29 जून 11
21वीं सदी में जब छोटे-बड़े नेता, कारोबारी, अखबारनवीस, खिलाड़ी और फिल्म कलाकार जैसे हर दर्जे के लोग इंटरनेट पर ट्विटर जैसी सुविधा का इस्तेमाल करते हुए अपने दिमाग को मिनट-मिनट पर मोबाईल फोन से भी दुनिया के सामने रख रहे हैं तब भारत में कल से यह बहस चल रही है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब जो मीडिया से बातचीत का नया सिलसिला शुरू करने जा रहे हैं उसके पीछे की वजहें क्या हैं और इस बातचीत से राजनीति और लोकतंत्र पर क्या फर्क पड़ेगा? कुछ लोगों का मानना है कि यूपीए सरकार की मुखिया कांगे्रस पार्टी अपने अकेले और इतने बड़े बेदाग नेता के दामन को बैनर की तरह तानकर अपनी तस्वीर सुधारने की कोशिश कर रही है। इस एक तर्क पर हमारा यह मानना है कि ऐसी निजी ईमानदारी किसी काम की नहीं होती जिनमें चोरों का सरदार अपने हाथ साफ बताते चले और अपनी निजी जरूरतों को एक सब्जी, दाल, दही और रोटी तक सीमित रखे। हम इसके बजाय बेहतर मानते कि रोज थोड़ी दारू पीने वाला, रोज मुर्गा खाने वाला और हल्की-फुल्की बेईमानी करने वाला प्रधानमंत्री देश को बड़े-बड़े घपलों से बचाकर रखता है। इसलिए कांगे्रस पार्टी की इस चतुर-चाहत को हम जनता के सामने ठीक से उजागर कर देना चाहेंगे कि वह अपनी तमाम कालिख के ऊपर यह मनमोहक-मुखौटा लगा रही है।
लेकिन इस राजनीतिक बदनीयती या चतुराई से परे अगर हम मुद्दे पर आएं तो वह यह है कि देश का प्रधानमंत्री मीडिया के मार्फत देश से बात करने जा रहा है। आज की किसी पीढ़ी को यह बात याद नहीं होगी कि किस तरह पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू बिना टीवी वाले उस युग में अपने दिमाग को देश और दुनिया के सामने रोजाना एक से अधिक बार खोलकर रख देते थे। हर महीने तो शायद वे देश के सभी मुख्यमंत्रियों को एक चि_ी लिखकर देश और दुनिया के मुद्दों पर अपने दिल-दिमाग की बात उनके सामने रखते थे। इससे परे वे इतना लिखते थे कि नेहरू की किताबें आज तक इंदिरा परिवार को इतनी रायल्टी देती हैं कि उसका घर खर्च उससे चल सकता है। वैसे प्रधानमंत्री से लेकर इंदिरा तक और बाद में बहुत से ऐसे नेता इस देश पर राज करते रहे जिनकी सोच हर बारे में देश के सामने रहती थी। लेकिन मनमोहन सिंह की शक्ल में इस देश को एक भूतपूर्व अर्थशास्त्री, भूतपूर्व अफसर और भूतपूर्व प्राध्यापक ऐसा मिला जिसने बोलने का काम पार्टी और अपने सहयोगी मंत्रियों पर छोड़ रखा था क्योंकि राजनीतिक बातचीत न तो उनकी खूबी कभी रही और न ही उनकी दिलचस्पी सक्रिय राजनीति में रही। हम इसे कोई बहुत अटपटी बात नहीं मानते क्योंकि न सिर्फ कांगे्रस पार्टी ने बल्कि यूपीए ने भी अपना एक मुखिया चुन रखा है और कांगे्रस के घोषित और दिग्विजयी प्रवक्ता रात-दिन बोलते ही रहते हैं। इनके अलावा अब यूपीए सरकार ने तीन-चार मंत्रियों को भी कुछ महीने पहले से सरकार का प्रवक्ता बना दिया है और वे भी रोजाना मीडिया से बात करते हैं। इस तरह मनमोहन सिंह भारत के पहले लगभग गैरराजनीतिक दिखने वाले प्रधानमंत्री माने जा रहे हैं।
