15 जून 2011छत्तीसगढ़ के बस्तर में भारतीय सेना के ट्रेनिंग कैंप शुरू होने से नक्सल कैंप में यह हलचल शुरू हो गई है कि आगे-पीछे राज्य और केंद्र की सरकार आपसी सहमति से सेना को नक्सल-खात्मे के लिए तैनात कर सकती है। यह पहला मौका नहीं होगा जब इस देश में किसी आतंकी, अलगाववादी या हिंसक आंदोलन से निपटने के लिए सेना का इस्तेमाल हो। इसके पहले कश्मीर, पंजाब और उत्तर-पूर्वी राज्यों में सेना ने ऐसे काम किए हैं और आज भी देश की साधारण जनता के एक बहुत बड़े हिस्से का यह मानना है कि जब और कोई सिपाही इस मोर्चे पर कामयाब नहीं हो रहे हैं तो सैनिकों को इस काम में क्यों नहीं लगाया जाता।
साधारण जनता को पुलिस और फौज के इस्तेमाल में फर्क की जटिलताएं आसानी से समझ नहीं आ सकतीं। किसी भी देश की फौज मोटे तौर पर एक दुश्मन देश के साथ जूझने के लिए तैयार की जाती है और उसका प्रशिक्षण, उसकी मानसिक सोच, ये सब दुश्मन के साथ लडऩे के हिसाब से होते हैं। जब अपने ही देश के भीतर फौज को काम करना होता है तो उसके तौर-तरीके एकदम से नहीं बदल पाते और जिस इलाके में फौज काम करती है वहां पर आतंकी या बगावती तो मारे ही जाते हैं, बेकसूर भी बड़ी संख्या में मारे जाते हैं क्योंकि फौज के तरीके बहुत बारीक फर्क करके लोगों को मारने के नहीं रहते। इसलिए आज जब केंद्रीय रक्षा मंत्री ए.के. एंटोनी यह कहते हैं कि बस्तर में कोई दुश्मन नहीं है और वहां सेना के इस्तेमाल की कोई संभावना नहीं है तो यह एक समझदारी की बात है। लेकिन यह समझदारी कब तक चल पाएगी और कब सोच-समझकर इस समझदारी को परे रखकर इस देश-प्रदेश को नक्सल मोर्चे पर सेना को लाना पड़ेगा यह कहना थोड़ा सा मुश्किल है। जिस अंदाज में सेना के पांव पडऩे के बाद से नक्सलियों ने बस्तर में बहुत से हमले किए और सुरक्षा बलों को बुरी तरह मारा, उससे ऐसा तो साफ है कि यह सेना के आने के खिलाफ प्रतिक्रिया है, लेकिन जो नक्सली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के बाद अब सेना का भी विरोध करेंगे तो उनके खिलाफ अब तक नरमी बरतने वाली सरकारें भी कब तक नरम बनी रह सकेंगी?
नक्सली जिस तरह अंधाधुंध रफ्तार से गैरवर्दीधारी साधारण नागरिकों को भी मार रहे हैं और उसके बाद पहले कभी जाहिर किया जाने वाला अफसोस भी अब नहीं रह गया, तो इस देश-प्रदेश की लोकतांत्रिक सरकारों का रूख ऐसे नक्सल आतंक के बारे में क्या होना चाहिए? एक कड़ी पुलिस या फौजी कार्रवाई की सिफारिश करते हुए हम इस बात को भी समझते हैं कि ऐसी कोई भी कड़ी कार्रवाई बड़ी संख्या में बेकसूरों को भी साथ-साथ पीसकर रख देती है। इसलिए भारत जैसे लोकतंत्र में बार-बार जनता के बीच से फौज की तैनाती की लोकप्रिय और लुभावनी राय आने के बाद भी सरकारें इससे बचती हैं। लेकिन एक सवाल सबके मन में यह है कि अगर नक्सली इतनी बड़ी संख्या में अपनी ड्यूटी करने वाले लोगों को मार रही हंै तो ऐसी मौतें कब तक जारी रखी जाएंगी? क्या सरकार को ऐसी नरमी जारी रखने का कोई नैतिक हक है कि वह फौज को परे रखकर साधारण पुलिस और केंद्रीय बलों को उन नक्सलियों के सामने झोंकती रहे जो कि हर किस्म के विस्फोटकों का इस्तेमाल करके लोगों को थोक में मार रहे हैं? साधारण जनता का यह भी मानना है कि नक्सलियों की नुकसान पहुंचाने वाली ताकत के मुकाबले बचाव के लिए बनी पुलिस जब कमजोर रहना तय है तो फिर सरकारें उन्हें इस मोर्चे पर झोंककर बहुत सी मौतों का इंतजाम क्यों करती है? और यह तो बात मौतों की हुई, जो लोग नक्सल-काबू के इलाकों में रहते हैं वे दोनों तरफ से शक की नजरों से देखे जाते हैं और समय-समय पर उन पर जुल्म होते हैं। हम यहां नक्सल-हमदर्दों के इस पसंदीदा तर्क का इस्तेमाल नहीं कर रहे कि दोनों ही पक्ष लोगों पर हिंसा करते हैं। हमारा अभी भी मानना है कि हिंसा पर नक्सलियों का एकाधिकार है और उस हिंसा के तले, खतरा झेलते हुए जब पुलिस काम करती है तो हो सकता है कि कुछ ज्यादती उससे भी शक के चलते हो जाती हो। जब कभी नक्सलियों और लोकतांत्रिक सरकार के सिपाहियों-सैनिकों के बीच किसी एक को छांटने की बात होगी तो हम हमेशा सिपाहियों-सैनिकों के साथ होंगे क्योंकि वे इस देश के लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह हैं। जो नक्सली लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह नहीं हैं और जो लोकतंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए किसी भी दर्जे की हिंसा को जायज ठहराते हैं, उनकी वकालत जिन स्वघोषित सामाजिक कार्यकर्ताओं को करनी है, वे करते रहें।
आज जब फौज की ट्रेनिंग को लेकर यह बात शुरू हुई है तो हम यहां पर अपनी एक आशंका भी जाहिर कर देना चाहते हैं। नक्सली सीधे-सीधे फौज पर हमला करें या उनकी किसी जमीनी सुरंग के विस्फोट से फौजी मारे जाएं, तो जवाब में फौज की प्रतिक्रिया से बस्तर जैसे इलाके का क्या होगा? हम सरकार के उन कुछ लोगों के अंदाज को सही नहीं मानते कि नक्सली कभी फौज पर हाथ नहीं डालेंगे। हो सकता है कि नक्सलियों की अब तक की रणनीति ऐसी रही हो, लेकिन यह उनकी किसी धार्मिक या संवैधानिक आस्था की बात तो है नहीं। इसलिए किसी दिन ऐसी नौबत आ जाए तो हमें बहुत हैरानी नहीं होगी। लेकिन सरकार को ऐसे हालात के हिसाब से सोचकर अपनी तैयारी रखनी चाहिए। फिर यह भी है कि देश के मोर्चे पर दुश्मनों के साथ मुकाबला करने वाले सैनिकों की मौत अगर होती है तो साधारण जनता की भावनाएं नक्सलियों के खिलाफ और अधिक उबल जाएंगी। इसलिए आगे-पीछे एक ऐसी नौबत आ सकती है कि आत्मरक्षा के लिए, जवाबी हमले के लिए या फौजी कार्रवाई के लिए सेना नक्सलियों के खिलाफ सीधे उतर जाए। यह भी लगता है कि बस्तर जैसे जंगलों में अगर सेना की ट्रेनिंग होती है तो यह पड़ोसी महाराष्ट्र, आंध्र और उड़ीसा के लगे हुए जंगलों में हिंसा कर रहे नक्सलियों के खिलाफ भी काम की हो सकती है। इसलिए केंद्र और राज्य का यह कहना कि नक्सल मोर्चे पर सेना के इस्तेमाल की संभावना नहीं है, उसे हम सिर्फ आज तक लागू एक बात कह सकते हैं और कल बदले हुए हालात में हो सकता है कि जनता का ही इतना दबाव सरकारों पर पड़ जाए कि सरकार को खुद नक्सलियों के खिलाफ फौज को झोंकने का फैसला लेना पड़े।
साधारण जनता को पुलिस और फौज के इस्तेमाल में फर्क की जटिलताएं आसानी से समझ नहीं आ सकतीं। किसी भी देश की फौज मोटे तौर पर एक दुश्मन देश के साथ जूझने के लिए तैयार की जाती है और उसका प्रशिक्षण, उसकी मानसिक सोच, ये सब दुश्मन के साथ लडऩे के हिसाब से होते हैं। जब अपने ही देश के भीतर फौज को काम करना होता है तो उसके तौर-तरीके एकदम से नहीं बदल पाते और जिस इलाके में फौज काम करती है वहां पर आतंकी या बगावती तो मारे ही जाते हैं, बेकसूर भी बड़ी संख्या में मारे जाते हैं क्योंकि फौज के तरीके बहुत बारीक फर्क करके लोगों को मारने के नहीं रहते। इसलिए आज जब केंद्रीय रक्षा मंत्री ए.के. एंटोनी यह कहते हैं कि बस्तर में कोई दुश्मन नहीं है और वहां सेना के इस्तेमाल की कोई संभावना नहीं है तो यह एक समझदारी की बात है। लेकिन यह समझदारी कब तक चल पाएगी और कब सोच-समझकर इस समझदारी को परे रखकर इस देश-प्रदेश को नक्सल मोर्चे पर सेना को लाना पड़ेगा यह कहना थोड़ा सा मुश्किल है। जिस अंदाज में सेना के पांव पडऩे के बाद से नक्सलियों ने बस्तर में बहुत से हमले किए और सुरक्षा बलों को बुरी तरह मारा, उससे ऐसा तो साफ है कि यह सेना के आने के खिलाफ प्रतिक्रिया है, लेकिन जो नक्सली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के बाद अब सेना का भी विरोध करेंगे तो उनके खिलाफ अब तक नरमी बरतने वाली सरकारें भी कब तक नरम बनी रह सकेंगी?
नक्सली जिस तरह अंधाधुंध रफ्तार से गैरवर्दीधारी साधारण नागरिकों को भी मार रहे हैं और उसके बाद पहले कभी जाहिर किया जाने वाला अफसोस भी अब नहीं रह गया, तो इस देश-प्रदेश की लोकतांत्रिक सरकारों का रूख ऐसे नक्सल आतंक के बारे में क्या होना चाहिए? एक कड़ी पुलिस या फौजी कार्रवाई की सिफारिश करते हुए हम इस बात को भी समझते हैं कि ऐसी कोई भी कड़ी कार्रवाई बड़ी संख्या में बेकसूरों को भी साथ-साथ पीसकर रख देती है। इसलिए भारत जैसे लोकतंत्र में बार-बार जनता के बीच से फौज की तैनाती की लोकप्रिय और लुभावनी राय आने के बाद भी सरकारें इससे बचती हैं। लेकिन एक सवाल सबके मन में यह है कि अगर नक्सली इतनी बड़ी संख्या में अपनी ड्यूटी करने वाले लोगों को मार रही हंै तो ऐसी मौतें कब तक जारी रखी जाएंगी? क्या सरकार को ऐसी नरमी जारी रखने का कोई नैतिक हक है कि वह फौज को परे रखकर साधारण पुलिस और केंद्रीय बलों को उन नक्सलियों के सामने झोंकती रहे जो कि हर किस्म के विस्फोटकों का इस्तेमाल करके लोगों को थोक में मार रहे हैं? साधारण जनता का यह भी मानना है कि नक्सलियों की नुकसान पहुंचाने वाली ताकत के मुकाबले बचाव के लिए बनी पुलिस जब कमजोर रहना तय है तो फिर सरकारें उन्हें इस मोर्चे पर झोंककर बहुत सी मौतों का इंतजाम क्यों करती है? और यह तो बात मौतों की हुई, जो लोग नक्सल-काबू के इलाकों में रहते हैं वे दोनों तरफ से शक की नजरों से देखे जाते हैं और समय-समय पर उन पर जुल्म होते हैं। हम यहां नक्सल-हमदर्दों के इस पसंदीदा तर्क का इस्तेमाल नहीं कर रहे कि दोनों ही पक्ष लोगों पर हिंसा करते हैं। हमारा अभी भी मानना है कि हिंसा पर नक्सलियों का एकाधिकार है और उस हिंसा के तले, खतरा झेलते हुए जब पुलिस काम करती है तो हो सकता है कि कुछ ज्यादती उससे भी शक के चलते हो जाती हो। जब कभी नक्सलियों और लोकतांत्रिक सरकार के सिपाहियों-सैनिकों के बीच किसी एक को छांटने की बात होगी तो हम हमेशा सिपाहियों-सैनिकों के साथ होंगे क्योंकि वे इस देश के लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह हैं। जो नक्सली लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह नहीं हैं और जो लोकतंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए किसी भी दर्जे की हिंसा को जायज ठहराते हैं, उनकी वकालत जिन स्वघोषित सामाजिक कार्यकर्ताओं को करनी है, वे करते रहें।
आज जब फौज की ट्रेनिंग को लेकर यह बात शुरू हुई है तो हम यहां पर अपनी एक आशंका भी जाहिर कर देना चाहते हैं। नक्सली सीधे-सीधे फौज पर हमला करें या उनकी किसी जमीनी सुरंग के विस्फोट से फौजी मारे जाएं, तो जवाब में फौज की प्रतिक्रिया से बस्तर जैसे इलाके का क्या होगा? हम सरकार के उन कुछ लोगों के अंदाज को सही नहीं मानते कि नक्सली कभी फौज पर हाथ नहीं डालेंगे। हो सकता है कि नक्सलियों की अब तक की रणनीति ऐसी रही हो, लेकिन यह उनकी किसी धार्मिक या संवैधानिक आस्था की बात तो है नहीं। इसलिए किसी दिन ऐसी नौबत आ जाए तो हमें बहुत हैरानी नहीं होगी। लेकिन सरकार को ऐसे हालात के हिसाब से सोचकर अपनी तैयारी रखनी चाहिए। फिर यह भी है कि देश के मोर्चे पर दुश्मनों के साथ मुकाबला करने वाले सैनिकों की मौत अगर होती है तो साधारण जनता की भावनाएं नक्सलियों के खिलाफ और अधिक उबल जाएंगी। इसलिए आगे-पीछे एक ऐसी नौबत आ सकती है कि आत्मरक्षा के लिए, जवाबी हमले के लिए या फौजी कार्रवाई के लिए सेना नक्सलियों के खिलाफ सीधे उतर जाए। यह भी लगता है कि बस्तर जैसे जंगलों में अगर सेना की ट्रेनिंग होती है तो यह पड़ोसी महाराष्ट्र, आंध्र और उड़ीसा के लगे हुए जंगलों में हिंसा कर रहे नक्सलियों के खिलाफ भी काम की हो सकती है। इसलिए केंद्र और राज्य का यह कहना कि नक्सल मोर्चे पर सेना के इस्तेमाल की संभावना नहीं है, उसे हम सिर्फ आज तक लागू एक बात कह सकते हैं और कल बदले हुए हालात में हो सकता है कि जनता का ही इतना दबाव सरकारों पर पड़ जाए कि सरकार को खुद नक्सलियों के खिलाफ फौज को झोंकने का फैसला लेना पड़े।
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