एक खास तरह से हो। टाईम कैप्सूल जमींदोज करना भी वैसा ही प्रयास है अपने वक्त की उपलब्धियों को इतिहास में अमर बनने की इच्छा में भी कोई बुराई नहीं, अगर इसके पीछे मकसद आज कमाए गए ज्ञान , अनुभवों को मानवता के लिए, आने वाले दिनों के लिए सुरक्षित रखने का हो। जैसे वैज्ञानिक उपलब्धियों, खोजों के बारे में पारदर्शिता संबंधी कानूनों के बारे में, खेती, उद्योग के क्षेत्र में हुई नई खोज के बारे में, जानकारी इस तरह अगर दफन की जाए कि भविष्य की पीढ़ी कभी उससे फायदा उठा सके, तो यह एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन अपना बखान करने, खुद को महिमामंडित करने के लिए टाईम कैप्सूल का इस्तेमाल एक राज्य के मुख्यमंत्री के पद पर या एक देश की प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति के लिए ठीक नहीं। मोदी अगर फेसबुक, ट्विटर या एसएमएस का इस्तेमाल करके जनता तक अपनी बात पहुंचाए तो इसमें कोई बुराई नहीं, ऐसा करते हुए वहां आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल अपना पक्ष रखने के लिए कर रहे हंै उन्हें अपने कल की जनता से उनके काम काज पर सीधा जवाब मिल रहा है- चाहे उनकी तारीफ के रूप में या आलोचना के रूप में। लेकिन 200 से हजार साल बाद इस धरती पर आने वाले लोगों का क्या कुसूर है कि उन्हें एक ऐसी जानकारी दी जाए जिसकी सच्चाई जांचने का उनके पास कोई जरिया न हो? यह देश की भविष्य की पीढ़ी के साथ नाइंसाफी है।
रविशंकर प्रसाद ने मोदी का बचाव करते हुए कहा है कि आखिर गुजरात देश का सबसे तेज विकास करता देश है तो मोदी उसके बारे में भविष्य की पीढिय़ों को अवगत क्यों न करवाए। हमें इस पर दो बातें कहनी हंै- एक तो यह, अगर भाजपा और खुद नरेन्द्र मोदी यह सोचते हंै कि वह देश के अन्य मुख्यमंत्रियों से बेहतर हैं, उनका कामकाज सबसे बढिय़ा है, मुख्यमंत्री के रूप में वह एक मिसाल हंै तो फिर उनकी जिम्मेदारी भी सबसे अधिक हो जाती है। हम समझते हंै कि कोई नेता जितने बड़े कद का हो, जनता के प्रति, देश राज्य के प्रति उसे उतनी ही जिम्मेदारी से बरतना चाहिए। कहा भी जाता है कि फलों से लदा पेड़ झुका हुआ होता है। वैसे ही कामयाब, और लोकप्रिय नेता में भी विनम्रता, सबको साथ लेकर चलने का गुण और मुद्दों को व्यापक नजरिए से देखने का माद्दा होना चाहिए, और उसे गाहे बगाहे इसे प्रदर्शित भी करना चाहिए। अगर मोदी या कोई भी नेता अपने राज्य या अपनी जगह का इतिहास लिखकर छोडऩा चाहता हो तो पहले उसे सभी मतों के विशेषज्ञों से लिखवाकर उसे सार्वजनिक करना चाहिए, जनता की राय उस पर ली जानी चाहिए, इस राय के हिसाब से उसमें जरूरी संशोधन करके फिर दफन करना चाहिए।
यह अच्छी बात है कि सूचना अधिकार याचिका के जरिये मोदी सरकार द्वारा दफन की गई सामग्री का ब्यौरा हासिल किया जा सकता है, कम से कम इतनी पारदर्शिता इस सरकार ने कायम रखी है, लेकिन अगर कांग्रेस का यह आरोप सही है कि इसमें केवल मोदी की तारीफ ही की गई है तो यह हर तरह से ऐतराज के काबिल है। इतिहास लेखन किसी काल के तथ्यों से आगामी पीढ़ी को अवगत करवाने के लिए किया जाना चाहिए। अपने-अपने कुनबे का महिमामंडन, व्यक्ति पूजा या तथ्यों को तोडऩे-मरोडऩे के लिये नहीं। गुजरात के इतिहास से 2002 के दंगों का जिक्र गायब होना अहमियत के लिहाज से ऐसा ही है, जैसे भारत के इतिहास से जलियावाला बाग का जिक्र गायब होना। जिस नेता को या उसकी पार्टी को, उसके बड़े कद का गुमान हो, उसे इतिहास लिखते समय इतना हौसला दिखाना चाहिए कि वह अपने शासन के काले पक्ष को भी आने वाली दुनिया के सामने रखे। जैसा,कांग्रेस के इतिहास लेखन में आज आपातकाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व की आलोचना की जा रही है। वैसा ही खुलापन हर एक दल को दिखाने की जरूरत है।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि नेताओं, सरकारों का काम इतिहास लिखना नहीं है। वह अपना काम सक्षमता से करे यही बहुत है जब देश में गरीबी और भ्रष्टाचार हद से ज्यादा बढ ़ रहा हो। देश चलाने के लिए कमजोर तबको को दी जाने वाली रियायतें एक एक करके सरकार खत्म करती जा रही हो, ऐसे समय में एक जिम्मेदार नेता के पास अपने ऊपर लट्टू होने का वक्त भी कैसे बच सकता है? सुना जा रहा है कि अब मायावती भी अपना टाईम कैप्सूल बनाने जा रही है लोकतंत्र में किसी को टाईम कैप्सूल में कुछ लिखकर दफन करने के उसके अधिकार से कोई वंचित भी कैसे कर सकता है? चाहे तो ए राजा भी इस देश में टेलीकॉम क्षेत्र की तरक्की में अपने योगदान के बारे में टाईम कैप्सूल दफ्न कर सकते है या कलमाड़ी भी राष्ट्र मंडल खेल कामयाबी से करवाने की जानकरी एक टाईम कैप्सूल में रखकर दबा सकते हंै। लेकिन क्या इससे इन अपने पर मोहित नेताओं द्वारा भविष्य की पीढी को भ्रमित करने का खतरनाक सिलसिला शुरू नहीं होगा? आज जयललिता तमिलनाडु की पाठ्य पुस्तकों से करुणानिधि की तारीफे करती सामग्री हटा सकती है लेकिन पांच सालो में जो बच्चे उनके और उनके भ्रष्ट कुनबे की तारीफ पढ़कर निकले उनका क्या? नेताओं को इस आत्म सम्मोहन से उबरकर ऐसे काम करने में मन लगाना चाहिए, जिसके बाद कोई उन्हें भूल न सके। जब वह ऐसा कर पाएंगे तो लोग उन्हें उनके कामों के लिए याद रखेंगे, किताब में उनके बारे में क्या लिखा गया है वह पढऩे कोई नहीं जाएगा।
गुजरात के स्वर्ण जयंती वर्ष में राज्य ने 6 गिनीज बुक रिकार्ड बनाए हंै। अभी गुजरात सरकार इस बात पर अपनी पीठ थपथपा ही रही थी कि कांग्रेस ने एक सूचना अधिकार याचिका दायर करके यह पता लगाया कि एक साल पहले गांधी नगर में मोदी सरकार द्वारा दफन किए गए टाईम कैप्सूल में सरकार ने क्या सामग्री रखी है। राज्य कांग्रेस का दावा है कि इस कैप्सूल में सिर्फ मोदी का गुणगान करती सामग्री है। 3 फुट बाई ढाई इंच के लौह सिलेंडर में बंद इस सामग्री में आने वाले 200 से 1000 साल तक कायम रहने की उम्मीद है। कांग्रेस का आरोप है कि इसमें गांधी, सरदार पटेल, गुजरात के पहले मुख्य मंत्री जीवराज मेहता, और मोदी के पूर्वगामी केशुभाई पटेल का नाममात्र का जिक्र है, यहां तक कि 2002 के गुजरात दंगों का जिक्र भी नहीं है, कांग्रेस ने कहा है कि 1977 में जनता सरकार ने जिस तरह इंदिरा गांधी द्वारा लाल किले के सामने दफन किए गए टाईम्स कैप्सूल को खोदकर बाहर निकाल लिया था, वैसे ही सत्ता में आने पर वह भी मोदी द्वारा दफन किए हुए टाईम कैप्सूल को खोद निकालेगी। जबकि भाजपा के नेताओं का कहना है कि स्वर्ण जयंती के मौके पर यह कैप्सूल गुजरात के पिछले 50 बरस के इतिहास का ब्यौरा देने के लिए जमींदोज़ किया गया था, और गुजरात के इतिहास में चूंकि मोदी ही सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहे हंै, इसलिये जाहिर है उनके बारे में ही ज्यादा लिखा जाएगा। भाजपा और कांग्रेस के बीच इतिहास लेखन पर यह लड़ाई कोई नई नहीं है। 2004 में सत्ता में आते ही कांग्रेस ने एनडीए काल की पाठ्य पुस्तकों में इतिहास के भगवाकरण के आरोप लगाकर पाठ्यपुस्तकों की सामग्री में भारी फेरबदल करवाया था, जिससे विद्यार्थियों को भारी परेशानी हुई थी। वैसे ही, जैसे कि विद्यार्थियों को तमिलनाडु में आज हो रही है, जब मुख्यमंत्री जयललिता डीएमके नेता करुणानिधि और उनके परिवार वालों का जिक्र किताबों से निकलवाने के लिये कारवाई करवा रही है। सवाल यह है कि सता में बैठे लोगों को अपना इतिहास लिखने की इतनी ललक क्यों हो?