हम इससे सरकार के चलने में तो कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं देखते क्योंकि वामपंथी दलों के राज में भी फैसले तो सत्तारूढ़ गठबंधन ही लेते थे और सरकार चलाने का काम उन फैसलों के मुताबिक एक मुख्यमंत्री के जिम्मे रहता था। फर्क सिर्फ यह है कि ऐसे मुख्यमंत्री खुद भी सक्रिय राजनीति में सक्रिय रहते थे और चुनाव में उनकी बात का असर कैसा रहता था यह केरल में जाहिर है जहां पर कि वामपंथी मुख्यमंत्री जीत की दहलीज के करीब तक पहुंच ही गए थे। इससे परे देश का प्रधानमंत्री आज चुप बैठा एक ऐसा आदमी है जिसके इर्दगिर्द सवालों की फसल खड़ी है और वह बिना बोले फाईलों पर सिर झुकाए एक टेबिल चलाने को देश चलाना मान रहा है। यह सिलसिला हम लोकतंत्र के लिए खतरनाक इसलिए मानते हैं कि पार्टी या गठबंधन की नीतियों के मुताबिक सरकार चलाना तो ठीक बात है लेकिन खुद होकर देश से बात करना, देश की बात सुनना भी प्रधानमंत्री के लिए उस गठबंधन के एक नेता के रूप में तो जरूरी है ही।
इस देश में पिछले बरसों में मनमोहन सरकार के हाथों हुए इतने किस्म के जुर्म आज अदालतों में खड़े हैं और यह देश उनके राज में इस बुरी तरह लुट गया है कि बेहतर होता कि वे आज रोजाना जनता को जवाब देते होते। हमारा यह भी मानना है कि अगर वे अक्सर मीडिया से बात करते तो इतने बड़े-बड़े अपराधों का गुलदस्ता तैयार हो जाने के पहले ही एक-एक कांटा उन्हें हर हफ्ते चुभता और वे अपनी सरकार के पांव संभाल पाते। अब जब वे मीडिया से बात शुरू कर रहे हैं और ऐसा बताया जा रहा है कि वे हर हफ्ते कुछ संपादकों से बात करेंगे तो यह एक अच्छी शुरुआत है और पुरानी बातों को बहुत ज्यादा पीटते रहने के बजाय हम इस नए मौके के इस्तेमाल करने के लिए मीडिया के साथ-साथ जनता को भी चौकस रखना चाहेंगे। आज मीडिया के तमाम प्रमुख लोग मुफ्त के माध्यम, इंटरनेट-ईमेल से तमाम पाठकों और जनता से जुड़े रहते हैं। इसलिए जनता भी अलग-अलग सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात सामने रख सकती है और अपने पसंदीदा पत्रकारों से पूछ भी सकती है कि उन्होंने प्रधानमंत्री से यह क्यों नहीं पूछा? यह सिलसिला आगे बढऩा चाहिए और यह सुझाते हुए हमें महात्मा गांधी के अखबार यंग इंडिया और हरिजन याद पड़ते हैं जिनमें पाठकों के पत्र के लंबे जवाब गांधी खुद लिखते थे। आज जब देश के औने-पौने नेता भी लंबे-चौड़े ब्लॉग लिखते हैं, फुटपाथ पर खड़े हुए भी ट्विटर पर अपनी बात रखते हैं तो इस देश का प्रधानमंत्री भी अपनी ऐसी वेबसाईट शुरू करे जिसमें जनता के सवालों के जवाब रोज के रोज उनकी तरफ से दिए जाएं। फिलहाल वे शायद हर हफ्ते कुछ संपादकों से बात करेंगे और हम उम्मीद करते हैं कि वे आज के जमाने के बाकी औजारों का इस्तेमाल भी इस विशाल लोकतंत्र की जनता के साथ अपनी सोच को बांटने के लिए करेंगे।
21वीं सदी में जब छोटे-बड़े नेता, कारोबारी, अखबारनवीस, खिलाड़ी और फिल्म कलाकार जैसे हर दर्जे के लोग इंटरनेट पर ट्विटर जैसी सुविधा का इस्तेमाल करते हुए अपने दिमाग को मिनट-मिनट पर मोबाईल फोन से भी दुनिया के सामने रख रहे हैं तब भारत में कल से यह बहस चल रही है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब जो मीडिया से बातचीत का नया सिलसिला शुरू करने जा रहे हैं उसके पीछे की वजहें क्या हैं और इस बातचीत से राजनीति और लोकतंत्र पर क्या फर्क पड़ेगा? कुछ लोगों का मानना है कि यूपीए सरकार की मुखिया कांगे्रस पार्टी अपने अकेले और इतने बड़े बेदाग नेता के दामन को बैनर की तरह तानकर अपनी तस्वीर सुधारने की कोशिश कर रही है। इस एक तर्क पर हमारा यह मानना है कि ऐसी निजी ईमानदारी किसी काम की नहीं होती जिनमें चोरों का सरदार अपने हाथ साफ बताते चले और अपनी निजी जरूरतों को एक सब्जी, दाल, दही और रोटी तक सीमित रखे। हम इसके बजाय बेहतर मानते कि रोज थोड़ी दारू पीने वाला, रोज मुर्गा खाने वाला और हल्की-फुल्की बेईमानी करने वाला प्रधानमंत्री देश को बड़े-बड़े घपलों से बचाकर रखता है। इसलिए कांगे्रस पार्टी की इस चतुर-चाहत को हम जनता के सामने ठीक से उजागर कर देना चाहेंगे कि वह अपनी तमाम कालिख के ऊपर यह मनमोहक-मुखौटा लगा रही है।
लेकिन इस राजनीतिक बदनीयती या चतुराई से परे अगर हम मुद्दे पर आएं तो वह यह है कि देश का प्रधानमंत्री मीडिया के मार्फत देश से बात करने जा रहा है। आज की किसी पीढ़ी को यह बात याद नहीं होगी कि किस तरह पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू बिना टीवी वाले उस युग में अपने दिमाग को देश और दुनिया के सामने रोजाना एक से अधिक बार खोलकर रख देते थे। हर महीने तो शायद वे देश के सभी मुख्यमंत्रियों को एक चि_ी लिखकर देश और दुनिया के मुद्दों पर अपने दिल-दिमाग की बात उनके सामने रखते थे। इससे परे वे इतना लिखते थे कि नेहरू की किताबें आज तक इंदिरा परिवार को इतनी रायल्टी देती हैं कि उसका घर खर्च उससे चल सकता है। वैसे प्रधानमंत्री से लेकर इंदिरा तक और बाद में बहुत से ऐसे नेता इस देश पर राज करते रहे जिनकी सोच हर बारे में देश के सामने रहती थी। लेकिन मनमोहन सिंह की शक्ल में इस देश को एक भूतपूर्व अर्थशास्त्री, भूतपूर्व अफसर और भूतपूर्व प्राध्यापक ऐसा मिला जिसने बोलने का काम पार्टी और अपने सहयोगी मंत्रियों पर छोड़ रखा था क्योंकि राजनीतिक बातचीत न तो उनकी खूबी कभी रही और न ही उनकी दिलचस्पी सक्रिय राजनीति में रही। हम इसे कोई बहुत अटपटी बात नहीं मानते क्योंकि न सिर्फ कांगे्रस पार्टी ने बल्कि यूपीए ने भी अपना एक मुखिया चुन रखा है और कांगे्रस के घोषित और दिग्विजयी प्रवक्ता रात-दिन बोलते ही रहते हैं। इनके अलावा अब यूपीए सरकार ने तीन-चार मंत्रियों को भी कुछ महीने पहले से सरकार का प्रवक्ता बना दिया है और वे भी रोजाना मीडिया से बात करते हैं। इस तरह मनमोहन सिंह भारत के पहले लगभग गैरराजनीतिक दिखने वाले प्रधानमंत्री माने जा रहे हैं।
हम इससे सरकार के चलने में तो कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं देखते क्योंकि वामपंथी दलों के राज में भी फैसले तो सत्तारूढ़ गठबंधन ही लेते थे और सरकार चलाने का काम उन फैसलों के मुताबिक एक मुख्यमंत्री के जिम्मे रहता था। फर्क सिर्फ यह है कि ऐसे मुख्यमंत्री खुद भी सक्रिय राजनीति में सक्रिय रहते थे और चुनाव में उनकी बात का असर कैसा रहता था यह केरल में जाहिर है जहां पर कि वामपंथी मुख्यमंत्री जीत की दहलीज के करीब तक पहुंच ही गए थे। इससे परे देश का प्रधानमंत्री आज चुप बैठा एक ऐसा आदमी है जिसके इर्दगिर्द सवालों की फसल खड़ी है और वह बिना बोले फाईलों पर सिर झुकाए एक टेबिल चलाने को देश चलाना मान रहा है। यह सिलसिला हम लोकतंत्र के लिए खतरनाक इसलिए मानते हैं कि पार्टी या गठबंधन की नीतियों के मुताबिक सरकार चलाना तो ठीक बात है लेकिन खुद होकर देश से बात करना, देश की बात सुनना भी प्रधानमंत्री के लिए उस गठबंधन के एक नेता के रूप में तो जरूरी है ही।
इस देश में पिछले बरसों में मनमोहन सरकार के हाथों हुए इतने किस्म के जुर्म आज अदालतों में खड़े हैं और यह देश उनके राज में इस बुरी तरह लुट गया है कि बेहतर होता कि वे आज रोजाना जनता को जवाब देते होते। हमारा यह भी मानना है कि अगर वे अक्सर मीडिया से बात करते तो इतने बड़े-बड़े अपराधों का गुलदस्ता तैयार हो जाने के पहले ही एक-एक कांटा उन्हें हर हफ्ते चुभता और वे अपनी सरकार के पांव संभाल पाते। अब जब वे मीडिया से बात शुरू कर रहे हैं और ऐसा बताया जा रहा है कि वे हर हफ्ते कुछ संपादकों से बात करेंगे तो यह एक अच्छी शुरुआत है और पुरानी बातों को बहुत ज्यादा पीटते रहने के बजाय हम इस नए मौके के इस्तेमाल करने के लिए मीडिया के साथ-साथ जनता को भी चौकस रखना चाहेंगे। आज मीडिया के तमाम प्रमुख लोग मुफ्त के माध्यम, इंटरनेट-ईमेल से तमाम पाठकों और जनता से जुड़े रहते हैं। इसलिए जनता भी अलग-अलग सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात सामने रख सकती है और अपने पसंदीदा पत्रकारों से पूछ भी सकती है कि उन्होंने प्रधानमंत्री से यह क्यों नहीं पूछा? यह सिलसिला आगे बढऩा चाहिए और यह सुझाते हुए हमें महात्मा गांधी के अखबार यंग इंडिया और हरिजन याद पड़ते हैं जिनमें पाठकों के पत्र के लंबे जवाब गांधी खुद लिखते थे। आज जब देश के औने-पौने नेता भी लंबे-चौड़े ब्लॉग लिखते हैं, फुटपाथ पर खड़े हुए भी ट्विटर पर अपनी बात रखते हैं तो इस देश का प्रधानमंत्री भी अपनी ऐसी वेबसाईट शुरू करे जिसमें जनता के सवालों के जवाब रोज के रोज उनकी तरफ से दिए जाएं। फिलहाल वे शायद हर हफ्ते कुछ संपादकों से बात करेंगे और हम उम्मीद करते हैं कि वे आज के जमाने के बाकी औजारों का इस्तेमाल भी इस विशाल लोकतंत्र की जनता के साथ अपनी सोच को बांटने के लिए करेंगे।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें