9 जून 2011
दवा और चिकित्सकीय शोध कर रही कंपनियों के लिए भारत में क्लिनिकल ट्रायल 4 सौ मिलियन डॉलर का व्यवसाय है लेकिन हाल ही में चिकित्सकीय परीक्षणों के दौरान हुई मौतों ने व्यवसाय के इस अवसर का एक अंधेरा पहलू सामने रखा है। भारतीय दवा महा नियंत्रक की हाल ही में सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक 2010 में इस तरह के दवा परीक्षणों से 25 लोगों की परीक्षण के दौरान मौत हो गई, लेकिन उनमें से केवल 5 को ही मुआवजा दिया गया, वह भी अपर्याप्त। अब दवा महा नियंत्रक ने देश में ऐसे परीक्षण कर रही 9 बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों को धमकाया है कि वह इन सभी मृतकों के परिवारों को मुआवजा दे, वर्ना भारत में उनके परीक्षण बंद कर दिए जाएंगे। दवा महानियंत्रक को देश में चिकित्सकीय परीक्षण कर रही कंपनियों ने जो आंकड़े दिए हंै वह भी चौंकाने वाले हैं। इनके मुतबिक पिछले साल ऐसे परीक्षणोंं से जुड़े 670 लोगों की जानें गर्इं, लेकिन यह परीक्षण करने वाली दवा कंपनियों का कहना है कि इनमें से केवल 25 लोग ही दवाओं के परीक्षण के कारण मरे, बाकी अपनी बीमारियों के कारण मरे। ऐसे लोगों के लिए भारत में डेढ़ से तीन लाख रुपये तक के मुआवजे का प्रावधान है, लेकिन इन दवा कंपनियों ने मरने वाले 25 में से 20 लोगों को मुआवजा नहीं दिया, और दवा महानियंत्रक को उनके कान उमेठने पड़ेे।
बात सिर्फ 20 लोगों को मुआवजा दिलवाने तक ही सीमित नहीं है। पिछले दिनों इन्दौर के सरकारी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के एक हजार से ऊपर मरीजों के चिकित्सकीय परीक्षण करके पिछले 5 सालों में दसियों लाखों रुपये कमाने की बात सामने आई। इनमें से ज्यादातर बच्चे थे इसलिए भारत जैसे देश में, जहां हर तंत्र में, निरीक्षण में आलस और भ्रष्टाचार आम है, इंसानी जान की कीमत उसके जाते रहने पर ही पता लगती है। ऐसे परीक्षणों में मरने वाले एक इंसान की जान की कीमत डेढ़ लाख से तीन लाख रुपये है। इसका अहसास करवाने के लिए उसे दवा परीक्षण के दौरान अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। लेकिन चिकित्सा परीक्षणों के दौरान मरने वाले को मुआवजा देने की बात तब आती है जब उसकी मौत ऐसे परीक्षण के दौरान हुई होनी बताई जाए। बेजुबान, अनजान गरीबों से चिकित्सकीय परीक्षण के लिए किए जाने वाले समझौते के बारे में कितने लोगों को तफसील से समझाया जाता है? कितनों को इसके बुरे नतीजे जानने के बाद गरीबी के बावजूद इनसे गुजरने से इंकार करने का मौका दिया जाता है ? दवा महनियंत्रक के दफ्तर के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन सालों में चिकित्सकीय परीक्षणों से गुजर रहे डेढ़ हजार से भी ज्यादा लोगों की मौत इन परीक्षणों के दौरान हो गई। इस देश में जहां सिर में दर्द के मरीज को पेट का रोगी बताकर उसकी किडनी बेच डालने के गिरोह अस्पतालों में चलते हंै, वहां एक गरीब, बेआवाज, बिना किसी रसूख वाले मरीज़ की मौत चिकित्सकीय परीक्षण से ही हुई है, या नहीं, इसकी सही जानकारी हासिल करने के लिए दवा नियंत्रक उन दो लोगों पर निर्भर करता है जिनके हित इस तरह के परीक्षणों से किसी के न मरने की खबरों से जुड़े हुए हैं - डॉक्टर और दवा कंपनियां।
एक तरफ जहां भारत बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों को सस्ते में अपने यहां चिकित्सकीय परीक्षण करने की छूट देकर इस अरबों डॉलर के व्यवसाय में अपने हिस्से की दौलत बटोर रहा है। वहीं दूसरी तरफ उसने अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए कड़े कायदे नहीं बनाए, और जो कायदे मौजूद हैं, उनका भी उल्ल्ंघन न हो, यह देखने की जहमत नहीं उठाई जा रही है। इन्दौर की घटना से सामने आया कि जिन सरकारी अस्पतालों की सुविधाएं इस्तेमाल करके यह परीक्षण किए जा रहे हैं उन्हें इससे कोई आर्थिक लाभ नहीं हो रहा है। सारा मुनाफा डॉक्टर कमाए जा रहे हंै, वहीं दूसरी ओर मरीजों को इन परीक्षणों के बारे में सही जानकारी नहीं दी जा रही -जैसे कि पुरुषों की एक यौन कमजोरी की दवा के परीक्षण 7 महिलाओं पर भी कर लिए गए। इन परीक्षणों से जुड़ी एक बड़ी चिंता यह भी है कि इनके नतीजों के बारे में सही जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती। केवल सफल परीक्षणों की जानकारी मेडिकल पत्र-पत्रिकाओं में छपती है जबकि असफल रहने वाले परीक्षणों की जानकारी सर्वजनिक नहीं की जाती है जबकि ऐसे परीक्षणों की सही जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने पर संबंधित पक्ष यह जान सकते हंै कि देश में किस तरह की बीमारियों की दवाओं के परीक्षण हो रहे हंै, वह यहां की आबादी के काम के हंै भी या कम्पनिया कहीं और के मरीजों के इलाज के लिए भारतीयों को चूहों की तरह तो इस्तेमाल नहीं कर रही। विश्व स्वास्थ्य संगठन के कहे मुताबिक भारत ने इन चिकित्सकीय परीक्षणों के पंजीकरण के लिए एक पंजीयक तो 2007 में बनाया है,लेकिन उसमें अपने परीक्षण का पंजीयन करवाना दवा कंपनियों के लिए कानूनी जरूरत नहीं है इसलिए यह दांत नख बिना का सिंह ही बन कर रह गया है, जबकि होना यह चाहिए कि इन चिकित्सकीय परीक्षणों से जुड़ी सभी जानकारियां देते हुए पहले इन्हें पंजीकृत करवाया जाए, तभी परीक्षण आगे करने की इजाज़त मिले।
लेकिन बात जब अरबो डॉलर के अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीन से मुकाबले की हो, तो सरकार गरीब बेजुबान और अल्प शिक्षित या तकरीबन अनपढ़ जनता की चिंता से बेफिक्र हो जाती है। किसी भी क्षेत्र में अवसरों का लाभ उठाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन आज भारत ने सिर्फ परीक्षण के लिए सस्ती दर पर सुविधा और जिम्मेदारी से बच निकलने वाला एक ढीला तंत्र बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मुहैय्या करवा रखा है, जबकि उनकी चिंता तेजी से सही गुणवत्ता वाले परीक्षण करने की है। यह सुविधा इन कंपनियों को चीन, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया में मिल रही है। जहां संजोग से दवाओं के पहले चरण के परीक्षण भी मरीजों पर करने की छूट है। अब, जब भारत लगातार यह व्यापार इन देशों के आगे गंवाता जा रहा है। देश में बजाए परीक्षणों की गुणवत्ता सुधारने ,और इन्हें पारदर्शी व देश के कानून के मुताबिक जवाबदेह बनाने के, उद्योग इन पहले चरण के परीक्षण करने देने की भी मांग कर रहा है, जिसमें दवा का सीधे एक इंसान पर पहले परीक्षण किया जाता है। लेकिन एक सही और सक्षम नियामक के अभाव में इसकी इजाजत देना, पहले से ही डॉक्टरों और दवा कंपनियों के शिकार बन रहे लोगों को और भी खतरे में डालना होगा। एक व्यापार हासिल करने के लिए इतना बड़ा खतरा नहीं उठाया जा सकता।
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