यह भी कोई नई बात नहीं है। पुराने जमाने से चारण भाट राजाओं की स्तुतियां, उनके कामकाज के बारे में पत्थर और ताम्रपत्रों पर लिखा करते थे ताकि आगे आने वाले समय में लोग इन राजाओं को इस तरह याद कर सकंे, इतिहास में उनका जिक्र एक खास तरह से हो। टाईम कैप्सूल जमींदोज करना भी वैसा ही प्रयास है अपने वक्त की उपलब्धियों को इतिहास में अमर बनने की इच्छा में भी कोई बुराई नहीं, अगर इसके पीछे मकसद आज कमाए गए ज्ञान , अनुभवों को मानवता के लिए, आने वाले दिनों के लिए सुरक्षित रखने का हो। जैसे वैज्ञानिक उपलब्धियों, खोजों के बारे में पारदर्शिता संबंधी कानूनों के बारे में, खेती, उद्योग के क्षेत्र में हुई नई खोज के बारे में, जानकारी इस तरह अगर दफन की जाए कि भविष्य की पीढ़ी कभी उससे फायदा उठा सके, तो यह एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन अपना बखान करने, खुद को महिमामंडित करने के लिए टाईम कैप्सूल का इस्तेमाल एक राज्य के मुख्यमंत्री के पद पर या एक देश की प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति के लिए ठीक नहीं। मोदी अगर फेसबुक, ट्विटर या एसएमएस का इस्तेमाल करके जनता तक अपनी बात पहुंचाए तो इसमें कोई बुराई नहीं, ऐसा करते हुए वहां आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल अपना पक्ष रखने के लिए कर रहे हंै उन्हें अपने कल की जनता से उनके काम काज पर सीधा जवाब मिल रहा है- चाहे उनकी तारीफ के रूप में या आलोचना के रूप में। लेकिन 200 से हजार साल बाद इस धरती पर आने वाले लोगों का क्या कुसूर है कि उन्हें एक ऐसी जानकारी दी जाए जिसकी सच्चाई जांचने का उनके पास कोई जरिया न हो? यह देश की भविष्य की पीढ़ी के साथ नाइंसाफी है।
रविशंकर प्रसाद ने मोदी का बचाव करते हुए कहा है कि आखिर गुजरात देश का सबसे तेज विकास करता देश है तो मोदी उसके बारे में भविष्य की पीढिय़ों को अवगत क्यों न करवाए। हमें इस पर दो बातें कहनी हंै- एक तो यह, अगर भाजपा और खुद नरेन्द्र मोदी यह सोचते हंै कि वह देश के अन्य मुख्यमंत्रियों से बेहतर हैं, उनका कामकाज सबसे बढिय़ा है, मुख्यमंत्री के रूप में वह एक मिसाल हंै तो फिर उनकी जिम्मेदारी भी सबसे अधिक हो जाती है। हम समझते हंै कि कोई नेता जितने बड़े कद का हो, जनता के प्रति, देश राज्य के प्रति उसे उतनी ही जिम्मेदारी से बरतना चाहिए। कहा भी जाता है कि फलों से लदा पेड़ झुका हुआ होता है। वैसे ही कामयाब, और लोकप्रिय नेता में भी विनम्रता, सबको साथ लेकर चलने का गुण और मुद्दों को व्यापक नजरिए से देखने का माद्दा होना चाहिए, और उसे गाहे बगाहे इसे प्रदर्शित भी करना चाहिए। अगर मोदी या कोई भी नेता अपने राज्य या अपनी जगह का इतिहास लिखकर छोडऩा चाहता हो तो पहले उसे सभी मतों के विशेषज्ञों से लिखवाकर उसे सार्वजनिक करना चाहिए, जनता की राय उस पर ली जानी चाहिए, इस राय के हिसाब से उसमें जरूरी संशोधन करके फिर दफन करना चाहिए।
यह अच्छी बात है कि सूचना अधिकार याचिका के जरिये मोदी सरकार द्वारा दफन की गई सामग्री का ब्यौरा हासिल किया जा सकता है, कम से कम इतनी पारदर्शिता इस सरकार ने कायम रखी है, लेकिन अगर कांग्रेस का यह आरोप सही है कि इसमें केवल मोदी की तारीफ ही की गई है तो यह हर तरह से ऐतराज के काबिल है। इतिहास लेखन किसी काल के तथ्यों से आगामी पीढ़ी को अवगत करवाने के लिए किया जाना चाहिए। अपने-अपने कुनबे का महिमामंडन, व्यक्ति पूजा या तथ्यों को तोडऩे-मरोडऩे के लिये नहीं। गुजरात के इतिहास से 2002 के दंगों का जिक्र गायब होना अहमियत के लिहाज से ऐसा ही है, जैसे भारत के इतिहास से जलियावाला बाग का जिक्र गायब होना। जिस नेता को या उसकी पार्टी को, उसके बड़े कद का गुमान हो, उसे इतिहास लिखते समय इतना हौसला दिखाना चाहिए कि वह अपने शासन के काले पक्ष को भी आने वाली दुनिया के सामने रखे। जैसा,कांग्रेस के इतिहास लेखन में आज आपातकाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व की आलोचना की जा रही है। वैसा ही खुलापन हर एक दल को दिखाने की जरूरत है।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि नेताओं, सरकारों का काम इतिहास लिखना नहीं है। वह अपना काम सक्षमता से करे यही बहुत है जब देश में गरीबी और भ्रष्टाचार हद से ज्यादा बढ ़ रहा हो। देश चलाने के लिए कमजोर तबको को दी जाने वाली रियायतें एक एक करके सरकार खत्म करती जा रही हो, ऐसे समय में एक जिम्मेदार नेता के पास अपने ऊपर लट्टू होने का वक्त भी कैसे बच सकता है? सुना जा रहा है कि अब मायावती भी अपना टाईम कैप्सूल बनाने जा रही है लोकतंत्र में किसी को टाईम कैप्सूल में कुछ लिखकर दफन करने के उसके अधिकार से कोई वंचित भी कैसे कर सकता है? चाहे तो ए राजा भी इस देश में टेलीकॉम क्षेत्र की तरक्की में अपने योगदान के बारे में टाईम कैप्सूल दफ्न कर सकते है या कलमाड़ी भी राष्ट्र मंडल खेल कामयाबी से करवाने की जानकरी एक टाईम कैप्सूल में रखकर दबा सकते हंै। लेकिन क्या इससे इन अपने पर मोहित नेताओं द्वारा भविष्य की पीढी को भ्रमित करने का खतरनाक सिलसिला शुरू नहीं होगा? आज जयललिता तमिलनाडु की पाठ्य पुस्तकों से करुणानिधि की तारीफे करती सामग्री हटा सकती है लेकिन पांच सालो में जो बच्चे उनके और उनके भ्रष्ट कुनबे की तारीफ पढ़कर निकले उनका क्या? नेताओं को इस आत्म सम्मोहन से उबरकर ऐसे काम करने में मन लगाना चाहिए, जिसके बाद कोई उन्हें भूल न सके। जब वह ऐसा कर पाएंगे तो लोग उन्हें उनके कामों के लिए याद रखेंगे, किताब में उनके बारे में क्या लिखा गया है वह पढऩे कोई नहीं जाएगा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें